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प्रथम इंटरनेशनल और उसकी समकालीन प्रासंगिकता

— मार्सेलो मुस्तो

[ पेरिस कम्यून की 154वीं वर्षगांठ के अवसर पर वह क्रांतिकारी मजदूर सरकार जिसने 18 मार्च से 28 मई 1871 तक पेरिस पर शासन किया था, हम मार्सेलो मुस्तो का यह लेख पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं. यह लेख इंटरनेशनल वर्किंग मेन्स एसोसिएशन के इतिहास और उससे मिलने वाली उन शिक्षाओं की समीक्षा करता है जो आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं: मेहनतकश वर्ग की एकजुटता, अंतरराष्ट्रीयतावाद, पूंजीवाद-विरोधी संघर्ष, तथा शोषण, युद्ध और असमानता के खिलाफ व्यापक जनआंदोलनों के निर्माण की जरूरत.

पूंजीवाद द्वारा पैदा किए गए हालिया संकटों ने शोषण, गरीबी और असमानताओं को पहले से भी अधिक तीखा बना दिया है. ऐसे दौर में 1864 में स्थापित इस संगठन की विरासत फिर से प्रासंगिक हो उठी है, और उसकी शिक्षाएं आज पहले से कहीं अधिक अहमियत रखती हैं.]

इंटरनेशनलिज्म की शुरुआत
28 सितंबर 1864 को अपनी पहली बैठक के बाद इंटरनेशनल वर्किंग मेन्स एसोसिएशन (जिसे आमतौर पर ‘प्रथम इंटरनेशनल’ कहा जाता है) ने बहुत तेजी से पूरे यूरोप में उत्साह और चर्चा पैदा कर दी. इसने वर्गीय एकजुटता को एक साझा आदर्श बनाया और बड़ी संख्या में महिलाओं और पुरुषों को शोषण के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित किया. इसकी गतिविधियों की बदौलत मजदूर पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के तौर-तरीकों को अधिक स्पष्टता से समझ सके, अपनी सामूहिक ताकत के प्रति अधिक जागरूक हुए और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष के नए तथा अधिक उन्नत रूप विकसित कर सके.

जब इंटरनेशनल की स्थापना हुई, तब उसकी सबसे महत्वपूर्ण प्रेरक शक्ति ब्रिटिश ट्रेड यूनियन आंदोलन था, जिसके नेता मुख्यतः आर्थिक सवालों पर केंद्रित थे. वे मजदूरों की हालत बेहतर बनाने के लिए संघर्ष करते थे, लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था को चुनौती नहीं देना चाहते थे. इसलिए वे इंटरनेशनल को मुख्यतः एक ऐसे साधन के रूप में देखते थे, जो हड़तालों के दौरान विदेशों से सस्ते श्रमिकों की भर्ती को रोक सके. इंटरनेशनल के भीतर दूसरा महत्वपूर्ण समूह फ्रांस के म्यूचुअलिस्टों का था, जिनका लंबे समय तक वहां प्रभाव रहा था. पिएर जोसेफ प्रूधों के सिद्धांतों के अनुरूप वे मजदूर वर्ग की राजनीतिक भागीदारी का विरोध करते थे और हड़ताल को भी संघर्ष के हथियार के रूप में स्वीकार नहीं करते थे. इसके अलावा कम्युनिस्ट भी थे, जो मौजूदा उत्पादन व्यवस्था का विरोध करते थे और उसे उखाड़ फेंकने के लिए राजनीतिक संघर्ष की आवश्यकता पर जोर देते थे. इंटरनेशनल की स्थापना के समय उसमें ऐसे कई मजदूर भी शामिल थे जो काल्पनिक समाजवादी (यूटोपियन) विचारों से प्रेरित थे, साथ ही निर्वासित राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे जिनके लोकतांत्रिक विचार अस्पष्ट थे और जो वर्गों के पार एकता की अवधारणा रखते थे. वे इंटरनेशनल को मुख्यतः उत्पीड़ित राष्ट्रों और जनता की मुक्ति के लिए सामान्य अपीलें जारी करने के मंच के रूप में देखते थे. इस प्रकार, अपने शुरुआती दौर में इंटरनेशनल एक ऐसा संगठन था जिसमें अनेक राजनीतिक परंपराएं साथ-साथ मौजूद थीं, और जिनमें से अधिकांश सुधारवादी थीं, क्रांतिकारी नहीं.

इन तमाम धाराओं को एक ऐसे साझा कार्यक्रम के इर्द-गिर्द साथ बनाए रखना, जो उनकी शुरुआती मान्यताओं से काफी अलग था, कार्ल मार्क्स की सबसे बड़ी राजनीतिक कामयाबी थी. उनकी राजनीतिक क्षमता ने उन प्रवृत्तियों को भी साथ लाने में सफलता हासिल की जिन्हें पहली नजर में एक-दूसरे के साथ जोड़ना असंभव लगता था. इंटरनेशनल को स्पष्ट दिशा देने वाले व्यक्ति मार्क्स ही थे. उन्होंने ऐसा राजनीतिक कार्यक्रम तैयार किया जो किसी को बाहर करने वाला नहीं था, लेकिन जिसकी बुनियाद मजदूर वर्ग की स्वतंत्र राजनीति पर दृढ़ता से टिकी हुई थी. इसी वजह से इंटरनेशनल को संकीर्ण गुटबाजी से ऊपर उठकर व्यापक जनसमर्थन मिला. मार्क्स उसके जनरल काउंसिल की राजनीतिक आत्मा थे. यही वह निकाय था जो विभिन्न धाराओं के बीच एक साझा समझ विकसित करता था और पूरे संगठन के लिए दिशा-निर्देश तय करता था. इंटरनेशनल के लगभग सभी प्रमुख प्रस्तावों का मसौदा मार्क्स ने तैयार किया और उसके लगभग सभी कांग्रेस प्रतिवेदनों को लिखने की जिम्मेदारी भी उन्होंने ही निभाई.

फिर भी, बाद के वर्षों में सोवियत संघ के प्रचारतंत्र द्वारा बनाई गई छवि के विपरीत, यह संगठन किसी एक व्यक्ति की रचना भर नहीं था, चाहे वह व्यक्ति मार्क्स जितना प्रतिभाशाली ही क्यों न हो. यह मेहनतकश वर्ग की मुक्ति के लिए खड़ा हुआ एक विशाल सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन था; जैसा कि अक्सर लिखा जाता है, यह ‘मार्क्स की रचना’ नहीं थी. इंटरनेशनल का जन्म सबसे पहले 1860 के दशक में उभरे मजदूर आंदोलनों और उनके संघर्षों की बदौलत संभव हुआ. उसके बुनियादी नियमों में से एक – और उससे पहले के मजदूर संगठनों से उसका सबसे बुनियादी फर्क – यह था कि ‘मेहनतकश वर्ग की मुक्ति का काम स्वयं मेहनतकश वर्ग को ही करना होगा.’ यह धारणा कि मार्क्स ने अपने अध्ययन-कक्ष में पहले से तैयार किसी राजनीतिक सिद्धांत को इतिहास के मंच पर यांत्रिक ढंग से लागू कर दिया था, ऐतिहासिक सच्चाई से मेल नहीं खाती. मार्क्स इंटरनेशनल के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे, लेकिन इंटरनेशनल का प्रभाव भी मार्क्स पर उतना ही सकारात्मक और गहरा पड़ा. मजदूरों के संघर्षों से सीधे जुड़ने के कारण मार्क्स को अपने विचारों को और विकसित करने, कई बार उनमें संशोधन करने, पुरानी निश्चित मान्यताओं पर पुनर्विचार करने और नए सवाल उठाने की प्रेरणा मिली. इसी प्रक्रिया में उन्होंने पूंजीवाद की अपनी आलोचना को और अधिक पैना बनाया तथा भावी साम्यवादी समाज की व्यापक रूपरेखा को भी अधिक स्पष्टता से सामने रखा.

सिद्धांत और संघर्ष
उन्नीसवीं सदी के साठ के दशक के उत्तरार्ध और सत्तर के दशक की शुरुआत में यूरोप में तीखे सामाजिक संघर्षों का दौर था. विरोध-प्रदर्शनों और आंदोलनों में भाग लेने वाले अनेक मजदूरों ने इंटरनेशनल से संपर्क स्थापित करने का फैसला किया, जिसकी प्रतिष्ठा और प्रभाव बहुत तेजी से फैल रहा था. 1866 के बाद अनेक देशों में हड़तालों की संख्या और तीव्रता दोनों बढ़ीं, और वे मजदूर आंदोलनों की एक नई तथा महत्वपूर्ण लहर का केंद्र बन गईं. फ्रांस, बेल्जियम और स्विट्जरलैंड में मजदूरों द्वारा जीते गए कई संघर्षों में इंटरनेशनल ने निर्णायक भूमिका निभाई. इन संघर्षों का स्वरूप अक्सर एक जैसा होता था. दूसरे देशों के मजदूर हड़ताली श्रमिकों के समर्थन में आर्थिक सहायता जुटाते थे और यह भी तय करते थे कि वे ऐसे काम स्वीकार नहीं करेंगे जिससे उन्हें मालिकों के लिए औद्योगिक भाड़े के मजदूर की भूमिका निभानी पड़े. नतीजतन, पूंजीपतियों और कारखाना मालिकों को हड़तालियों की अनेक मांगें मानने के लिए समझौता करना पड़ा. इन सफलताओं में उन अखबारों की भी बड़ी भूमिका थी जो या तो इंटरनेशनल के विचारों के प्रति सहानुभूति रखते थे या फिर सीधे उसके जनरल काउंसिल के मुखपत्र के रूप में काम करते थे. इन अखबारों ने वर्गीय चेतना के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया और इंटरनेशनल की गतिविधियों से जुड़ी खबरों को तेजी से एक देश से दूसरे देश तक पहुंचाने का काम किया.

पूरे यूरोप में इंटरनेशनल ने एक प्रभावशाली संगठनात्मक ढांचा खड़ा किया और अपने सदस्यों की संख्या में लगातार वृद्धि की. अपने चरम दौर में इसके लगभग डेढ़ लाख सदस्य थे. विभिन्न राष्ट्रीयताओं, भाषाओं और राजनीतिक संस्कृतियों से पैदा होने वाली तमाम कठिनाइयों के बावजूद, इंटरनेशनल अनेक संगठनों और स्वतःस्फूर्त जनसंघर्षों के बीच एकता और समन्वय कायम करने में सफल रहा. उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने वर्गीय एकजुटता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के निर्णायक महत्व को व्यवहार में साबित किया.

इंटरनेशनल मजदूर आंदोलन की कुछ सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक बहसों का मंच भी बना. साम्यवाद और अराजकतावाद जैसे प्रश्नों पर हुई चर्चाएं आज भी राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. इंटरनेशनल की कांग्रेसें वह जगह थीं जहां पहली बार एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन ने उन बुनियादी सवालों पर सामूहिक फैसले लिए, जिन पर उसकी स्थापना से पहले भी बहसें चल रही थीं. बाद में यही सवाल दुनिया भर के समाजवादी आंदोलनों के राजनीतिक कार्यक्रमों के केंद्रीय तत्व बने. इनमें ट्रेड यूनियनों की अपरिहार्य भूमिका, भूमि और उत्पादन के साधनों के सामाजिक स्वामित्व की आवश्यकता, चुनावों में भागीदारी का महत्व तथा मजदूर वर्ग की स्वतंत्र राजनीतिक पार्टियों के माध्यम से ऐसा करने की जरूरत, महिलाओं की मुक्ति का प्रश्न, और युद्ध को पूंजीवादी व्यवस्था की अनिवार्य उपज के रूप में समझने की अवधारणा शामिल थीं.

इंटरनेशनल का प्रभाव केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहा. अटलांटिक महासागर के उस पार, हाल के वर्षों में अमेरिका पहुंचे प्रवासियों ने वहां इंटरनेशनल की पहली शाखाएं स्थापित करनी शुरू कर दीं. फिर भी, संगठन अपने जन्मकाल से ही दो ऐसी कमजोरियों से ग्रस्त था जिन्हें वह कभी पूरी तरह दूर नहीं कर सका. पहली, लंदन स्थित जनरल काउंसिल की बार-बार की अपीलों के बावजूद, वह अपनी विभिन्न संबद्ध इकाइयों के भीतर मौजूद राष्ट्रीयतावादी सीमाओं को पूरी तरह नहीं तोड़ पाया. दूसरी, वह अमेरिका में जन्मे स्थानीय मजदूरों को बड़े पैमाने पर अपने साथ जोड़ने में असफल रहा. दिसंबर 1870 में जब जर्मन, फ्रांसीसी और चेक शाखाओं ने उत्तरी अमेरिका के लिए इंटरनेशनल की केंद्रीय कमेटी का गठन किया, तो यह इंटरनेशनल के इतिहास में एक अनोखी घटना थी. इस कमेटी के सभी सदस्य विदेशों में जन्मे प्रवासी थे. इस असामान्य स्थिति का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह था कि अमेरिका में इंटरनेशनल कभी भी अंग्रेजी भाषा का अपना कोई अखबार या नियमित प्रकाशन विकसित नहीं कर सका. 1870 के दशक की शुरुआत तक इंटरनेशनल की लगभग 50 शाखाएं और कुल मिलाकर करीब 4,000 सदस्य थे. लेकिन उस समय अमेरिका के औद्योगिक क्षेत्र में बीस लाख से अधिक मजदूर काम कर रहे थे. इस लिहाज से इंटरनेशनल का प्रभाव अभी भी अमेरिकी मजदूर वर्ग के केवल एक छोटे से हिस्से तक ही सीमित था.

उत्कर्ष और संकट
इंटरनेशनल के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण क्षण पेरिस कम्यून के साथ जुड़ा हुआ था. मार्च 1871 में, फ्रेंको-प्रुशियन युद्ध की समाप्ति के बाद पेरिस के मजदूरों ने एडोल्फ थियर्स की नई सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया और शहर की सत्ता अपने हाथों में ले ली. इसके बाद इंटरनेशनल राजनीतिक तूफान के केंद्र में आ गया और उसे अभूतपूर्व प्रसिद्धि मिली.

पूंजीपतियों और मध्यवर्ग के लिए वह स्थापित व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बन गया था, जबकि मजदूरों के लिए उसने शोषण और अन्याय से मुक्त दुनिया की उम्मीदों को नई ताकत दी. मजदूर आंदोलन असाधारण जीवंतता से भरा हुआ था, और इसके संकेत हर जगह दिखाई दे रहे थे. इंटरनेशनल से जुड़े अखबारों की संख्या भी बढ़ी और उनका प्रसार भी. पेरिस के विद्रोह ने मजदूर आंदोलन को और अधिक मजबूत किया. इसने उसे अधिक क्रांतिकारी राजनीतिक रुख अपनाने और अपने संघर्षों को और तेज करने के लिए प्रेरित किया. फ्रांस ने एक बार फिर इतिहास को यह दिखाया कि क्रांति संभव है. उसने यह भी स्पष्ट किया कि उसका लक्ष्य पूंजीवादी समाज से भिन्न एक नई सामाजिक व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए. लेकिन साथ ही यह भी सामने आया कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मजदूर वर्ग को टिकाऊ और सुव्यवस्थित राजनीतिक संगठनों का निर्माण करना होगा. इसके बाद अगला कदम, जैसा कि कार्ल मार्क्स ने कहा था, यह समझना था कि ‘मजदूर वर्ग का आर्थिक आंदोलन और उसकी राजनीतिक कार्रवाई एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं.’ इसी समझ के आधार पर 1871 के लंदन सम्मेलन में इंटरनेशनल ने आधुनिक मजदूर आंदोलन के एक अत्यंत महत्वपूर्ण हथियार – राजनीतिक पार्टी – के निर्माण पर जोर दिया. हालांकि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उस समय राजनीतिक पार्टी की जो अवधारणा विकसित की जा रही थी, वह बाद में अक्टूबर क्रांति के बाद उभरे कम्युनिस्ट संगठनों की अवधारणा की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और लचीली थी.

1872 में हेग कांग्रेस के बाद जब इंटरनेशनल ने स्वयं को भंग किया, तब वह अपनी स्थापना के समय वाले संगठन से काफी अलग बन चुका था. अब सुधारवादी धाराएं उसके भीतर बहुमत में नहीं थीं और पूंजीवाद-विरोध पूरे संगठन की साझा राजनीतिक दिशा बन चुका था. इसमें मिखाइल बाकुनिन के नेतृत्व वाली अराजकतावादी धारा जैसी नई प्रवृत्तियां भी शामिल थीं.

इस बीच व्यापक राजनीतिक परिदृश्य भी पूरी तरह बदल चुका था. 1871 में जर्मनी के एकीकरण ने एक नए युग की शुरुआत की पुष्टि कर दी, जिसमें राष्ट्र-राज्य राजनीतिक, कानूनी और क्षेत्रीय पहचान का केंद्रीय रूप बनकर उभरा. इस बदली हुई परिस्थिति में इंटरनेशनल का शुरुआती ढांचा पुराना पड़ने लगा, और उसकी मूल ऐतिहासिक भूमिका भी लगभग पूरी हो चुकी थी. अब काम केवल पूरे यूरोप में हड़तालों के समर्थन का समन्वय करना नहीं रह गया था. न ही मुख्य चुनौती ऐसे सम्मेलन आयोजित करना था जो ट्रेड यूनियनों की उपयोगिता या भूमि और उत्पादन के साधनों के सामाजिक स्वामित्व की आवश्यकता का प्रचार करें. ये विचार अब संगठन की सामूहिक विरासत का हिस्सा बन चुके थे.

पेरिस कम्यून के बाद मजदूर आंदोलन के सामने असली चुनौती यह थी कि वह खुद को किस तरह संगठित करे ताकि पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था का अंत किया जा सके और बुर्जुआ समाज की संस्थाओं को उखाड़ फेंका जा सके.

इंटरनेशनलिज्मः तब और आज
प्रथम इंटरनेशनल की 156वीं वर्षगांठ (2020 में) ऐसे समय में आई जब दुनिया 19वीं सदी के उस दौर से बिल्कुल अलग परिस्थितियों में खड़ी थी. उस समय की उम्मीदों और आज के व्यापक अविश्वास के बीच एक गहरी खाई मौजूद है. इंटरनेशनल के दौर की व्यवस्था-विरोधी चेतना और एकजुटता की भावना का आज उस दुनिया से बहुत कम मेल है जिसे नवउदारवादी प्रतिस्पर्धा, निजीकरण और बाजारवादी सोच ने नए सिरे से गढ़ा है. उस दौर की सामूहिकता की जगह आज वैचारिक अधीनता और व्यक्तिवाद ने ले ली है.

मेहनतकश दुनिया को एक ऐतिहासिक पराजय का सामना करना पड़ा है और वामपंथ अब भी गहरे संकट से उबर नहीं पाया है. नवउदारवादी नीतियों के लंबे दौर के बाद वह व्यवस्था, जिसके खिलाफ मजदूरों ने संघर्ष किया था और कई महत्वपूर्ण जीत हासिल की थीं, फिर से शोषण की उन परिस्थितियों की ओर लौट आई है जो उन्नीसवीं सदी की याद दिलाती हैं. श्रम बाजार में लागू की गई तथाकथित ‘सुधार’ नीतियों ने, जिसका मूल प्रगतिशील अर्थ अब पूरी तरह बदल चुका है, साल-दर-साल मजदूरों के लिए अधिक ‘लचीलापन’ और नौकरी से निकाले जाने की आसान व्यवस्था लागू की है. इसके परिणामस्वरूप असमानताएं और गहरी हुई हैं. सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया ने कई बड़े राजनीतिक और आर्थिक बदलाव देखे हैं. इनमें वैश्वीकरण से पैदा हुए सामाजिक परिवर्तन, मौजूदा उत्पादन प्रणाली द्वारा पैदा की गई पर्यावरणीय तबाहियां, संपन्न और शोषक अल्पसंख्यक तथा निर्धन बहुसंख्यक आबादी के बीच लगातार चौड़ी होती खाई, पूंजीवाद के इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक संकटों में से एक – 2008 का वित्तीय संकट – युद्ध, नस्लवाद और अंधराष्ट्रवाद की तेज होती आंधियां, और हाल के वर्षों में कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी शामिल हैं.

ऐसी परिस्थितियों में वर्गीय एकजुटता पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो जाती है. स्वयं कार्ल मार्क्स ने इस बात पर जोर दिया था कि मजदूरों के बीच आपसी टकराव – चाहे वह स्थानीय और प्रवासी मजदूरों के बीच ही क्यों न हो, जिनमें से प्रवासी अक्सर भेदभाव का भी शिकार होते हैं – शासक वर्गों के प्रभुत्व को बनाए रखने का एक बुनियादी साधन है. निस्संदेह, सामाजिक संघर्षों, राजनीतिक पार्टियों और ट्रेड यूनियनों के संगठन के नए रूपों का आविष्कार करना होगा. डेढ़ सौ साल पहले अपनाए गए तौर-तरीकों को ज्यों-का-त्यों दोहराया नहीं जा सकता. लेकिन इंटरनेशनल की वह पुरानी सीख आज भी पूरी तरह सही साबित होती है कि यदि शोषित लोग एक साझा मोर्चा नहीं बनाते, तो उनकी हार निश्चित है. इसके बिना हमारे सामने केवल दो ही संभावनाएं बचती हैं – गरीबों के बीच आपसी संघर्ष और व्यक्तियों के बीच बेलगाम प्रतिस्पर्धा की दुनिया.

आज की तथाकथित ‘विश्व व्यवस्था’ की बर्बरता समकालीन मजदूर आंदोलन के सामने यह तात्कालिक आवश्यकता रखती है कि वह खुद को फिर से संगठित करे. इसके लिए उसे इंटरनेशनल की दो सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं से सीख लेनी होगी – उसके संगठनात्मक ढांचे की बहुलता और उसके लक्ष्यों की क्रांतिकारी स्पष्टता. 1864 में लंदन में स्थापित उस संगठन के उद्देश्य आज शायद पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं. लेकिन वर्तमान चुनौतियों का सामना करने के लिए किसी भी नए इंटरनेशनल को दो बुनियादी शर्तों को अपनाना होगा – बहुलतावाद और पूंजीवाद-विरोध. इन्हीं के आधार पर वह आज की दुनिया में शोषण, असमानता और युद्ध की व्यवस्था को चुनौती देने वाली एक प्रभावशाली ताकत बन सकता है.

(लिबरेशन, जून-2026 में प्रकाशित, हिंदी अनुवाद: मनमोहन)

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Gotha Programı’nın eleştirisinin 150. yılı

Engels dönemin Alman Sosyal Demokratlarının önde gelen figürlerinden August Babel’e, “olan bitene dair kendilerine tek bir kelime edilmemesini affetmeyeceğini” ve kendisinin ve Marx’ın Lassalle’cı devlet sosyalizmini temel alarak kurulmuş “bu yeni partiye asla mensup olmayacaklarını” yazmıştı.

5 Mayıs Marx’ın doğum günü olması dışında da özel bir gün: Siyasi yazıları arasında en önemlilerinden birinin de 150. yıldönümü. 1875’te Fernand Lassalle tarafından kurulan Genel Alman İşçileri Birliği ve İşçilerin Sosyal Demokrat Partisi, Marx ile birlikte yek bir siyasal güce dönüştü: Almanya Sosyalist İşçi Partisi. Marx ve Engels’e bu konuda danışılmamıştı ve Alman sosyal demokrasisinde somut sonuçlara etkilerinin ne kadar marjinal olduğunun bir kanıtı olarak, Lassalle’cı sosyal demokrasiye dayanan siyasal programın taslağı ancak bu karar alındıktan sonra kendilerine iletildi. Bu yüzden Marx Gotha şehrinde düzenlenen kongrede kararlaştırılan bu birleşmenin temellendirildiği siyasal metni ağır şekilde mahkûm ettiği uzun bir eleştiriyi yazmayı kendine görev edinmişti.

Metin mektup yoluyla sosyal demokrat lider Wilhelm Bracke’ye yollanmış, ancak Marx ve Engels’e en yakın militan grupları arasında gezmiş ve yayınlanmamıştı. Bu bağlamda, Engels dönemin Alman Sosyal Demokratlarının önde gelen figürlerinden August Babel’e, “olan bitene dair kendilerine tek bir kelime edilmemesini affetmeyeceğini” ve kendisinin ve Marx’ın Lassalle’cı devlet sosyalizmini temel alarak kurulmuş “bu yeni partiye asla mensup olmayacaklarını” yazmıştı. Bu ağır deklarasyona rağmen, Almanya Sosyalist Partisi (SAPD) haline gelecek bu örgütü inşa eden liderler pozisyonlarını değiştirmediler.

Dolayısıyla Marx 22 Mart 1875’te Gotha şehrinde düzenlenen birleşme kongresi için yazılan taslak programın uzun bir eleştirisini yazmaya kendisini mecbur hissetti. Kendi metnini içeren mektupta, “gerçek bir hareketin her adımı düzinelerce programdan daha önemlidir” demişti. Ancak “prensiplerin programları” ise son derece dikkatli yazılmalıdır, çünkü onlar “tüm dünya için partinin ne kadar ilerleyebildiğini ölçebilecek nirengi noktalarıdır”. Gotha Programının Eleştisi’nde, Marx Almanya’da taslaklaştırılan yeni manifestodaki birçok muğlaklık ve hatayı ağır şekilde eleştirmişti. Örneğin, “adil dağılım” kavramına dair eleştirisinde, tartışmacı bir biçimde “Burjuvazi bugünkü dağılımın adil olduğunu iddia etmiyor mu?” diye sormuştu. Ki hatta bugünün üretim biçimindeki tek “adil” dönüşüm bu değil mi? Kendi açısından, programa girmesi gereken siyasi talep Lassalle’ın tüm işçiler için emeğin eksiltilmemiş kazanç kavramı değil, üretim ilişkilerinin dönüştürülmesiydi. Marx, alışılagelmiş titizliği ile Lassalle’ın “ücretin ne olduğunu bilmediğini” açıklıyordu. Burjuva ekonomistlerini takip ederek, “meselenin özü yerine görünümünü” almıştı. Marx bunu, “ücretler göründüğü gibi değildir, adlı adınca emeğin değeri ya da fiyatı aslında emek gücünün değeri ya da fiyatının ancak maskelenmiş bir biçimidir. Bu sebeple ücretin bugüne kadarki tüm burjuva kavramsallaştırması ve bu kavrama karşı yine bugüne kadar geliştirilen eleştiriler, ücretli çalışanın kendi geçimi için çalışmaya rıza gösterdiği, yani kapitalist (ve artıdeğerin ortak tüketicileri) için belirli bir zaman karşılıksız çalıştığı kadar yaşadığı açığa çıktıktan sonra çöpe atılmalıdır” diye açıklıyordu.

Bir diğer tartışmalı konu ise devletin rolüne dair. Marx kapitalizmin ancak “toplumun devrimci bir dönüşümü ile” yıkılabileceğini savunuyordu. Lassalle’cılar “tüm emeğin sosyalist örgütü devlet tarafından üreticilerin dayanışmacı toplumlarına verdiği devlet desteği üzerinden yükseleceğini, bu toplumları işçilerin değil devletin var edebileceğini” savunuyorlardı. Marx açısından ise “dayanışmacı toplumlar ancak hükümetlerin ya da burjuvazinin koruması altında değil, işçilerin bağımsız üretimleri olarak ortaya çıkarsa bir değere sahip olabilirdi”; “devlet kredilerinin yeni bir demiryolu yapar gibi yeni bir toplum inşa edebileceği” fikri Lassalle’in teorik muğlaklıklarının tipik bir örneğiydi.

Neticede Marx birleşme kongresi için hazırlanan siyasi manifestonun Alman işçi örgütlerine sosyalist fikirlerin girebilmesinin zorluğunu kanıtladığını gözlemlemişti. “Gerçek demokraside devlet yok olur” temelli erken tespitleriyle uyumlu biçimde, Gotha Programının Eleştirisi’nde devlete “kendi entelektüel, ahlaki ve özgürleştirici temelleri olan bağımsız bir kuruluş” muamelesi yapmak yerine “mevcut devletin temeli mevcut toplumdur” diye yazar. Buna karşılık olarak, Wilhelm Liebknecht ve diğer Alman sosyalist liderler, birleşik bir parti kurabilmek için böyle bir programı kabul etmenin taktiksel bir karar olarak doğru olduğunu savunurlar. Bir kez daha Marx Londra ve Berlin’de alınan kararlar arasındaki büyük mesafeyle yüzleşmek zorunda kalır.

Metin Engels tarafından ancak Marx’ın ölümünün ardından, 1891’de Marx’ın fikirlerine çok daha yakın olan Erfurt Programının onaylanması sebebiyle yayınlanır. Alman Sosyal Demokrat Partisinin teorik dergisi Die Neu Zeit (Yeni Zaman) sayfalarında, bazı kısımları yumuşatılarak ve Engels tarafından metnin doğuşunun açıklandığı kısa bir girişle yayınlanır. İlk Türkçe versiyonu Fransızcadan çevrilerek 1969 yılında yayınlandı.

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Por que Karl Marx continuou retrabalhando no Capital

Não importa quantas décadas se passem desde que O Capital de Karl Marx foi publicado pela primeira vez, nem mesmo o quanto essa obra seja descartada como desatualizada, ela retorna repetidamente ao centro do debate. Com veneráveis 158 anos de idade (foi publicada pela primeira vez em 14 de setembro de 1867), a “crítica da economia política” tem todas as virtudes dos grandes clássicos: estimula novos pensamentos a cada releitura e é capaz de ilustrar aspectos cruciais de nosso presente e de nosso passado.

Um grande mérito d’O Capital é que ele nos ajuda a colocar os desenvolvimentos do momento atual em uma perspectiva histórica adequada. O famoso escritor italiano Ítalo Calvino disse que uma das razões pelas quais um clássico é um clássico é que ele nos ajuda a “relegar os acontecimentos atuais ao nível do ruído de fundo”. Tais trabalhos apontam para questões essenciais que não podem ser contornadas, a fim de compreendê-las adequadamente e encontrar um caminho através delas. É por isso que os clássicos sempre despertam o interesse de novas gerações de leitores. Permanecem indispensáveis, apesar da passagem do tempo.

Isso é exatamente o que podemos dizer d’O Capital, 158 anos após ser publicado pela primeira vez. De fato, tornou-se ainda mais poderoso à medida que o capitalismo se espalha para todos os cantos do planeta — e se expande para todas as esferas de nossa existência.

Depois que a crise econômica eclodiu em 2007–8, a redescoberta do magnum opus de Marx foi uma necessidade real — quase uma espécie de resposta emergencial ao que estava acontecendo. Se a grande obra de Marx tivesse sido esquecida após a queda do Muro de Berlim, ela forneceria chaves ainda válidas para entender as verdadeiras causas da loucura destrutiva do capitalismo. Assim, enquanto os índices do mercado de ações mundial queimaram centenas de bilhões de dólares e inúmeras instituições financeiras declararam falência, em apenas alguns meses O Capital vendeu mais cópias do que nas duas décadas anteriores.

Pena que o renascimento d’O Capital não se cruzou com o que restou das forças da esquerda política. Ela se iludiu pensando que poderia mexer em um sistema que estava cada vez mais mostrando sua irreformabilidade. Quando entrou no governo, adotou medidas paliativas leves que não fizeram nada para diminuir a crise ecológica em curso e as desigualdades socioeconômicas cada vez mais dramáticas. Os resultados dessas escolhas estão aí para todos verem.

Mas o atual renascimento d’O Capital respondeu a outra necessidade: a de definir — também graças a uma série de estudos recentes — exatamente qual é a versão mais confiável do texto ao qual Marx dedicou a maior parte de seus trabalhos intelectuais. Essa é uma questão há muito não resolvida, resultante da maneira como Marx produziu e refinou seu estudo.

As Muitas Versões do Volume I

A intenção original do revolucionário alemão, ao redigir o primeiro manuscrito preparatório (os Grundrisse, de 1857–58), fora dividir sua obra em seis volumes. Os três primeiros deveriam ser dedicados ao capital, à propriedade da terra e ao trabalho assalariado; os últimos, ao Estado, ao comércio exterior e ao mercado mundial.

Ao longo dos anos, a crescente percepção de Marx de que um plano tão vasto era impossível de realizar o forçou a desenvolver um projeto mais prático. Ele pensou em deixar de fora os três últimos volumes e integrar algumas partes dedicadas à propriedade da terra e ao trabalho assalariado no livro sobre o capital. Este último foi concebido em três partes: o Volume I seria dedicado ao Processo de Produção de Capital; o Volume II, ao Processo de Circulação de Capital, e o Volume III, ao Processo Geral da Produção Capitalista. A estes se acrescentaria um Volume IV — dedicado à história da teoria — que, no entanto, nunca foi iniciado e é, muitas vezes, confundido erroneamente com as Teorias da Mais-Valia.

Como é sabido, Marx completou apenas o Volume I. O segundo e o terceiro volumes não viram a luz do dia antes de sua morte; apareceram em 1885 e 1894, respectivamente, graças a um enorme esforço editorial de Friedrich Engels.

Se os estudiosos mais rigorosos questionaram repetidamente a confiabilidade desses dois volumes, compostos com base em manuscritos inacabados e escritos fragmentados com anos de diferença e que continham inúmeros problemas teóricos não resolvidos, poucos se dedicaram a outra questão, não menos espinhosa: se havia de fato uma versão final do Volume I.

A disputa voltou ao centro das atenções de tradutores e editores e, nos últimos anos, muitas novas edições importantes d’O Capital surgiram. Em 2024, alguns deles foram lançados no Brasil, na Itália e nos Estados Unidos, onde a Princeton University Press publicou na segunda semana de setembro a primeira nova versão em inglês em cinquenta anos (a quarta no geral) graças ao tradutor Paul Reitter e ao editor Paul North.

Publicado em 1867, após mais de duas décadas de pesquisa preparatória, Marx não estava totalmente satisfeito com a estrutura do volume. Ele acabou dividindo em apenas seis capítulos muito longos. Acima de tudo, Marx estava descontente com a maneira como expôs a teoria do valor, a qual foi forçado a dividir em duas partes: uma no primeiro capítulo e outra em um apêndice escrito às pressas após a entrega do manuscrito. Assim, a escrita do Volume I continuou a absorver as energias de Marx mesmo após ser publicado.

Em preparação para a segunda edição, vendida em partes entre 1872 e 1873, Marx reescreveu a seção crucial sobre a teoria do valor, inseriu várias adições sobre a diferença entre capital constante e variável e sobre a mais-valia, bem como sobre o uso de máquinas e tecnologia. Ele também remodelou toda a estrutura do livro, dividindo-o em sete partes, compreendendo vinte e cinco capítulos cuidadosamente divididos em seções.

Marx acompanhou de perto o processo da tradução russa (1872) e dedicou ainda mais energia à versão francesa, que apareceu — também em partes — entre 1872 e 1875. Ele teve que gastar muito mais tempo do que o esperado revisando a tradução. Insatisfeito com o texto excessivamente literal do tradutor, Marx reescreveu páginas inteiras para fazer o que ele considerava mudanças necessárias e tornar as partes carregadas de exposição dialética mais fáceis para o público francês digerir. Isso se referia principalmente à seção final, a saber “O processo de acumulação do Capital”. Ele também dividiu o texto em mais capítulos. No posfácio da edição francesa, Marx escreveu que aquela versão tinha “um valor científico independente do original” e observou que deveria “também ser consultada por leitores familiarizados com a língua alemã”.

Sem surpresas, quando uma edição em inglês foi sugerida em 1877, Marx apontou que o tradutor “necessariamente teria que comparar a segunda edição alemã com a francesa”, já que nesta última edição ele havia “adicionado algo novo e… descrito muitas coisas de forma mais adequada”. Não eram, portanto, meros retoques estilísticos. As mudanças que Marx acrescentou às várias edições também integraram os resultados de seus estudos em andamento e os desenvolvimentos de seu pensamento crítico em constante evolução.

Novamente no ano seguinte, ele revisitou a versão francesa, destacando seus prós e contras. O autor escreveu a Nikolai Danielson, o tradutor russo d’O Capital, dizendo que o texto francês continha “muitas variações e acréscimos importantes”, mas admitiu que “também foi forçado, especialmente no primeiro capítulo, a ‘achatar’ a exposição”. Assim, ele sentiu a necessidade de esclarecer que os capítulos sobre “A mercadoria e o dinheiro” e “A transformação do dinheiro em capital” deveriam ser “traduzidos exclusivamente seguindo o texto alemão”. De qualquer forma, pode-se dizer que a versão francesa constituiu muito mais do que uma tradução.

Marx e Engels tinham ideias diferentes sobre o assunto. O autor ficou satisfeito com a nova versão, considerando-a, em muitas partes, uma melhoria em relação às anteriores. Mas Engels, embora elogiasse algumas das melhorias teóricas feitas, era cético quanto ao estilo literário imposto pela língua francesa. Ele escreveu: “Acho que seria um grave erro usar a versão francesa como base para uma tradução em inglês.”

Então, quando lhe pediram, pouco depois da morte de seu amigo, que preparasse a terceira edição alemã (1883) do Volume I, Engels fez “apenas as alterações mais necessárias”. Seu prefácio dizia aos leitores que Marx pretendia “reescrever grande parte do texto do Volume I”, mas que problemas de saúde o impediam de fazê-lo. Engels fez uso de uma cópia alemã, corrigida em vários lugares pelo autor, e de uma cópia da tradução francesa, na qual Marx indicara as mudanças que considerava indispensáveis. Engels foi econômico em suas intervenções, relatando que “nem uma única palavra foi alterada nesta terceira edição sem minha firme convicção de que o próprio autor a teria modificado.” No entanto, ele não incluiu todas as mudanças apontadas por Marx.

A tradução para o inglês (1887), totalmente supervisionada por Engels, foi baseada na terceira edição alemã. Ele afirmou que este texto, como a segunda edição alemã, era superior à tradução francesa — não por causa da estrutura do capítulo. Ele esclareceu no prefácio do texto em inglês que a edição francesa havia sido usada principalmente para testar “o que o próprio autor estava disposto a sacrificar sempre que algo do significado completo do original tivesse que ser sacrificado na tradução.” Pouco antes, no artigo How Not to Translate Marx (Como Não Traduzir Marx, em livre tradução), Engels havia criticado duramente a péssima tradução de John Broadhouse de algumas páginas d’O Capital, afirmando que “o poderoso alemão requer um inglês poderoso para traduzi-lo… termos alemães recém-cunhados exigem a cunhagem de novos termos correspondentes em inglês”.

A quarta edição alemã foi publicada em 1890; foi a última preparada por Engels. Com mais tempo disponível, ele pôde integrar várias correções feitas por Marx à versão francesa, enquanto excluía outras. Engels declarou no prefácio: “Depois de comparar novamente a edição francesa e as observações de Marx, fiz mais algumas adições ao texto alemão a partir daquela tradução”. Ele ficou muito satisfeito com seu resultado final, e apenas a edição popular preparada por Karl Kautsky em 1914 fez melhorias adicionais.

Em busca da versão final

A edição de 1890 do Volume I d’O Capital, de Engels, tornou-se a versão canônica a partir da qual a maioria das traduções em todo o mundo foi feita. Até o momento, o Volume I foi publicado em 76 idiomas, e em 59 desses projetos os Volumes II e III também foram traduzidos. Com exceção do Manifesto Comunista, co-escrito com Engels e provavelmente impresso em mais de 50 milhões de cópias, bem como o Livro Vermelho, de Mao Zedong, que teve uma circulação ainda maior — nenhum outro clássico de política, filosofia ou economia teve uma circulação comparável à do Volume I d’O Capital.

Ainda assim, o debate sobre a melhor versão nunca cessou. Qual dessas cinco edições apresenta a melhor estrutura? Qual versão inclui as aquisições teóricas do velho Marx? Embora o Volume I não apresente as dificuldades editoriais dos Volumes II e III, que incluem centenas de mudanças feitas por Engels, ainda é bastante complicado.

Alguns tradutores decidiram se basear na versão de 1872-73 — a última edição alemã revisada por Marx — como no caso de Reitter e North com a nova edição inglesa. Uma versão alemã de 2017 (editada por Thomas Kuczynski) propôs uma variante que — alegando maior fidelidade às próprias intenções de Marx — inclui mudanças adicionais preparadas para a tradução francesa, mas desconsideradas por Engels. A primeira escolha tem a limitação de negligenciar partes da versão francesa que são certamente superiores à alemã, enquanto a segunda produziu um texto confuso e difícil de ler.

Melhores, portanto, são as edições que incluem um apêndice com as variantes feitas por Marx e Engels para cada versão e também alguns dos importantes manuscritos preparatórios de Marx, até agora publicados apenas em alemão e em alguns outros idiomas.

No entanto, não há uma versão definitiva do Volume I. A comparação sistemática das revisões feitas por Marx e Engels ainda depende de mais pesquisas por seus estudiosos mais cuidadosos.

Marx tem sido frequentemente chamado de antiquado, e os opositores de seu pensamento político adoram declará-lo derrotado. Mas mais uma vez, uma nova geração de leitores, militantets e estudiosos estão aprendendo com sua crítica ao capitalismo. Em tempos sombrios como o presente, este é um pequeno bom presságio para o futuro.

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Capital’s faces

Decades pass and, although Capital has often been described as an outdated text, the debate surrounding this book persists. Despite being 157 years old, Karl Marx’s critique of political economy retains all the qualities of a great classic: it sparks new insights with every reading and continues to shed light on key aspects of both the past and the present. Moreover, it has the remarkable ability to place the chronicle of the present ~ and the often-inadequate figures at its helm ~ into the relative perspective they deserve. It is no coincidence that the well known Italian writer and journalist Italo Calvino asserted that a classic is one that helps us “relegate the present to the status of background noise”. Classics point to the essential issues and inescapable truths necessary to understand the problems thoroughly and resolve them. This is why they consistently captivate new generations of readers. A classic remains indispensable despite the passage of time and, in the case of Capital, one could argue that its relevance only grows as capitalism spreads to every corner of the globe and expands into all aspects of our lives.

Returns to Marx

Following the outbreak of the 2007-2008 economic crisis, the rediscovery of Marx’s magnum opus became a real necessity, almost a response to an emergency: bringing back into circulation the text ~ long forgotten after the fall of the Berlin Wall ~ that offered still-relevant interpretative keys to understanding the true causes of capitalism’s destructive madness. As global stock market indices were burning through hundreds of billions of euros, and numerous financial institutions declared bankruptcy, within a few months Capital sold more copies than it had in the previous two decades combined. The current revival of Capital, however, responds to a different need: the need to define, thanks to the substantial body of recent scholarship, which version of the work to trust as the most reliable one.

Marx’s original intention ~ outlined in the early preparatory manuscript of the work (the Grundrisse of 1857-58) ~ was to divide his work into six books. The first three would focus on capital, landed property, and wage labour; the following books would cover the state, foreign trade, and the world market. Over time, Marx’s realization of the impossibility of undertaking such an expensive project forced him to adopt a more feasible approach. He considered leaving out the last three volumes and incorporating parts on landed property and wage labor into the book on capital.

Capital was then conceived as a three-part structure: Book I would focus on The Process of Capitalist Production, Book II on The Process of Circulation of Capital, and Book III on The Overall Process of Capitalist Production. A fourth book was plan – ned to cover the history of theory, but it was never started and is often mistakenly conflated with Theories of Surplus Value.

The Five Versions of Book I

As is well known, Marx was only able to complete Book I of Capital in accordance with his original plan. Books II and III were published posthumously, in 1885 and 1894, respectively, thanks to a massive editorial effort by Friedrich Engels.

While scholars have long debated the reliability of these two volumes ~ based on incomplete, fragmented manuscripts written years apart and containing numerous unresolved the oretical issues ~ fewer have delved into another equally crucial question: whether a definitive version of Book I existed. This debate has resurfaced, capturing the attention of translators and publishers, and this year two major new editions of Capital were released. In Italy ~ the third country after Russia and France to translate the work, which was intended as a key tool in the struggle for proletarian emancipation ~ the text was published by the prestigious Einaudi. This represents the eighth Italian translation, the first having been published in 1886.

In the United States, the prestigious Princeton University Press released, in a print run of 13,000 copies, the first new English translation in fifty years ~ the fourth English edition. First published in 1867, after over two decades of prep – a ratory research, Marx was neverfully satisfied with the structure of the volume. He ended up dividing it into just six lengthy chapters and, notably, was dissatisfied with how he presented the theory of value, which he had to split into two parts: one in the first chapter and the other in an appendix, hastily written after the manuscript had already been submitted. As a result, the work continued to occupy Marx’s attention even after its publication. In preparation for the second edition, published in installments between 1872 and 1873, Marx rewrote the crucial section on the theory of value, added various supplements addressing the distinction between constant and variable capital, surplus value, and the use of machinery and technology. He also reorganized the entire structure of the book, dividing it into seven sections, comprising 25 chapters, which were then meticulously subdivided into paragraphs.

Marx and the Translations of Capital

Marx closely followed the progress of the Russian translation (1872) as much as possible and devoted even more energy to preparing the French version, which appeared in installments bet – ween 1872 and 1875. In fact, he had to spend much more time than anticipated correcting the drafts. Dissatisfied with the work of the translator, who had rendered the text too literally, Marx rewrote entire sections to make the dialectical parts more digestible for the French audience and to implement changes he deemed essential. These revisions were mainly concentrated in the final section, dedicated to the “Process of Accumulation of Capital”.

He also altered the structure of the chapters, which increased after further adjustments to the distribution of the material. In the postscript to the French edition, Marx did not hesitate to assign it “scientific value independent of the original” and observed that it should “also be consulted by readers who know German.” Not by chance, when the possibility of an English edition arose in 1877, Marx emphasized that the translator should “necessarily compare the second German edition with the French edition”, in which he had “added something new and better described many things”. These were not merely stylistic tweaks. The changes Marx made to the various editions also reflected the results of his ongoing studies and the evolution of his critical thought. Marx and Engels differed on the issue. Marx, satisfied with the new version, considered it, in many parts, an improvement over the previous ones.

Engels, on the other hand, while praising the theoretical improvements in certain areas, was highly skeptical of the literary style imposed by the French translation, vigorously writing: “I would consider it a great mistake to take this version as the basis for the English translation.” Consequently, when Engels was asked shortly after his friend’s death to publish the third German edition (1883) of Book I, he limited his changes to “only the most necessary ones”.

In the preface, he informed the reader that Marx’s intention had been to “rework the text largely,” but that his poor health had prevented him from doing so. Engels worked with a German copy, corrected in various places by Marx, and a copy of the French translation, in which Marx had indicated the passages he considered indispensable. Angels kept his revisions to a minimum and could confidently declare: “In this third edition, no word has been changed that I am not certain the author himself would have changed”. However, he did not include all the variations Marx had indicated. The English translation (1887), fully supervised by Engels, was based on the third German edition. Engels claimed that this edition, like the second German edition, was superior to the French translation ~ especially in terms of the structure of the index. The fourth German edition was published in 1890; it was the last one prepared by Engels.

With more time at his disposal, he was able to incorporate ~ though still excluding some ~ other corrections Marx had made to the French version.

Marx and the Translations of Capital

The 1890 Engels edition became the canonical version of Capital, from which most translations worldwide were derived. However, the debate has never truly ended. Which of these five versions presents the best structure for the work? Which edition incorporates the theoretical advancements of the later Marx? The editors of the new American translation decided to rely primarily on the 1872-73 edition ~ the last German edition revised by Marx. A recent new German version (edited by T. Kuczynski) proposed an alternative that, claiming greater fidelity to Marx’s intent, includes additional changes made for the French translation.

The former has the flaw of neglecting parts of the French version that are clearly superior to the German, while the latter produced a text that is confusing and difficult to read. In contrast, the best is to include all the variants of each edition and various other preparatory manuscripts written by Marx in the long process of writing his masterpiece (the Italian translation does so). Nevertheless, no definitive version of Book I exists, and the systematic comparison of the revisions made by Marx and Engels remains a task for future scholars.

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چرا کارل مارکس مدام دست به بازنگریِ جلد اول سرمایه می‌زد؟

چرا کارل مارکس مدام دست به بازنگریِ جلد اول سرمایه می‌زد؟

مارچلو موستو

پارسا زنگنه

فایل پی دی اف:چرا کارل مارکس مدام دست به بازنگریِ جلد اول سرمایه می‌زد؟

هرچه از انتشار کتاب سرمایه اثر کارل مارکس دهه‌ها بگذرد و هرچه این اثر به‌عنوان کتابی قدیمی و بی‌استفاده به حاشیه رانده شود، بازهم مرتباً به‌ کانون مباحث باز می‌گردد. این کتاب که 157 سال قدمت دارد (نخستین‌ انتشار: 14 سپتامبر 1867)، و «نقدِ اقتصاد سیاسی» است، هنوز هم تمام ویژگی‌های یک اثر عظیمِ کلاسیک را در خود دارد: با هر بازخوانی، اندیشه‌های جدیدی را به ذهن می‌آورد و قادر است منظرهای پراهمیتی از وضعیت کنونی و گذشته را روشن سازد.

یکی از برجسته‌ترین مزایای سرمایه این است که به ما کمک می‌کند تحولات لحظۀ‌ حاضر را در چشم‌انداز تاریخی مناسبی قرار دهیم. ایتالو کالوینو نویسندۀ معروف ایتالیایی گفته یکی از دلایلی که باعث می‌شود یک اثر کلاسیکْ کلاسیک بماند، این است که به ما کمک می‌کند «رخدادهای جاری را به صدای پس‌زمینه محول کنیم». این‌گونه آثار به پرسش‌هایی ذاتی اشاره می‌کنند که تا به‌درستی درک‌شان نکنیم و از دل‌شان راهی نیابیم، نمی‌توانیم ازشان درگذریم. برایِ همین است که کلاسیک‌ها همیشه توجه نسل‌های جدیدِ خوانندگان را جلب، و با وجودِ گذشت زمان بازهم  اهمیت خود را حفظ می‌کنند. این دقیقاً همان چیزی‌ست که می‌توانیم در مورد سرمایه، و ناظر به 157 سال قدمتی که دارد، معترف باشیم. در واقع با گسترش سرمایه‌داری در جای‌جایِ کرۀ زمین و نفوذ آن به تمام حوزه‌های وجودی‌مان، این کتاب مستدل‌تر‌‌ شده است.

بازیابی اثر عظیم مارکس پس از بحران اقتصادی سال‌های 2007 تا 2008 به یک ضرورت واقعی ـ تقریباً یک پاسخ اضطراری به آنچه در حال وقوع بود ـ بدل شد. اگر پس از سقوط دیوار برلین، اثر عظیم مارکس به فراموشی سپرده شده بود، بازهم این کتاب می‌توانست به ما کمکی شایان کند تا دلایل راستینِ جنونِ ویرانگرِ سرمایه‌داری را بفهمیم. بنابرین در آن اثناء که شاخص‌های بورس جهانی صدها میلیارد دلار از دست می‌دادند و بسیاری از مؤسسات مالی ورشکسته می‌شدند، سرمایه توانست تنها ظرف چند ماه رکورد فروشِ تمام بیستِ سال گذشتۀ خود را بزند. ولی حیف! احیای سرمایه با آنچه از نیروهای چپِ سیاسی باقی‌مانده بود، مقارن نشد. خودشان را فریب دادند! فکر می‌کردند می‌توانند با نظامی که اصلاح‌ناپذیری خود را روز‌افزون نشان می‌داد، بازی کنند. وقتی وارد دولت شدند، رفتند دنبال تدابیر تسکینیِ میانه‌گرایی که هیچ تاثیری در کاهش نابرابری‌های اجتماعی-اقتصادی فزاینده و بحران زیست‌محیطی جاری نداشت. نتایج این انتخاب‌ها برای همه روشن است.

اما احیای کنونی سرمایه به یک نیاز دیگر پاسخ داد: نیاز به تدقیق اینکه ـ به‌لطف مجموعه‌ای از مطالعات جدید ـ کدام نسخه از این متن، که مارکس بیشترِ نیروی [کارِ] فکری خود را برای آن گذاشت، قابل اعتمادترین است. این پرسش مدت‌ها در تعلیق بود؛ و این برمی‌گشت به‌ شیوه‌ای که مارکس اثر خود را تولید و تکمیل کرده بود.

نسخه‌های مختلف از جلد اول

نیّت نخستینِ انقلابیِ آلمانی، [مارکس]، هنگامی که نخستین پیش‌نویس کتاب خود را آماده می‌کرد (گروندریسه 1857-1858)، این بود که اثر خود را در شش جلد تنظیم کند. سه جلد اول به سرمایه، مالکیت زمین و کار مزدی اختصاص می‌یافت و سه جلد دیگر به دولت، تجارت خارجی [یا تجارت بین‌المللی] و بازار جهانی. اما آگاهی روزافزون مارکس از اینکه چنین طرح گسترده‌ای عملی نخواهد بود، او را وادار کرد که پروژه‌ای عملی‌تر را در پیش گیرد. او از خیر سه جلد آخر گذشت و تصمیم گرفت برخی از بخش‌های مربوط به مالکیت زمین و کار مزدی را نیز در کتاب سرمایه بگنجاند. بدین‌ترتیب، سرمایه به سه بخش تقسیم شد: جلد اول به فرایند تولید سرمایه[1]، جلد دوم به فرایند گردش سرمایه[2] و جلد سوم به فرایند کلی تولید سرمایه‌داری[3] اختصاص داده شد. علاوه بر این‌ها، قرار بود جلد چهارمی هم در کار باشد و به تاریخ نظریه تخصیص یابد ـ که البته هرگز شروع نشد و اغلب با نظریه‌های ارزش اضافی اشتباه گرفته می‌شود.

همان‌طور که می‌دانیم، مارکس تنها توانست جلد اول را تمام‌وکمال به‌پایان برساند. جلدهای دوم و سوم پس از مرگ او منتشر شدند؛ جلد دوم در سال 1885 و جلد سوم در سال 1894، که به‌لطف تلاش‌های بسیار زیاد فریدریش انگلس این کار انجام شد. اگرچه محققان دقیق و سخت‌گیر بارها در مورد وثوق بودن این دو جلد پرسش‌هایی مطرح کرده‌اند، چرا که این جلدها بر اساس دست‌نوشته‌های ناقص و پراکنده‌ای نوشته شده‌اند که سال‌ها از یکدیگر فاصله داشتند و مشکلات نظری بسیاری در آن‌ها باقی مانده، اما معدود افرادی هم هستند که به این سؤال پرداخته‌اند: آیا اصلاً از جلد اول نسخه‌ای نهایی درکار است؟

این پرسش دوباره به مرکز توجه مترجمان و ناشران بازگشته، و در سال‌های اخیر نسخه‌های جدید مهمی از سرمایه منتشر شده است. برخی از این نسخه‌ها در برزیل، ایتالیا و حتی ایالات متحده در سال 2024 منتشر شدند، جایی که انتشارات دانشگاه پرینستون هفتۀ گذشته اولین نسخۀ انگلیسی جدید خود را به‌لطف مترجم پل رایتتر[4] و ویراستار پل نورث[5] پس از پنجاه سال منتشر کرد. (روی هم رفته این چهارمین نسخۀ انتشارات دانشگاه پرینستون در طول این پنجاه است).

مارکس از ساختار جلد اول که سال 1867 پس از بیش از دو دهه تحقیق مقدماتی منتشر شد، راضی نبود. او در نهایت آن را به شش فصل بسیار طولانی تقسیم کرد. بیشتر از همه، او از نحوه بیان نظریۀ ارزش ناراضی بود، زیرا مجبور شده بود آن را به دو بخش تقسیم کند: یکی در فصل اول و دیگری در پیوستی که با عجله پس از تحویل دست‌نویس نوشته شده بود. بدین ترتیب، نوشتن جلد اول حتی پس از چاپ نیز بخشی از وقت و انرژی‌ مارکس را گرفت.

در آماده‌سازی برای چاپ نسخه دوم، که مابین سال‌های 1872 و 1873 به‌صورت بخش‌به‌بخش منتشر شد، مارکس قسم‌های حیاتی مربوط به نظریۀ ارزش را بازنویسی کرد و چندین افزوده درباره تفاوت سرمایه ثابت و متغیر و ارزش اضافی، و همچنین در مورد استفاده از ماشین‌آلات و فناوری افزود. او همچنین ساختار کلی کتاب را بازطراحی، و آن را به هفت بخش تقسیم کرد که در مجموع شامل بیست و پنج فصل بود، که به‌طور دقیق‌ترْ خود به بخش‌هایی تقسیم می‌شدند.

مارکس با دقت فرآیند ترجمۀ روسی (1872) را پی گرفت، و انرژی بیشتری را نیز برای نسخۀ فرانسوی که مابین سال‌های 1872 و 1875 به‌صورت بخش‌به‌بخش منتشر شد، صرف کرد. او مجبور شد زمان بیشتری از آنچه انتظار داشت صرف بررسی ترجمه کند. از آن‌جا که از ترجمۀ تحت‌اللفظی مترجم ناراضی بود، صفحات زیادی را بازنویسی کرد تا بخش‌هایی را که مملو از تفصیل‌های[6] دیالکتیکی بودند برای مخاطبان فرانسوی‌زبان قابل‌هضم‌تر کند. او تغییرات لازم را ایجاد کرد. این تغییرات عمدتاً مربوط به بخش پایانی کتاب بودند که به «فرایند انباشت سرمایه[7]» اختصاص داشت. او همچنین متن را به فصول بیشتری تقسیم کرد. در پیوست نسخه فرانسوی، مارکس نوشت که، نسخه فرانسوی «ارزش علمی مستقلی از نسخه اصلی» دارد و افزود که باید «با خوانندگانی که با زبان آلمانی آشنا هستند نیز مورد مشورت قرار گیرد».

بدیهی است که وقتی در سال 1877 پای نسخه‌ای انگلیسی به‌میان آمد، مارکس خاطرنشان کرد که مترجم «ضرورتاً باید نسخۀ دوم آلمانی را با نسخۀ فرانسوی مقایسه کند»؛ زیرا در این نسخۀ اخیر [فرانسوی] «چیزهای جدیدی اضافه کرده و بسیاری از موارد را بهتر توضیح داده» بود. بنابراین این‌ها تنها اصلاحات ظاهری نبودند. تغییراتی که او به نسخه‌های مختلف اضافه کرد، نتایج مطالعات مستمرش و اندیشۀ انتقادیِ همیشه-در-حال-تحولش را باهم ادغام کرد.

مارکس نسخۀ فرانسوی را مرور، و مزایا و معایب آن را دوباره در سال بعد بررسی کرد. او به نیکولای دانیلسون[8]، که مترجم روسی سرمایه بود نوشت که، متن فرانسوی شامل «تغییرات و افزوده‌های مهم بسیاری است»، و اذعان داشت که مجبور شده «تفصیل‌ها را» به‌ویژه در فصل اول «باز‌تر» کند. بنابراین او احساس می‌کرد که باید تصریح کند که فصول مربوط به «کالا و پول[9]» و «دگرگونی پول به سرمایه[10]» باید «فقط بر اساس متن آلمانی ترجمه شوند». در هر صورت، می‌توان گفت که نسخۀ فرانسوی بسی بیش از یک ترجمه بود.

مارکس و انگلس در این مورد نظرات متفاوتی داشتند. نویسنده از نسخۀ جدید خوشحال بود و آن را در بسیاری از قسم‌ها بهبودیافته می‌دانست. اما انگلس، هرچند برخی از بهبودهای نظری را تأیید کرد، از سبک ادبی‌ای که زبان فرانسوی تحمیل کرده بود، مردد بود. او نوشت: «فکر می‌کنم استفاده از نسخۀ فرانسوی به‌عنوان مبنای ترجمه انگلیسی اشتباه بزرگی باشد».

بنابراین، هنگامی که از انگلس خواسته شد کمی بعد از مرگ رفیقش نسخۀ سوم آلمانی از جلد اول (1883) را آماده کند، «تنها ضروری‌ترین تغییرات» را اعمال کرد. پیشگفتارش به خوانندگان می‌گفت، مارکس قصد داشت «بخش زیادی از متن جلد اول را بازنویسی کند»، اما مشکلات سلامتی مانع از انجام این کار شده بود. انگلس از یک نسخه آلمانی استفاده کرد که در چندین بخش توسط خود مارکس اصلاح شده بود و نسخه‌ای از ترجمۀ فرانسوی که مارکس تغییرات ضروری را در آن نشان داده بود. انگلس در اصلاحات خود محدود بود و گزارش داد که «هیچ کلمه‌ای در این نسخه سوم تغییر داده نشد، مگر اینکه من به‌طور قطعی معتقد بودم که خود نویسنده هم آن را تغییر می‌داد». با این همه، او تمام تغییرات مورد نظر مارکس را درج نکرد.

ترجمه انگلیسی (1887)، که کاملاً تحت نظارت انگلس انجام شد، بر اساس نسخۀ سوم آلمانی بود. او تأکید کرد که این متن، مانند نسخۀ دوم آلمانی، از ترجمه فرانسوی برتر است ـ مخصوصاً به‌دلیل ساختار فصولی که دارد. او در پیشگفتار نسخۀ نگلیسی توضیح داد که نسخۀ فرانسوی بیشتر برای این استفاده شده که، «نویسنده تا چه حد خودش آماده بوده که در ترجمه، معنای کامل متن اصلی را فدای چیزی کند». انگلس مدتی قبل‌تر، در مقاله‌ای با عنوان «مارکس را چگونه ترجمه نکنیم[11]»، به شدت ترجمۀ ضعیف جان برودهاوس[12] از برخی صفحات سرمایه را کوبید، و گفت: «آلمانی قوی به انگلیسی قوی نیاز دارد تا بتواند آلمانی-به-انگلیسی را به‌درستی منتقل کند […] واژه‌های جدید آلمانی به معادل‌هایِ تازه‌ای در انگلیسی نیاز دارند».

نسخۀ چهارم آلمانی در سال 1890 منتشر شد؛ این آخرین نسخه‌ای بود که انگلس آماده کرده بود. او با زمان بیشتری که در اختیار داشت، توانست اصلاحات بیشتری را که مارکس در نسخۀ فرانسوی انجام داد، به‌متن وارد کند، هرچند از خیر برخی‌شان هم گذشت. انگلس در پیشگفتارش نوشت: «پس از مقایسه مجدد نسخۀ فرانسوی و یادداشت‌های دست‌نوشتۀ مارکس، من چندین افزودۀ دیگر را از آن ترجمه به متن آلمانی اضافه کرده‌ام». او از نتیجۀ نهایی خود بسیار راضی بود. فقط در آن نسخۀ مشهوری که کارل کائوتسکی در سال 1914 آماده کرد، تغییرات بیشتری اعمال شد.

در جست‌وجوی نسخۀ نهایی

نسخۀ 1890 انگلس از جلد اولِ سرمایه، به نسخۀ مرجع تبدیل شد، و بیشتر ترجمه‌های جهانی از روی آن صورت گرفت. تاکنون، جلد اول به 66 زبان منتشر شده و در 59 مورد از این پروژه‌ها، جلدهای دوم و سوم نیز ترجمه شده‌اند. به‌جز مانیفست کمونیست، که به‌طور مشترک با انگلس نوشته شده و احتمالاً بیش از 500 میلیون نسخه از آن چاپ شده، و همچنین کتاب کوچک سرخِ[13] مائو که تیراژ بسیار بیشتری داشت ـ هیچ‌کدام از کلاسیک‌های سیاست، فلسفه یا اقتصاد، دارای چاپی به‌اندازۀ جلد اول سرمایه نبوده‌اند.

با این حال، بحث دربارۀ بهترین نسخه همچنان ادامه دارد. کدام یک از این پنج نسخه ساختار بهتری دارد؟ کدام نسخه شامل دستاوردهای نظری مارکس در سال‌های بعد است؟ اگرچه جلد اول مشکلات و پیچیدگی‌های [ویرایشی] نسخه‌های دوم و سوم را ندارد ـ که شامل صدها تغییر انجام‌شده توسط انگلس است ـ اما کماکان نیز چالش‌برانگیز است.

برخی از مترجمان تصمیم گرفته‌اند به نسخه 1872–1873، آخرین نسخۀ آلمانی که مارکس اصلاح کرده بود، تکیه کنند، همانطور که رایتتر و نورث در نسخۀ جدید انگلیسی نیز این کار را کرده‌اند. نسخۀ آلمانی 2017 (ویرایش‌شده توسط توماس کوچینسکی[14]) پیشنهادی متفاوت ارائه داده، و مدعی‌ست به نیات مارکس وفادارتر است. این نسخه شامل تغییرات بیشتری می‌شود؛ همان تغییراتی که برای ترجمۀ فرانسوی آماده شدند، اما انگلس بیخیال‌شان شد. اولی محدودیتی دارد، در این که بخش‌هایی از نسخه فرانسوی که قطعاً از نسخه آلمانی بهتر هستند نادیده گرفته شده‌اند، اما دومی متن را برای خواندن پیچیده و دشوار کرده است.

بنابراین آن نسخه‌هایی بهتر هستند که پیوستی با تغییرات انجام‌شده توسط مارکس و انگلس برای هر نسخه دارند، و همینطور برخی از دست‌نوشته‌های مهم مارکس را هم که تاکنون تنها به زبان آلمانی و چند زبان دیگر منتشر شده‌اند، شامل باشند. با این همه، هنوز هیچ نسخه‌ای نهایی از جلد اول وجود ندارد. مقایسه نظام‌مند اصلاحات انجام‌شده توسط مارکس و انگلس هنوز نیازمند تحقیق بیشتر از سوی دقیق‌ترین دانش‌آموزان آن‌ها است.

مارکس اغلب قدیمی و منسوخ خوانده شده است و مخالفان اندیشه‌های سیاسی‌اش دوست دارند از او یک شکست‌خورده بسازند. اما دوباره، نسل جدیدی از خوانندگان، فعالان و پژوهشگران در حال مطالعۀ نقدِ او بر سرمایه‌داری هستند. در روزهای تاریکی مثل امروز، این نوید کوچکی برای فرداست.

منبع

[1] The Process of Capital Production

[2] The Process of Capital Circulation

[3] The Overall Process of Capitalist Production

[4] Paul Reitter

[5] Paul North

[6] dialectical exposition

[7] The Process of Capital Accumulation

[8] Nikolai Danielson

[9] The Commodity and Money

[10] The Transformation of Money into Capital

[11] How Not to Translate Marx

[12] John Broadhouse

[13] The Little Red Book

[14] Thomas Kuczynski

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A genealogia do conceito de capitalismo

A palavra capitalismo raramente foi usada por Marx, e também estava ausente dos primeiros grandes clássicos da economia política

Embora Karl Marx seja considerado o principal crítico do capitalismo, ele raramente usou esse termo. A palavra também estava ausente dos primeiros grandes clássicos da economia política. Não só não tinha lugar nas obras de Adam Smith e David Ricardo, como também não foi usado nem por John Stuart Mill nem pela geração de economistas contemporâneos de Marx. Eles usaram o termo capital — comum desde o século XIII – mas não o termo capitalismo, que dele se deriva.

O termo capitalismo não apareceu até meados do século XIX. Era uma palavra usada principalmente por aqueles que se opunham à ordem existente das coisas, o qual tinha ademais uma conotação muito mais política do que econômica. Alguns pensadores socialistas foram os primeiros a usar essa palavra, sempre de forma depreciativa. Na França, em uma reedição da famosa obra L’organisation du travail, Louis Blanc argumentou que a apropriação do capital – e, através do próprio capital, do poder político – era monopolizada pelas classes abastadas.

Estas classes o concentraram em suas próprias mãos e, assim, restringiram o acesso a ele para outras classes sociais. Longe de tentar derrubar as bases econômicas da sociedade burguesa, Louis Blanc se declarou a favor da “supressão do capitalismo, mas não do capital”. Na Alemanha, o economista Albert Schäffle, ridicularizado com o epíteto de “socialista de poltrona”, em seu livro Capitalismo e socialismo, defendeu reformas do Estado para aliviar os amargos conflitos que se espalhavam amplamente, devido à “hegemonia do capitalismo”.

Desde seu primeiro uso, não havia uma definição compartilhada do conceito de capitalismo. Porém, essa dificuldade mudou mais tarde, quando o termo se espalhou amplamente e ganhou popularidade. As obras Capitalismo moderno, de Werner Sombart, e A ética protestante e o espírito do capitalismo, de Max Weber, ambas publicadas no início do século XX, destinavam-se a mostrar – apesar de algumas diferenças – a essência do capitalismo no espírito de iniciativa, no cálculo racional frio e na busca sistemática do benefício pessoal.

Elas contribuíram muito para a popularização deste termo. No entanto, foi sobretudo graças à difusão da crítica marxista da sociedade que a palavra capitalismo – à qual a Enciclopédia Britânica não dedicou um verbete até 1922 – adquiriu um cartão de cidadania nas ciências sociais.

Além disso, depois de ter sido deixado à margem, se não explicitamente rejeitado, pelo discurso teórico das principais correntes da economia política, foi por meio da obra de Marx que o conceito de capitalismo ganhou centralidade mesmo nessa disciplina. Em vez de ser concebido como sinônimo de prática decisória política destinada a beneficiar as classes dominantes, por meio de Marx adquiriu o significado de um sistema específico de produção, baseado na propriedade privada das fábricas e na criação de mais-valia.

A contribuição involuntária de Marx para a propagação do termo “capitalismo” foi, de certa forma, paradoxal. Totalmente ausente dos livros que publicou, mesmo em seus manuscritos o termo Kapitalismus foi usado muito esporadicamente. Ele só apareceu em cinco ocasiões, sempre en passant, e sem que ele nunca fornecesse uma descrição específica da expressão. Marx provavelmente considerou que essa noção não estava suficientemente focada na economia política, mas, ao contrário, estava ligada a uma crítica da sociedade que era mais moral do que científica. De fato, quando teve que escolher o título de sua magnum opus, optou pelo uso do termo “capital” e não por “capitalismo”.

Em vez dessa palavra, ele preferiu outras que considerava mais apropriadas para definir o sistema econômico e social existente. Nos Grundrisse, ele se referiu ao “modo de produção do capital”, enquanto alguns anos depois, começando com os Manuscritos Econômicos de 1861-63, ele adotou a fórmula “modo de produção capitalista”. Essa expressão também aparece no Primeiro Livro de O capital, cujo famoso parágrafo inicial diz: “A riqueza das sociedades nas quais predomina o modo de produção capitalista aparece como uma imensa coleção de mercadorias”. A partir de então, na tradução francesa, bem como na segunda edição alemã, do Volume I de O capital, Marx também usou a fórmula “sistema capitalista”. Ele o repetiu nos rascunhos preliminares da famosa carta a Vera Zasulich em 1881.

Nesses e em vários outros escritos sobre a crítica da economia política, Karl Marx não forneceu uma definição concisa e sistemática do que era o modo de produção capitalista. O modus operandi do capitalismo só pode ser plenamente compreendido conectando as múltiplas descrições de sua dinâmica contidas em O capital.

No Volume I, Marx afirmou que “o traço característico da época capitalista é o fato de que a força de trabalho também assume a forma de uma mercadoria pertencente ao próprio trabalhador, enquanto seu trabalho assume a forma de trabalho assalariado”. A diferença crucial com o passado é que os trabalhadores não vendem os produtos de seu trabalho – que no capitalismo não são mais sua propriedade – mas o seu próprio trabalho.

Para Marx, o processo de produção capitalista se baseia na separação da força de trabalho e das condições de trabalho, condição que o capitalismo “reproduz e perpetua” para garantir a exploração permanente do proletariado. Este modo de produção “obriga o trabalhador a vender constantemente sua força de trabalho para viver e constantemente permite que o capitalista a compre para enriquecer”.

Além disso, Marx enfatizou que o capitalismo difere de todos os modos anteriores de organização produtiva por outra razão peculiar. Consiste na “unidade do processo de trabalho e do processo de criação de valor”. Ele descreveu o processo de produção capitalista como um modo de produção que tem uma natureza dupla: “por um lado, é um processo de trabalho social para a fabricação de um produto, por outro lado, é um processo de valorização do capital”.

O que impulsiona o modo de produção capitalista “não é o valor de uso ou o prazer, mas o valor de troca e [sua] multiplicação”. O capitalista foi descrito por Marx como um “fanático da valorização do valor”, um ser que “obriga inescrupulosamente a humanidade a produzir por produzir”.

Dessa forma, o modo de produção capitalista gera a expansão e concentração do proletariado, juntamente com um nível sem precedentes de exploração da força de trabalho.

Finalmente, embora certamente se concentre na economia, a análise de Marx do sistema capitalista não foi direcionada exclusivamente às relações de produção, mas constituiu uma crítica abrangente da sociedade burguesa que incluía a dimensão política, as relações sociais, as estruturas jurídicas e a ideologia, bem como as implicações que elas determinam em cada indivíduo.

Portanto, ele não considerava o capital como “uma coisa, mas como uma relação social específica de produção, pertencente a uma formação histórica específica da sociedade”. Portanto, não é eterno e pode ser substituído – através da luta de classes – por uma organização socioeconômica diferente.

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„BORBA”, iz knjige „Pozni Marks, 1881–1883: Intelektualna biografija”

Avgusta 1880. godine, Džon Svinton (John Swinton, 1829–1901), uticajni liberalni američki novinar, bio je na proputovanju Evropom.[1] Po dolasku u Evropu posetio je Ramsgejt, primorski gradić u okrugu Kent, nekoliko kilometara udaljen od jugoistične obale Engleske. Cilj ovog putovanja bio je da se uradi intervju za Sunce (The Sun) – novinski list koji je uređivao, a koji je u to vreme bio jedan od najčitanijih u Sjedinjenim Državama – s čovekom koji je postao jedan od glavnih predstavnika međunarodnog radničkog pokreta: Karlom Marksom.
Premda je bio Nemac po rođenju, Marks je ostao bez državljanstva nakon što su ga francuske, belgijske i pruske vlade, koje su ugušile revolucionarne pokrete koji su buknuli u njihovim zemljama između 1848. i 1849. godine, proterale. Kada je 1874. podneo zahtev za državljanstvom u Velikoj Britaniji, on je odbijen jer je njegov podnosilac u izveštaju Skotland Jarda[2] označen kao „ozloglašeni nemački revolucionar i pristalica komunističkih ideja”, koji „nije bio odan kralju i otadžbini”.[3]
Više od jedne decenije bio je dopisnik lista Njujorška dnevna tribina (New-York Daily Tribune); 1867. godine objavio je najveću kritiku kapitalističkog načina proizvodnje pod naslovom Kapital, a osam godina, počevši od 1864, bio je vodeća ličnost Međunarodnog udruženja radnika (International Workingmen’s Association). Godine 1871. njegovo ime se pojavilo na stranicama najčitanijih evropskih listova, nakon što ga je, posle odbrane Pariske komune u spisu Građanski rat u Francuskoj (The Civil War in France) (1871), reakcionarna štampa krstila kao „doktora crvenog terora”.[4]
U leto 1880, po naređenju lekara da se „uzdrži od svakog rada”[5] i da, „’ne radeći ništa’, oporavi živce”,[6] boravio je sa svojom porodicom u Ramsgejtu. Njegova žena je bila u gorem zdravstvenom stanju nego on. Dženi fon Vestfalen (Jenny von Westphalen, 1814–1881) bolovala je od raka i njeno stanje se „odjednom […] pogoršalo tako da je pretio koban završetak”.[7] Ovo je bila atmosfera u kojoj je Svinton, glavni urednik lista Njujorška vremena (New York Times) u 1860-im, upoznao Marksa i dao saosećajan, izražajan i brižljiv portret njegove ličnosti.
S ljudske strane, Svinton je opisao Marksa kao „šezdesetogodišnjeg ljubaznog i dobrodušnog čoveka, s masivnom glavom, plementim crtama i masom duge, guste, nepokorne sede kose”, koji „nimalo ne zaostaje za Viktorom Igoom u umeću da bude deda”.[8] Njegov stil vođenja razgovora, „tako […] slobodan, širok, tako konstruktivan, oštrouman i iskren”, podsetio je Svintona na Sokrata, s njegovim „sarkazmom, odblescima humora i izazovnog veselja”. Uz to je primetio: „Čovek koji ne teži ni za spoljašnjim efektom, ni za slavom, nimalo se ne zanimajući za svetsku fanfanoradu, ni za pretenzije na vlast”.[9]
Ovo, međutim, nije bio jedini portret Marksa kojeg će Svinton predstaviti čitaocima. Intervju koji se pojavio na naslovnoj strani lista Sunce uglavnom je opisivao njegovo javno lice: „Jedan od najistaknutijih ljudi našeg vremena […], koji je igrao zagonetnu, no bez sumnje snažnu ulogu u revolucionarnoj politici tokom prošlih 40 godina”. Svinton je nastavio:
„Neprenagljen i neumoran, čovek silnog, širokog i uzvišenog uma, sav utonuo u dalekosežne zamisli, logičke metode, praktične ciljeve […] je stajao i do danas stoji iza većeg broja kataklizama koje su potresale narode i rušile prestolja, koje i sad prete i ulivaju strah krunisanim glavama i varalicama što zauzimaju državne položaje”.[10]
Razgovor s Marksom uverio je njujorškog novinara da se našao oči u oči s čovekom koji je „duboko shvatio savremenost”, čija je ruka „od Neve pa do Sene, od Urala pa do Pirineja, pripremala tlo” za novo vreme. Očaralo ga je Marksovo umeće „obuhvatanja pogledom evropskog sveta, zemlje po zemlje, oslikavajući karakteristične crte, događaje i ličnosti – one na površini i one skrivene u dubini”. Marks je govorio o Svintona je iznenadilo i njegovo poznavanje Sjedinjenih Država. Bio je pažljiv posmatrač i „neka njegova zapažanja o snagama koje igraju bitnu ulogu u formiranju američkog života podsticala su na razmišljanje”.
„političkim snagama i narodnim pokretima u raznim zemljama Evrope – o grandioznom duhovnom kretanju u Rusiji, o intelektualnim naprecima u Nemačkoj, o kretanju u Francuskoj i stagnaciji u Engleskoj. Govorio je s nadom o Rusiji, filozofski o Nemačkoj, radosno o Francuskoj i namršteno o Engleskoj, prezrivo spominjući ’atomističke reforme’ na koje su traćili vreme liberali u engleskom parlamentu”[11]
Dan je prošao u uzbidljivim razgovorima. U popodnevnim satima Marks je predložio Svintonu da „prošetaju primorskim gradom” kako bi upoznao njegovu porodicu, koju je potonji opisao kao „divnu družinu od desetak ljudi”. Kad se spustilo veče, Marksovi zetovi Šarl Longe (Charles Longuet, 1839–1903) i Pol Lafarg (Paul Lafargue, 1842–1911) nastavili su da im prave društvo; govorilo se o „svetu, čoveku, vremenu i idejama, dok su naše čaše zvečale nad morem”. U jednom od ovih trenutaka je američki novinar, „razmišljajući o taštini i mukama našega veka i prošlih vekova”, uronivši u dubine „danjih razgovora i večernjih prizora”, skupio hrabrosti da velikanu postavi pitanje u vezi s „odlučujućim zakonom postojanja”. Tada je, za vreme šutnje, „prekinuo […] revolucionara i filozofa […] odsutnim rečima: ’Šta je bitak?’” Svinton je osetio da je Marksov um „za trenutak […] bio okrenut u sebe dok je gledao na hučno more […] i nemirnu gomilu na obali”. Najzad, Marks, u ozbiljnom i svečanom tonu, odgovori: „’Borba!’”[12]

[1] Videti poglavlje: “John Swinton, Crusading Editor,” u Sender Garlin, Three American Radicals: John Swinton, Charles P. Steinmetz, and William Dean Howells (Boulder, CO: Westview Press, 1991).

[2] Naziv zgrade u kojoj se nalazi centralna uprava engleske policije u Londonu; figurativno, engleska policija. Prim. prev.

[3] Videti policijski izveštaj: “Declaration by Karl Marx on His Naturalisation in England,” MECW, 24: 564.

[4] Videti: Marksovo pismo Fridrihu Adolfu Zorgeu, 27. septembar 1877, MED, 41: 268.

[5] Marksovo pismo Ferdinandu Domeli Nievenhojsu, 27. jun 1880, MED, 41: 402.

[6] Marksovo pismo Nikolaju Franceviču Danijelsonu, 12. septembar 1880, MED, 41: 415.

[7] Marksovo pismo Nikolaju Franceviču Danijelsonu, 12. septembar 1880, MED, 41: 415.

[8] John Swinton, „Razgovor s Karlom Marxom”, u Sjećanja na Marxa i Engelsa, ur. Zvonko Tkalec (Zagreb: Globus, 1978), 123–124.

[9] John Swinton, „Razgovor s Karlom Marxom,” u Tkalec, Sjećanja na Marxa i Engelsa, 123.

[10] John Swinton, „Razgovor s Karlom Marxom,” u Tkalec, Sjećanja na Marxa i Engelsa, 123.

[11] John Swinton, „Razgovor s Karlom Marxom,” u Tkalec, Sjećanja na Marxa i Engelsa, 123.

[12] John Swinton, „Razgovor s Karlom Marxom,” u Tkalec, Sjećanja na Marxa i Engelsa, 124–125.

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La insólita genealogía del concepto de capitalismo

Aunque Karl Marx es considerado el principal crítico del capitalismo, rara vez utilizó este término. La palabra también estuvo ausente de los primeros grandes clásicos de la economía política. No sólo no tuvo cabida en las obras de Adam Smith y David Ricardo, sino que ni siquiera fue utilizada por John Stuart Mill, ni por la generación de economistas contemporáneos de Marx. Más bien utilizaron capital -de uso común desde el siglo XIII- y capitalismo.

El término capitalismo no apareció hasta mediados del siglo XIX. Era una palabra utilizada principalmente por quienes se oponían al orden de cosas existente y tenía una connotación mucho más política que económica. Algunos pensadores socialistas fueron los primeros en utilizar esta palabra, siempre de forma despectiva. En Francia, en una reedición de la célebre obra L’organisation du travail, Louis Blanc sostenía que la apropiación del capital -y, a través del propio capital, del poder político- estaba monopolizada por las clases acomodadas. Éstas lo concentraban en sus propias manos y restringían el acceso a él de las demás clases sociales. Lejos de pretender derribar los fundamentos económicos de la sociedad burguesa, se pronunció a favor de la «supresión del capitalismo, pero no del capital». En Alemania, el economista Albert Schäffle, burlado con el epíteto de «socialista de sillón», en su libro Capitalismo y socialismo, abogaba por reformas desde el Estado para paliar los agrios conflictos que se extendían ampliamente, debido a «la hegemonía del capitalismo».

Desde su primer uso, no hubo una definición compartida del concepto de capitalismo, y esta dificultad ni siquiera cambió más tarde, cuando el término se extendió ampliamente y ganó su popularidad. Las obras El capitalismo moderno, de Werner Sombart, y La ética protestante y el espíritu del capitalismo, de Max Weber, publicadas ambas a principios del siglo XX y destinadas a mostrar -a pesar de algunas diferencias- la esencia del capitalismo en el espíritu de iniciativa, en el frío cálculo racional y en la búsqueda sistemática del beneficio personal, contribuyeron en gran medida a la popularización de este término. Sin embargo, fue sobre todo gracias a la difusión de la crítica marxista de la sociedad que la palabra capitalismo -a la que la Enciclopedia Británica no dedicó una entrada hasta 1922- adquirió carta de ciudadanía en las ciencias sociales.

Además, después de haber quedado al margen, cuando no explícitamente rechazado, del discurso teórico de las principales corrientes de la economía política, fue a través de la obra de Marx que el concepto de capitalismo ganó centralidad incluso en esta disciplina. En lugar de ser concebido como sinónimo de decisiones políticas destinadas a beneficiar a las clases dominantes, a través de Marx adquirió el significado de un sistema específico de producción, basado en la propiedad privada de las fábricas y la creación de plusvalía.

La contribución involuntaria de Marx a la propagación del término «capitalismo» fue, en cierto modo, paradójica. Totalmente ausente de los libros que imprimió, incluso en sus manuscritos el término Kapitalismus se utilizó muy esporádicamente. Sólo apareció en cinco ocasiones, siempre en passant, y sin que él diera nunca una descripción específica del mismo. Probablemente, Marx consideraba que esta noción no estaba suficientemente centrada en la economía política, sino, por el contrario, vinculada a una crítica de la sociedad más moral que científica. De hecho, cuando tuvo que elegir el título de su obra magna, optó por El Capital y no por «Capitalismo».

En lugar de esta palabra, prefirió otras que consideraba más apropiadas para definir el sistema económico y social existente. En los Grundrisse, se refirió al «modo de producción del capital», mientras que unos años más tarde, a partir de los Manuscritos económicos de 1861-63, adoptó la fórmula «modo de producción capitalista». Esta expresión aparece también en el Primer Libro de El Capital, cuyo famoso incipit, de hecho, reza: «La riqueza de las sociedades en las que predomina el modo de producción capitalista se presenta como una inmensa colección de mercancías». A partir de entonces, en la traducción francesa, así como en la segunda edición alemana, del Volumen I de El Capital, Marx utilizó también la fórmula «sistema capitalista». La repitió en los borradores preliminares de la famosa carta a Vera Zasulich de 1881.

Tanto en éstos como en otros numerosos escritos sobre la crítica de la economía política, Marx no proporcionó una definición concisa y sistemática de lo que era el modo de producción capitalista. Sólo se puede comprender plenamente el modus operandi del capitalismo conectando las múltiples descripciones de su dinámica contenidas en El Capital.

En el volumen I, Marx afirmaba que «el rasgo característico de la época capitalista es el hecho de que la fuerza de trabajo adopta también la forma de una mercancía que pertenece al propio trabajador, mientras que su trabajo adopta la forma de trabajo asalariado». La diferencia crucial con el pasado es que los trabajadores no venden los productos de su trabajo -que en el capitalismo ya no son de su propiedad- sino su propio trabajo.

Para Marx, el proceso de producción capitalista se basa en la separación de la fuerza de trabajo y de las condiciones de trabajo, una condición que el capitalismo «reproduce y perpetúa» para garantizar la explotación permanente del proletariado. Este modo de producción «obliga al obrero a vender constantemente su fuerza de trabajo para vivir y permite constantemente al capitalista comprarla para enriquecerse». Además, Marx subrayó que el capitalismo difiere de todos los modos anteriores de organización productiva por otra razón peculiar. Se trata de la «unidad del proceso de trabajo y del proceso de creación de valor». Describió el proceso de producción capitalista como un modo de producción que tiene una naturaleza dual: «por un lado es un proceso de trabajo social para la fabricación de un producto, por otro lado, es un proceso de valorización del capital». Lo que impulsa el modo de producción capitalista «no es el valor de uso ni el disfrute, sino el valor de cambio y [su] multiplicación». El capitalista fue descrito por Marx como un «fanático de la valorización del valor», un ser que «obliga sin escrúpulos a la humanidad a producir por producir».

De este modo, el modo de producción capitalista genera la expansión y concentración del proletariado, junto con un nivel sin precedentes de explotación de la fuerza de trabajo.

Por último, aunque ciertamente se centraba en la economía, el análisis de Marx del sistema capitalista no se dirigía exclusivamente a las relaciones de producción, sino que constituía una crítica global de la sociedad burguesa que incluía la dimensión política, las relaciones sociales, las estructuras jurídicas y la ideología, así como las implicaciones que determinan en cada uno de los individuos. Por lo tanto, no consideraba el capital como «una cosa, sino como una relación social de producción específica, perteneciente a una formación histórica específica de la sociedad». Por tanto, no es eterno y puede ser sustituido -mediante la lucha de clases- por una organización socioeconómica diferente.

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The Unusual Genealogy of the Concept of Capitalism

Even though Karl Marx is considered the main critic of capitalism, he rarely used this term. The word was also absent from the early great classics of political economy. Not only did it not find a place in the works of Adam Smith and David Ricardo, but it was also not even used by John Stuart Mill, nor by the generation of economists contemporary with Marx. They rather used capital–commonly used since the 13th century–and capitalism.

The term capitalism did not appear until the mid-19th century. It was a word mainly used by those opposing the existing order of things and had a much more political rather than economic connotation. Some socialist thinkers were the first ones to use this word, always in a disparaging manner. In France, in a reprint of the renowned work L’organisation du travail, Louis Blanc argued that the appropriation of capital–and, through the capital itself, of political power–was monopolised by the wealthy classes. They concentrated it in their own hands and restricted access to it for the other social classes. Far from seeking to overturn the economic foundations of bourgeois society, he spoke in favour of the “suppression of capitalism but not of capital”. In Germany, the economist Albert Schäffle, mocked with the epithet ‘armchair socialist’, in his book Capitalism and Socialism, argued in favour of reforms from the state to ease the bitter conflicts that were widely spreading, due to ‘the hegemony of capitalism’.

Since its first use, there was no shared definition of the concept of capitalism, and this difficulty did not even change later on when the term widely spread and gained its popularity. The works Modern Capitalism, by Werner Sombart, and The Protestant Ethic and The Spirit of Capitalism, by Max Weber, were both published at the beginning of the 20th century and meant to show–despite some differences–the essence of capitalism in the spirit of initiative, in the cold rational calculation and the systematic pursuit of personal profit, greatly contributed to the popularisation of this term. However, it was mainly due to the spread of the Marxist critique of society that the word capitalism–to which the Encyclopaedia Britannica did not dedicate an entry until 1922–gained its citizenship in the social sciences.

Moreover, after being left on the margins, when not explicitly rejected, of the theoretical discourse of the main currents of political economy, it was through Marx’s work that the concept of capitalism gained centrality even in this discipline. Rather than being conceived as a synonym for political decisions aimed at benefiting the ruling classes, through Marx it took on the meaning of a specific system of production, based on the private property of factories and the creation of surplus value.

Marx’s unintended contribution to the propagation of the term ‘capitalism’ was, in some ways, paradoxical. Completely absent from the books he printed, even in his manuscripts the term Kapitalismus was used very sporadically. It only appeared on five occasions, always en passant, and without him ever giving a specific description of it. Probably, Marx felt that this notion was not sufficiently focused on political economy, but, instead, linked to a critique of society that was more moral than scientific. Indeed, when he had to choose the title of his magnum opus, he opted for Capital and not ‘Capitalism’.

In place of this word, he preferred other ones that he considered more appropriate to define the existing economic and social system. In the Grundrisse, he referred to the ‘capital mode of production’, while a few years later, starting with the Economic Manuscripts of 1861-63, he adopted the formula ‘capitalist mode of production’. This expression also appeared in the First Book of Capital, whose famous incipit, in fact, reads: “The wealth of societies in which the capitalist mode of production predominates is presented as a huge collection of commodities”. Thereafter, in the French translation, as well as in the second German edition, of Capital Volume I, Marx also used the formula ‘capitalist system’. He repeated it in the preliminary drafts of the famous letter to Vera Zasulich of 1881.

Both in these and in numerous other writings on the critique of political economy, Marx did not provide a concise and systematic definition of what the capitalist mode of production was. An understanding of the modus operandi of capitalism can only be fully grasped by connecting the multiple descriptions of its dynamics contained in Capital.

In Volume I, Marx stated that ‘the characteristic feature of the capitalist epoch is the fact that labour-power also takes the form of a commodity belonging to the worker himself, while his labour takes the form of wage labour’. The crucial difference from the past is that workers do not sell the products of their labour–which in capitalism are no longer their property–but their own labour.

For Marx, the process of capitalist production is based on the separation of labour-power and working conditions, a condition that capitalism ‘reproduces and perpetuates’, so as to guarantee the permanent exploitation of the proletariat. This mode of production ‘forces the worker to constantly sell his labour-power in order to live and constantly enables the capitalist to buy it in order to enrich himself’. Furthermore, Marx emphasised that capitalism differs from all previous modes of productive organisation for another peculiar reason. It is ‘unity of labour process and value-creating process’. He described the process of capitalist production as a mode of production that has a dual nature: ‘on the one hand it is a social labour process for the manufacturing of a product, on the other hand it is a process of capital valorisation’. What drives the capitalist mode of production ‘is not use-value or enjoyment, but exchange-value and [its] multiplication’. The capitalist was described by Marx as a ‘fanatic of the valorisation of value’, a being who ‘unscrupulously forces humanity into production for production’s sake’.

In this way, the capitalist mode of production generates the expansion and concentration of the proletariat, along with an unprecedented level of exploitation of labour-power.

Finally, while it was certainly focused on the economy, Marx’s analysis of the capitalist system was not exclusively aimed at the production relations but constituted an all-embracing critique of bourgeois society including the political dimension, social relations, legal structures, and ideology, as well as the implications they determine on the single individuals. Therefore, he did not consider capital as ‘a thing, but rather as a specific social production relation, belonging to a specific historical formation of society’. It is therefore not eternal and can be replaced–through class struggle–by a different socio-economic organisation.

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Wajah-wajah Kapital Marx

MESKI sebagian orang menganggapnya kuno, Kapital Karl Marx adalah karya klasik yang masih saja menjadi pusat perdebatan. Usianya kini 157 tahun (pertama kali terbit pada 14 September 1867) dan mengandung semua keutamaan karya klasik raksasa; ia merangsang pemikiran baru setiap kali dibaca ulang, serta mampu menggambarkan aspek-aspek penting dari zaman ini maupun masa lalu.

Sebuah karya, kata penulis Italia Italo Calvino, menjadi klasik karena kemampuannya membantu pembaca untuk “membawa peristiwa-peristiwa terkini mundur perlahan ke masa lalu.” Karya semacam ini memberi kita daftar pertanyaan dan hal penting yang sering muncul, sehingga kita mampu memahami peristiwa terkini dengan benar dan menemukan jalan keluarnya. Inilah sebabnya mengapa karya klasik selalu menarik minat para pembaca muda. Karya klasik tetap tak tergantikan meskipun waktu terus melenggang.

Kapital adalah karya klasik unggulan untuk membantu kita memahami perkembangan situasi terkini, termasuk orang-orang penting di masa kini yang ngawur, lewat perspektif sejarah yang tepat. Itulah yang dapat kita katakan tentang Kapital; satu setengah abad sejak pertama kali terbit, Kapital semakin kuat seiring persebaran kapitalisme ke setiap sudut planet ini—dan meluas ke semua bidang kehidupan kita.

Wajah-wajah Kapital Marx
11 Oktober 2024
Marcello Musto
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Ilustrasi: Getty Images/Jacobin

MESKI sebagian orang menganggapnya kuno, Kapital Karl Marx adalah karya klasik yang masih saja menjadi pusat perdebatan. Usianya kini 157 tahun (pertama kali terbit pada 14 September 1867) dan mengandung semua keutamaan karya klasik raksasa; ia merangsang pemikiran baru setiap kali dibaca ulang, serta mampu menggambarkan aspek-aspek penting dari zaman ini maupun masa lalu.

Sebuah karya, kata penulis Italia Italo Calvino, menjadi klasik karena kemampuannya membantu pembaca untuk “membawa peristiwa-peristiwa terkini mundur perlahan ke masa lalu.” Karya semacam ini memberi kita daftar pertanyaan dan hal penting yang sering muncul, sehingga kita mampu memahami peristiwa terkini dengan benar dan menemukan jalan keluarnya. Inilah sebabnya mengapa karya klasik selalu menarik minat para pembaca muda. Karya klasik tetap tak tergantikan meskipun waktu terus melenggang.

Kapital adalah karya klasik unggulan untuk membantu kita memahami perkembangan situasi terkini, termasuk orang-orang penting di masa kini yang ngawur, lewat perspektif sejarah yang tepat. Itulah yang dapat kita katakan tentang Kapital; satu setengah abad sejak pertama kali terbit, Kapital semakin kuat seiring persebaran kapitalisme ke setiap sudut planet ini—dan meluas ke semua bidang kehidupan kita.

Kembali ke Marx
Setelah Krisis Ekonomi Global 2007–2008, menengok kembali karya raksasa Marx ini merupakan kebutuhan mendesak—bagaikan semua respons atas peringatan darurat. Meski sempat terlupakan setelah keruntuhan Tembok Berlin, Kapital masih menyediakan kunci yang jitu untuk memahami penyebab hakiki dari kegilaan dan daya rusak Kapitalisme. Jadi, sementara indeks pasar saham dunia menghabiskan ratusan miliar dolar dan banyak lembaga keuangan dinyatakan bangkrut, oplah Kapital dalam beberapa bulan saja melonjak ketimbang jumlah yang terjual selama dua dasawarsa sebelumnya.

Sayang sekali, laris manisnya Kapital tak berkelindan dengan sisa-sisa kekuatan politik kiri. Kita sedang menipu diri ketika berpikir mampu mengotak-atik sistem yang masih mungkin direformasi. Ketika benar-benar masuk pemerintahan, mereka sekadar jadi pereda nyeri yang tak berdampak apa pun dalam mengurangi kesenjangan sosial-ekonomi dan krisis ekologi yang sedang berlangsung. Hasil dari pilihan-pilihan tersebut dapat dilihat oleh semua orang.

Namun, “kebangkitan” Kapital ini sekaligus menanggapi kebutuhan lain: menentukan secara definitif—juga dibantu banyaknya penelitian mutakhir—versi yang paling dapat diandalkan dari teks yang menjadi fokus Marx dalam sebagian besar kerja intelektualnya. Niat awal Sang Revolusioner Jerman itu, saat menyusun naskah persiapan pertama karya tersebut (Grundrisse tahun 1857–58), adalah membagi karyanya ke dalam enam jilid. Tiga jilid pertama akan membahas kapital, kepemilikan tanah, dan upah buruh; jilid-jilid berikutnya membahas negara, perdagangan luar negeri, dan pasar dunia.

Kesadaran Marx yang semakin kuat selama bertahun-tahun, bahwa rencana yang begitu luas itu tak mungkin terlaksana, memaksanya untuk mengembangkan proyek yang lebih praktis. Ia berpikir untuk menghilangkan tiga jilid terakhir dan mengintegrasikan beberapa bagian yang membahas kepemilikan tanah dan upah buruh ke dalam buku tentang kapital. Buku yang terakhir terbit tersusun dalam tiga bagian: Jilid I membahas Proses Produksi Kapital, Jilid II membahas Proses Sirkulasi Kapital, dan Jilid III membahas Proses Keseluruhan Produksi Kapitalis. Selain itu, ditambahkan pula Volume IV—yang membahas sejarah teori tersebut—yang, bagaimanapun, tidak pernah dimulai dan sering kali keliru disamakan dengan teori nilai lebih.

Lima Draf Volume I
Sebagaimana diketahui, Marx sebenarnya hanya menyelesaikan Jilid I Kapital. Jilid II dan III baru terbit setelah kematiannya; keduanya terbit masing-masing pada 1885 dan 1894, berkat upaya penyuntingan besar-besaran oleh Friedrich Engels.

Para intelektual dengan telaten berulang kali mempertanyakan keterandalan kedua jilid ini, yang disusun berdasarkan naskah-naskah belum rampung dan berserakan yang ditulis dalam rentang waktu bertahun-tahun, mengandung banyak masalah teoretis yang belum terpecahkan pula. Namun, hanya sedikit yang mengabdikan diri pada pertanyaan lain yang tidak kalah pelik: apakah pada kenyataannya ada versi final dari Jilid I?

Perselisihan ini kembali menjadi pusat perhatian para penerjemah dan penerbit, dan dalam beberapa tahun terakhir banyak edisi baru yang cukup penting dari Kapital. Di tahun 2024 ini saja, beberapa di antaranya terbit di Brasil, Italia, dan Amerika Serikat, di mana Princeton University Press menerbitkan terjemahan bahasa Inggris baru pertama dalam lima puluh tahun (dan keempat secara keseluruhan) berkat Paul Reitter dan editor Paul North.

Diterbitkan pada tahun 1867, setelah lebih dari dua dekade penelitian persiapan, Marx tidak sepenuhnya puas dengan struktur volume tersebut. Ia lantas membaginya menjadi hanya enam bab yang sangat panjang. Yang terpenting pula: ia tidak senang dengan caranya sendiri menguraikan teori nilai, yang memaksanya membuat dua bagian bahasan: satu di bab pertama, yang lain di lampiran yang ditulisnya tergesa-gesa, setelah naskah diserahkan. Penulisan Volume I ini dengan demikian menguras tenaga Marx bahkan setelah dicetak.

Dalam persiapan untuk edisi kedua, yang dijual secara bertahap antara tahun 1872 dan 1873, Marx menulis ulang bagian penting tentang teori nilai, menyisipkan beberapa tambahan mengenai perbedaan antara modal konstan dan variabel, nilai lebih, serta penggunaan mesin dan teknologi. Ia juga merombak seluruh susunan buku, membaginya menjadi tujuh bagian, yang terdiri dari 25 bab, yang pada gilirannya dibagi dengan hati-hati menjadi beberapa bagian.

Marx mengikuti dengan saksama proses penerjemahan Kapital ke bahasa Rusia (1872) dan mencurahkan lebih banyak perhatian untuk versi bahasa Prancisnya, yang muncul—juga secara bertahap—antara tahun 1872 dan 1875. Ia harus menghabiskan lebih banyak waktu dari yang diharapkan untuk memeriksa terjemahan tersebut. Tak puas dengan teks penerjemah yang terlalu harfiah, Marx menulis ulang seluruh halaman untuk membuat bagian-bagian yang sarat dengan eksposisi dialektis lebih mudah dicerna oleh pembaca berbahasa Prancis, sekalian untuk membuat apa yang ia anggap perlu diubah.

Perubahan-perubahan tersebut sebagian besar menyangkut bagian akhir, yang dikhususkan untuk “Proses Akumulasi Kapital”. Ia juga membagi teks tersebut menjadi lebih banyak bab. Dalam catatan tambahan untuk edisi bahasa Prancis, Marx menulis bahwa versi bahasa Prancis memiliki “nilai ilmiah yang independen dari aslinya” dan mencatat bahwa versi tersebut “juga harus dirujuk oleh pembaca yang akrab dengan bahasa Jerman.”

Tidak mengherankan, ketika edisi bahasa Inggris diusulkan pada tahun 1877, Marx menunjukkan bahwa penerjemah “harus membandingkan edisi Jerman kedua dengan edisi Prancis,” karena dalam edisi terakhir ini ia telah “menambahkan sesuatu yang baru dan … menggambarkan banyak hal dengan lebih baik.” Oleh karena itu, edisi yang satu ini bukan sekadar perubahan gaya. Perubahan yang ia tambahkan pada berbagai edisi juga merangkum hasil studinya yang sedang berlangsung dan perkembangan pemikiran kritis yang terus berkembang.

Marx meninjau kembali versi Prancis, menyoroti pro dan kontranya, lagi-lagi pada tahun berikutnya. Ia menulis kepada penerjemah Rusia dari Kapital, Nikolai Danielson, bahwa teks Prancis memuat “banyak variasi dan tambahan penting,” tetapi mengakui bahwa ia “juga dipaksa, khususnya pada bab pertama, untuk ‘meratakan’ penjelasan.” Karena itu, ia merasa perlu mengklarifikasi bahwa bab-bab tentang “Komoditas dan Uang” dan “Transformasi Uang Menjadi Kapital” harus “diterjemahkan secara eksklusif mengikuti teks Jerman.” Bagaimanapun, dapat dikatakan bahwa versi Prancis merupakan lebih dari sekadar terjemahan.

Marx dan Engels memiliki ide yang berbeda mengenai masalah ini. Marx sebagai penulis merasa senang dengan versi baru tersebut, menganggapnya, dalam banyak hal, sebagai perbaikan dari versi sebelumnya. Namun Engels, meskipun memuji beberapa perbaikan teoretis yang dilakukan, skeptis terhadap gaya sastra yang dipaksakan oleh bahasa Prancis. Ia menulis bahwa “Saya akan menganggapnya sebagai kesalahan besar untuk menjadikan versi ini sebagai dasar terjemahan bahasa Inggris.” Jadi, ketika diminta menyiapkan edisi Jerman ketiga (1883) dari Jilid I Kapital—tak lama setelah kematian teman baiknya itu, Engels mengubah “hanya hal-hal yang paling penting.”

Kata pengantar Engels untuk versi itu memberi tahu para pembaca bahwa Marx bermaksud untuk “mengerjakan ulang teks tersebut secara besar-besaran,” tetapi kesehatannya yang buruk telah mencegahnya untuk melakukannya. Engels memanfaatkan salinan bahasa Jerman, yang telah dikoreksi di beberapa tempat oleh penulisnya, serta salinan terjemahan bahasa Prancis yang di dalamnya Marx telah menunjukkan perubahan yang perlu. Engels berhati-hati dalam campur tangannya, melaporkan bahwa “dalam edisi ketiga ini tidak ada kata yang berubah yang saya tidak tahu dengan pasti, bahwa penulisnya sendiri akan mengubahnya.” Akan tetapi, ia tidak menyertakan semua perubahan yang ditunjukkan oleh Marx.

Terjemahan bahasa Inggris (1887), yang diawasi penuh oleh Engels, didasarkan pada edisi Jerman ketiga. Ia menegaskan bahwa teks ini, seperti edisi Jerman kedua, lebih unggul daripada terjemahan Prancis—paling tidak karena struktur babnya. Ia mengklarifikasi dalam kata pengantar teks bahasa Inggris bahwa edisi Prancis telah digunakan terutama untuk menguji “seberapa besar penulis sendiri siap berkorban, di mana pun dalam penerjemahan harus dikorbankan sesuatu dari makna penuh aslinya.”

Dua tahun sebelumnya, dalam artikel “How Not to Translate Marx”, Engels dengan tajam mengkritik terjemahan John Broadhouse yang suram dari beberapa halaman Kapital. Kata dia, “Bahasa Jerman yang kuat membutuhkan bahasa Inggris yang kuat untuk menerjemahkannya; istilah-istilah Jerman yang baru diciptakan membutuhkan penciptaan istilah-istilah baru yang sesuai dalam bahasa Inggris.”

Edisi Jerman keempat terbit pada tahun 1890; edisi kali ini menjadi edisi terakhir yang disiapkan Engels. Dengan lebih banyak waktu luang, ia berhasil memadukan beberapa koreksi yang dibuat Marx ke versi Prancis, sambil mengecualikan beberapa koreksi lainnya. Engels menyatakan dalam kata pengantarnya, “Saya telah membandingkan lagi edisi Prancis dengan catatan-catatan dalam tulisan tangan Marx sendiri dan memasukkan beberapa tambahan lain dari edisi tersebut ke dalam teks Jerman.” Ia sangat puas dengan hasil akhirnya, dan hanya edisi populer yang disiapkan Karl Kautsky pada tahun 1914 yang mengalami perbaikan lebih lanjut.

Wajah-wajah Kapital Marx
11 Oktober 2024
Marcello Musto
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Ilustrasi: Getty Images/Jacobin

MESKI sebagian orang menganggapnya kuno, Kapital Karl Marx adalah karya klasik yang masih saja menjadi pusat perdebatan. Usianya kini 157 tahun (pertama kali terbit pada 14 September 1867) dan mengandung semua keutamaan karya klasik raksasa; ia merangsang pemikiran baru setiap kali dibaca ulang, serta mampu menggambarkan aspek-aspek penting dari zaman ini maupun masa lalu.

Sebuah karya, kata penulis Italia Italo Calvino, menjadi klasik karena kemampuannya membantu pembaca untuk “membawa peristiwa-peristiwa terkini mundur perlahan ke masa lalu.” Karya semacam ini memberi kita daftar pertanyaan dan hal penting yang sering muncul, sehingga kita mampu memahami peristiwa terkini dengan benar dan menemukan jalan keluarnya. Inilah sebabnya mengapa karya klasik selalu menarik minat para pembaca muda. Karya klasik tetap tak tergantikan meskipun waktu terus melenggang.

Kapital adalah karya klasik unggulan untuk membantu kita memahami perkembangan situasi terkini, termasuk orang-orang penting di masa kini yang ngawur, lewat perspektif sejarah yang tepat. Itulah yang dapat kita katakan tentang Kapital; satu setengah abad sejak pertama kali terbit, Kapital semakin kuat seiring persebaran kapitalisme ke setiap sudut planet ini—dan meluas ke semua bidang kehidupan kita.

Kembali ke Marx
Setelah Krisis Ekonomi Global 2007–2008, menengok kembali karya raksasa Marx ini merupakan kebutuhan mendesak—bagaikan semua respons atas peringatan darurat. Meski sempat terlupakan setelah keruntuhan Tembok Berlin, Kapital masih menyediakan kunci yang jitu untuk memahami penyebab hakiki dari kegilaan dan daya rusak Kapitalisme. Jadi, sementara indeks pasar saham dunia menghabiskan ratusan miliar dolar dan banyak lembaga keuangan dinyatakan bangkrut, oplah Kapital dalam beberapa bulan saja melonjak ketimbang jumlah yang terjual selama dua dasawarsa sebelumnya.

Sayang sekali, laris manisnya Kapital tak berkelindan dengan sisa-sisa kekuatan politik kiri. Kita sedang menipu diri ketika berpikir mampu mengotak-atik sistem yang masih mungkin direformasi. Ketika benar-benar masuk pemerintahan, mereka sekadar jadi pereda nyeri yang tak berdampak apa pun dalam mengurangi kesenjangan sosial-ekonomi dan krisis ekologi yang sedang berlangsung. Hasil dari pilihan-pilihan tersebut dapat dilihat oleh semua orang.

Namun, “kebangkitan” Kapital ini sekaligus menanggapi kebutuhan lain: menentukan secara definitif—juga dibantu banyaknya penelitian mutakhir—versi yang paling dapat diandalkan dari teks yang menjadi fokus Marx dalam sebagian besar kerja intelektualnya. Niat awal Sang Revolusioner Jerman itu, saat menyusun naskah persiapan pertama karya tersebut (Grundrisse tahun 1857–58), adalah membagi karyanya ke dalam enam jilid. Tiga jilid pertama akan membahas kapital, kepemilikan tanah, dan upah buruh; jilid-jilid berikutnya membahas negara, perdagangan luar negeri, dan pasar dunia.

Kesadaran Marx yang semakin kuat selama bertahun-tahun, bahwa rencana yang begitu luas itu tak mungkin terlaksana, memaksanya untuk mengembangkan proyek yang lebih praktis. Ia berpikir untuk menghilangkan tiga jilid terakhir dan mengintegrasikan beberapa bagian yang membahas kepemilikan tanah dan upah buruh ke dalam buku tentang kapital. Buku yang terakhir terbit tersusun dalam tiga bagian: Jilid I membahas Proses Produksi Kapital, Jilid II membahas Proses Sirkulasi Kapital, dan Jilid III membahas Proses Keseluruhan Produksi Kapitalis. Selain itu, ditambahkan pula Volume IV—yang membahas sejarah teori tersebut—yang, bagaimanapun, tidak pernah dimulai dan sering kali keliru disamakan dengan teori nilai lebih.

Lima Draf Volume I
Sebagaimana diketahui, Marx sebenarnya hanya menyelesaikan Jilid I Kapital. Jilid II dan III baru terbit setelah kematiannya; keduanya terbit masing-masing pada 1885 dan 1894, berkat upaya penyuntingan besar-besaran oleh Friedrich Engels.

Para intelektual dengan telaten berulang kali mempertanyakan keterandalan kedua jilid ini, yang disusun berdasarkan naskah-naskah belum rampung dan berserakan yang ditulis dalam rentang waktu bertahun-tahun, mengandung banyak masalah teoretis yang belum terpecahkan pula. Namun, hanya sedikit yang mengabdikan diri pada pertanyaan lain yang tidak kalah pelik: apakah pada kenyataannya ada versi final dari Jilid I?

Perselisihan ini kembali menjadi pusat perhatian para penerjemah dan penerbit, dan dalam beberapa tahun terakhir banyak edisi baru yang cukup penting dari Kapital. Di tahun 2024 ini saja, beberapa di antaranya terbit di Brasil, Italia, dan Amerika Serikat, di mana Princeton University Press menerbitkan terjemahan bahasa Inggris baru pertama dalam lima puluh tahun (dan keempat secara keseluruhan) berkat Paul Reitter dan editor Paul North.

Diterbitkan pada tahun 1867, setelah lebih dari dua dekade penelitian persiapan, Marx tidak sepenuhnya puas dengan struktur volume tersebut. Ia lantas membaginya menjadi hanya enam bab yang sangat panjang. Yang terpenting pula: ia tidak senang dengan caranya sendiri menguraikan teori nilai, yang memaksanya membuat dua bagian bahasan: satu di bab pertama, yang lain di lampiran yang ditulisnya tergesa-gesa, setelah naskah diserahkan. Penulisan Volume I ini dengan demikian menguras tenaga Marx bahkan setelah dicetak.

Dalam persiapan untuk edisi kedua, yang dijual secara bertahap antara tahun 1872 dan 1873, Marx menulis ulang bagian penting tentang teori nilai, menyisipkan beberapa tambahan mengenai perbedaan antara modal konstan dan variabel, nilai lebih, serta penggunaan mesin dan teknologi. Ia juga merombak seluruh susunan buku, membaginya menjadi tujuh bagian, yang terdiri dari 25 bab, yang pada gilirannya dibagi dengan hati-hati menjadi beberapa bagian.

Marx mengikuti dengan saksama proses penerjemahan Kapital ke bahasa Rusia (1872) dan mencurahkan lebih banyak perhatian untuk versi bahasa Prancisnya, yang muncul—juga secara bertahap—antara tahun 1872 dan 1875. Ia harus menghabiskan lebih banyak waktu dari yang diharapkan untuk memeriksa terjemahan tersebut. Tak puas dengan teks penerjemah yang terlalu harfiah, Marx menulis ulang seluruh halaman untuk membuat bagian-bagian yang sarat dengan eksposisi dialektis lebih mudah dicerna oleh pembaca berbahasa Prancis, sekalian untuk membuat apa yang ia anggap perlu diubah.

Perubahan-perubahan tersebut sebagian besar menyangkut bagian akhir, yang dikhususkan untuk “Proses Akumulasi Kapital”. Ia juga membagi teks tersebut menjadi lebih banyak bab. Dalam catatan tambahan untuk edisi bahasa Prancis, Marx menulis bahwa versi bahasa Prancis memiliki “nilai ilmiah yang independen dari aslinya” dan mencatat bahwa versi tersebut “juga harus dirujuk oleh pembaca yang akrab dengan bahasa Jerman.”

Tidak mengherankan, ketika edisi bahasa Inggris diusulkan pada tahun 1877, Marx menunjukkan bahwa penerjemah “harus membandingkan edisi Jerman kedua dengan edisi Prancis,” karena dalam edisi terakhir ini ia telah “menambahkan sesuatu yang baru dan … menggambarkan banyak hal dengan lebih baik.” Oleh karena itu, edisi yang satu ini bukan sekadar perubahan gaya. Perubahan yang ia tambahkan pada berbagai edisi juga merangkum hasil studinya yang sedang berlangsung dan perkembangan pemikiran kritis yang terus berkembang.

Marx meninjau kembali versi Prancis, menyoroti pro dan kontranya, lagi-lagi pada tahun berikutnya. Ia menulis kepada penerjemah Rusia dari Kapital, Nikolai Danielson, bahwa teks Prancis memuat “banyak variasi dan tambahan penting,” tetapi mengakui bahwa ia “juga dipaksa, khususnya pada bab pertama, untuk ‘meratakan’ penjelasan.” Karena itu, ia merasa perlu mengklarifikasi bahwa bab-bab tentang “Komoditas dan Uang” dan “Transformasi Uang Menjadi Kapital” harus “diterjemahkan secara eksklusif mengikuti teks Jerman.” Bagaimanapun, dapat dikatakan bahwa versi Prancis merupakan lebih dari sekadar terjemahan.

Marx dan Engels memiliki ide yang berbeda mengenai masalah ini. Marx sebagai penulis merasa senang dengan versi baru tersebut, menganggapnya, dalam banyak hal, sebagai perbaikan dari versi sebelumnya. Namun Engels, meskipun memuji beberapa perbaikan teoretis yang dilakukan, skeptis terhadap gaya sastra yang dipaksakan oleh bahasa Prancis. Ia menulis bahwa “Saya akan menganggapnya sebagai kesalahan besar untuk menjadikan versi ini sebagai dasar terjemahan bahasa Inggris.” Jadi, ketika diminta menyiapkan edisi Jerman ketiga (1883) dari Jilid I Kapital—tak lama setelah kematian teman baiknya itu, Engels mengubah “hanya hal-hal yang paling penting.”

Kata pengantar Engels untuk versi itu memberi tahu para pembaca bahwa Marx bermaksud untuk “mengerjakan ulang teks tersebut secara besar-besaran,” tetapi kesehatannya yang buruk telah mencegahnya untuk melakukannya. Engels memanfaatkan salinan bahasa Jerman, yang telah dikoreksi di beberapa tempat oleh penulisnya, serta salinan terjemahan bahasa Prancis yang di dalamnya Marx telah menunjukkan perubahan yang perlu. Engels berhati-hati dalam campur tangannya, melaporkan bahwa “dalam edisi ketiga ini tidak ada kata yang berubah yang saya tidak tahu dengan pasti, bahwa penulisnya sendiri akan mengubahnya.” Akan tetapi, ia tidak menyertakan semua perubahan yang ditunjukkan oleh Marx.

Terjemahan bahasa Inggris (1887), yang diawasi penuh oleh Engels, didasarkan pada edisi Jerman ketiga. Ia menegaskan bahwa teks ini, seperti edisi Jerman kedua, lebih unggul daripada terjemahan Prancis—paling tidak karena struktur babnya. Ia mengklarifikasi dalam kata pengantar teks bahasa Inggris bahwa edisi Prancis telah digunakan terutama untuk menguji “seberapa besar penulis sendiri siap berkorban, di mana pun dalam penerjemahan harus dikorbankan sesuatu dari makna penuh aslinya.”

Dua tahun sebelumnya, dalam artikel “How Not to Translate Marx”, Engels dengan tajam mengkritik terjemahan John Broadhouse yang suram dari beberapa halaman Kapital. Kata dia, “Bahasa Jerman yang kuat membutuhkan bahasa Inggris yang kuat untuk menerjemahkannya; istilah-istilah Jerman yang baru diciptakan membutuhkan penciptaan istilah-istilah baru yang sesuai dalam bahasa Inggris.”

Edisi Jerman keempat terbit pada tahun 1890; edisi kali ini menjadi edisi terakhir yang disiapkan Engels. Dengan lebih banyak waktu luang, ia berhasil memadukan beberapa koreksi yang dibuat Marx ke versi Prancis, sambil mengecualikan beberapa koreksi lainnya. Engels menyatakan dalam kata pengantarnya, “Saya telah membandingkan lagi edisi Prancis dengan catatan-catatan dalam tulisan tangan Marx sendiri dan memasukkan beberapa tambahan lain dari edisi tersebut ke dalam teks Jerman.” Ia sangat puas dengan hasil akhirnya, dan hanya edisi populer yang disiapkan Karl Kautsky pada tahun 1914 yang mengalami perbaikan lebih lanjut.

Mencari Versi Final
Edisi Jilid I Kapital suntingan Engels tahun 1890 itu menjadi versi kanonik yang menjadi sumber terjemahan terbanyak di seluruh dunia. Hingga saat ini, Jilid I telah terbit dalam 66 bahasa, dan dalam 59 proyek ini Jilid II dan Jilid III juga telah diterjemahkan. Kecuali Manifesto Komunis, yang ditulis bersama Engels dan kemungkinan dicetak lebih dari 500 juta eksemplar, serta Buku Merah Kecil karya Mao Zedong, yang sirkulasinya bahkan lebih besar—tidak ada karya klasik politik, filsafat, atau ekonomi lain yang sirkulasinya sebanding dengan Jilid I Kapital.

Namun, perdebatan tentang versi terbaik tidak pernah berakhir. Manakah dari kelima edisi ini yang menyajikan struktur terbaik? Versi mana yang mencakup perolehan teoretis Marx selanjutnya? Meskipun Volume I tidak menyajikan kesulitan editorial Volume II dan III, yang mencakup ratusan perubahan yang dilakukan oleh Engels, hal itu juga cukup merepotkan.

Beberapa penerjemah memutuskan untuk mengandalkan versi 1872–73, yakni edisi Jerman terakhir yang direvisi oleh Marx. Versi Jerman tahun 2017 suntingan Thomas Kuczynski, dengan klaim kesetiaan yang lebih besar pada maksud Marx sendiri, baru-baru ini mengusulkan varian yang mencakup perubahan tambahan yang disiapkan untuk terjemahan Prancis tetapi diabaikan oleh Engels. Pilihan pertama memiliki keterbatasan karena mengabaikan bagian-bagian versi Prancis yang lebih unggul daripada versi Jerman, sedangkan pilihan kedua menghasilkan teks yang membingungkan dan sulit dibaca. Masih lebih baik edisi yang menyertakan lampiran dengan varian yang dibuat Engels untuk setiap versi dan juga beberapa manuskrip persiapan penting Marx, yang sejauh ini hanya diterbitkan dalam bahasa Jerman dan beberapa bahasa lainnya.

Akan tetapi, tidak ada versi definitif dari Volume I. Perbandingan sistematis revisi yang dibuat oleh Marx dan Engels masih bergantung pada penelitian lebih lanjut oleh murid-murid mereka yang telaten. Marx memang kerap disebut kuno dan lawan-lawan pemikiran politiknya gemar membahas “kekalahannya”. Namun, sekali lagi, generasi pembaca, aktivis, dan intelektual baru mulai mengkritik kapitalisme. Di masa-masa sulit seperti sekarang, inilah pertanda baik bagi masa depan.

 

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157. yılında hangi kapital?

Marcello MUSTO

Kapitalin ilk baskısından bu yana yüz yıldan fazla geçmesine ve birçok kez ‘tarihi geçmiş’ denilerek görmezden gelinmeye çalışılmasına rağmen bu klasik metin hep bir şekilde tartışmanın göbeğine yerleşiyor. 157 yıllık kıymetli tarihinde (İlk olarak 14 Eylül 1867’de basıldı) “Ekonomi Politiğin Eleştirisi” bir klasik metnin sahip olması gereken tüm özellikleri barındırıyor: Her yeni okumada yeni fikirler doğuruyor ve geçmişin olduğu kadar bugün yaşadığımız dönemin de kritik taraflarını aydınlatıyor.

Kapital’in önemli bir başarısı aktüel momente ait gelişmeleri -ve sıklıkla aciz kahramanlarımızı- doğru bir tarihsel perspektife oturtabilmesi. Ünlü İtalyan yazar Italo Calvino, bir klasiği klasik yapanın “güncel olayları sıradan bir uğultuya dönüştürmesidir” der. Böyle bir çalışma en temel sorunlara işaret ederken, etrafından dolanamayacağınız meselelerin ortasından bir yol açarak doğru anlaşılmalarını sağlar. Bu yüzden klasikler hep yeni nesillerin ilgisini çekmeyi başarır. Zamanın tuttuğu pas önemlerini çürütmez.

MARX’A DÖNÜŞ
2007-2008’de patlayan ekonomik kriz, Marx’ın şaheserine geri dönüşü mecbur kıldı – neredeyse yaşananlara bir acil yanıt olarak görüldü. Marx’ın önemli çalışmaları Berlin duvarının yıkılışıyla unutulsa bile, hala kapitalizmin yıkıcı deliliğinin gerçek sebeplerine dair tutarlı yanıtlar sunuyordu. Dolayısıyla bir yandan dünya borsası yüz milyarlarca dolar yakarken, sayısız finans şirketi iflas ilan ederken, yalnızca birkaç ayda Kapital son 20 yılın toplamından daha fazla satıldı.

Keşke Kapital’e hücum sol siyasetten geriye kalanlarla rastlaşmasaydı. İyileştirilebilir bir yanı kalmadığını giderek daha fazla gösteren bir sistemi tamir edebilecekleri hezeyanına kapıldılar. Hükümete geldiklerinde, hafif yatıştırıcı önlemler uygulayarak giderek daha yakıcı hale gelen sosyo-ekonomik eşitsizlikleri ve mevcut ekolojik krizi durdurmak için hiçbir şey yapmadılar. Bunun sonuçları görmek isteyenler için ortada duruyor.

Fakat bu Kapital’in yeniden keşfi başka bir ihtiyaca yanıt verdi: yakın zamanlı çalışmaların da sayesinde- Marx’ın entelektüel emeğini en fazla yoğunlaştırdığı bu metnin en doğru versiyonunu üretebilmek. Alman devrimcinin esas niyeti, çalışmanın ilk hazırlık metinlerini yazarken (1857-58 tarihli Grundrisse) çalışmalarını altı ciltte toplamaktı. İlk üçü sermayeye, toprak sahipliğine ve ücretli emeğe dair olacaktı, diğer üçü ise devlete, dış ticarete ve dünya piyasasına. Marx’ın yıllar içerisinde böyle kapsamlı bir planı gerçekleştiremeyeceğini fark etmesi, daha pratik bir projeye yönlendirdi. Son üç bölümden vazgeçip, sermayeye dair kitabın içerisindeki kısımlara toprak sahipliği ve ücretli emeğe ilişkin çalışmalarını ekledi. İkinci kısım üç bölüme ayrıldı: Birinci cilt Sermayenin Üretim Sürecine odaklanırken, ikinci cilt Sermaye Dolaşım Sürecine, üçüncüsü ise Kapitalist Üretimin Genel Sürecine dair olacaktı. Tüm bunlara teorinin tarihine dair dördüncü bir bölüm daha eklenecekti -ancak hiçbir zaman başlayamadı ve bu niyeti sıklıkla Artı Değer Teorileri ile karıştırılageliyor.

BİRİNCİ CİLDİN 5 TASLAĞI
Bilindiği üzere, Marx yalnızca birinci cildi tamamlayabildi. İkinci ve üçüncü ciltler ölümünden önce basılamadı; Friedrich Engels’in inanılmaz editöryal emekleri sayesinde 1885 ve 1894 yıllarında basılabildi.

En titiz akademisyenler dahil bu iki cildin ne kadar güvenilir olabildiğini tekrar tekrar sorguladılar, bitmemiş, bölük pörçük ve aralarında yıllar olan, yalnızca birkaçı birbiri ile ilişkili çözülmemiş teorik sorunlar barındıran yazmalardan oluşması, daha sivri bir soruyu ortaya çıkarıyor: Birinci cildin de tam bir son hali hiç var olmuş muydu?

Bu tartışma çevirmenlerin ve yayıncıların odağına yeniden döndü ve geçtiğimiz yıllarda Kapital’in birçok önemli yeni basımı ortaya çıktı. Bunların kimisi 2024 yılında Brezilya ve İtalya’da çıktı, ABD’de Princeton University Press elli yıl sonra yeni bir İngilizce çeviriyi, Paul Reitter ve editör Paul North’un emekleri sayesinde (bu zamana kadarki dördüncü) yayınladı.

Marx 20 yıldan fazladır bir hazırlık araştırma sürecinin sonucunda oluşturduğu cildin içerik yapısından çok da memnun değildi. 6 çok uzun bölüme ayırmak zorunda kaldı. En çok da değer teorisinin izahı konusunda içi rahat değildi, iki bölüme ayırmak zorunda kalmıştı: biri ilk bölümde, ikincisi ise yazmaları teslim ettikten sonra aceleyle girdiği ek kısmındaydı. Bu yüzden de birinci cilt basıldıktan sonra bile Marx’ı yormaya devam ediyordu. Marx ikinci baskıya hazırlanırken, 1872 ve 1873 aralığında ekler olarak satılan bir kısımda, Marx değer teorisiyle alakalı önemli bir bölümü yeniden yazdı, sabit ve değişken sermaye ayrımı, artı değer ve makine, teknoloji kullanımıyla ilgili ilgili ekler yaptı. Ayrıca kitabın tüm yapısını yeniden biçimlendirerek, 25 kısımdan oluşan 7 bölüme ayırdı.

Marx Rusçaya çeviri (1872) sürecini bizzat takip etti ve 1872 1875 aralığında eklerle birlikte basılan Fransızca versiyonuna çok daha fazla emek harcadı. Fransızca çevirisinin kontrolü beklenenden uzun sürdü, çevirmenin aşırı edebi dilinden rahatsız olduğu için kimi kısımları baştan yazarak, diyalektik anlatımın yoğun olduğu kısımların Fransız okurların anlamasını kolaylaştırmaya çalıştı. Bu değişiklikler büyük oranda son kısımdaki “Sermaye Birikim Süreci” başlığına dairdi. Ayrıca metni daha fazla bölüme ayırdı. Fransız edisyona son söz kısmında Marx Fransızca versiyonun “orijinalinden bağımsız bir bilimsel değere” sahip olduğunu ancak “Almanca diline aşina okurlara” danışılması gerektiğini belirtti.

Şaşırtıcı olmayan bir biçimde, 1877 yılında İngilizce edisyonu önerildiğinde Marx çevirmenin “Almanca ikinci baskısı ve Fransızca baskısını karşılaştırması gerektiğine” işaret etti, çünkü bu ikincisinde “yeni şeyler eklenmişti… bazı şeyleri daha iyi anlatılmıştı.” Bunlar dolayısıyla stilistik yeniden dokunuşlar değildi. Birçok yeni edisyona eklediği değişiklikler ayrıca sürmekte olan çalışmalarının ve sürekli evrimleşen eleştirel düşünsel gelişiminin de sonuçlarıydı.

Marx bir sonraki yıl Fransızca versiyona yeniden göz atıp olumlu ve olumsuz yanlarının altını çizdi. Kapital’in Rus çevirmeni Nikolai Danielson’a Fransızca metnin “birçok önemli farklılık ve ekleme” barındırdığını, ancak bir yandan da “özellikle ilk bölümde anlatımı ‘düzleştirmeye’ zorlandığını” söyledi. Bu yüzden “Meta ve Para” ve “Paranın Sermayeye Dönüşümü” bölümlerinin, “yalnızca Almanca metne göre çevrilmesi gerektiğini” belirtti. Her halükarda, Fransızca versiyonu çeviriden çok daha fazla şey barındırıyordu.

Marx ve Engels’in konuya dair düşünceleri farklıydı. Yazar yeni versiyondan memnundu ve birçok yönden öncekilere göre bir ilerleme olduğu fikrindeydi. Ancak Engels, kimi teorik geliştirmeleri takdir etmekle birlikte, Fransızca dilinin dayattığı edebi tarza şüpheyle yaklaşıyordu. “Bu versiyonu İngilizce çeviri için temel almanın büyük bir hata olacağı düşüncesindeyim” diye yazmıştı. Bu yüzden, arkadaşının ölümünden kısa süre sonra birinci cildin Almancaya üçüncü basımı (1883) hazırlaması talep edildiğinde, Engels “yalnızca en gerekli şeyleri” değiştirdi. Önsözünde, Marx’ın “metne büyük oranda yeniden çalışmaya” niyetli olduğunu ancak ölümünün bundan alıkoyduğunu yazdı. Engels yazarın birkaç kısmını düzelttiği bir Almanca baskısından ve Marx’ın değiştirdiği yerlerin mecburi olduğunu belirttiği bir Fransızca baskısından yararlandı. Engels müdahalelerinde yumuşak davranıyor, “üçüncü baskıda, yazarının değiştireceğinden emin olmadığım hiçbir sözcüğü değiştirmedim” diye belirtiyordu. Ancak, Marx’ın işaret ettiği tüm değişiklikleri dahil etmemişti.

Tamamen Engels’in denetiminde gerçekleşen İngilizce çevirisi (1887, Almanca üçüncü baskıya dayanıyordu. Bu metnin, Almanca ikinci baskı gibi Fransızca çeviriden daha üstün olduğunu iddia ediyordu -bölümlendirme biçimini hariç tutarak. İngilizce metnin önsözünde Fransızca edisyonu esasen “yazarın ne kadar fedakarlıkta bulunabileceğini, orijinalin tam anlamına dair ne kadar kısmın çeviride feda edilebileceğini” test etmek için kullandıklarını açıkladı. İki yıl öncesinde “Marx’ı Nasıl Çevirmemeli” başlıklı bir makalesinde Engels, John Broadhouse’in Kapital’in bazı sayfalarındaki sıkıntılı çevirisini eleştirirken, “Güçlü bir Almancanın hakkını verebilmek için güçlü bir İngilizce gerekir; yeni türetilen Almanca terimler, İngilizcede karşılık gelebilecek yeni terimlerin bulunmasını gerektirir” diye yazacaktı.

Almanca dördüncü baskı 1890 yılında çıktı; Engels tarafından hazırlanan son versiyon oldu. Bu kez daha fazla zamanı olduğu için Marx’ın Fransızca versiyonuna yaptığı bazı düzeltmeleri eklerken, diğerlerini ise çıkardı. Engels önsözde “Bir kez daha Fransızca edisyonu Marx’ın yazmalarından notlarla karşılaştırıyorum ve buradan bazı eklemeleri Almanca metne dahil ediyorum” diye yazdı. Nihai sonuçtan son derece memnundu, yalnızca Karl Kautsky’nin 1914’te hazırladığı baskı bu versiyona olumlu katkılar sunabildi.

SON HALİNİ ARARKEN
Kapital birinci cildin Engels’in hazırladığı 1890 basımı, dünya çapında en fazla çevrilen resmi versiyonu haline geldi. Bugüne kadar birinci cilt 66 dile çevrildi ve bunlardan 59’unda ikinci ve üçüncü ciltler de çevrildi. Engels ile birlikte yazdığı ve bugüne kadar 500 milyondan fazla basılan Komünist Manifesto ve ondan da fazla basılan Mao Zedong’un Küçük Kırmızı Kitap’ı hariç- Kapital birinci cildiyle yaygınlık açısından karşılaştırılabilecek bir başka siyaset, felsefe ya da ekonomi klasiği yok.

Yine de en iyi hali ile ilgili tartışma bitmiş değil. Bu beş basım arasından hangisi en iyi yapıyı sunuyor? Hangi versiyon Marx’ın geç dönem teorik katkılarını içeriyor? Her ne kadar birinci cilt, ikinci ve üçüncü ciltte Engels’in yaptığı yüzlerce değişikliğin yarattığı editoryal sorunları içermese de yine de neredeyse aynı derecede baş ağrıtıcı.

Kimi çevirmenler – Marx’ın gözden geçirdiği son versiyon olan- 1872-1873 metnini temel alarak çevirmeye karar verdi. 2017 yılında basılan görece yeni bir Almanca versiyonu (Thomas Kuczynski editörlüğünde çıktı) -Marx’ın amaçladığına çok daha sadık bir biçimi olarak- Fransızca çeviri için hazırlanan fakat Engels tarafından görmezden gelinen ekleri de içeriyor. İlk tercih, Almancasına kıyasla çok daha üstün olan Fransızca versiyonundaki kısımları ihmal ederken, ikincisi ise kafa karıştırıcı ve okunması güç bir metin sunuyor. Bu yüzden daha iyisi bugüne kadar yalnızca Almancada ve birkaç dilde yayınlanan Marx’ın yazmalarından ve Engels ile birlikte her kısım için yazdıkları varyasyonlardan bir ek sunmak olacaktır. Ancak, birinci cilde dair kesin bir versiyondan bahsedemiyoruz. Marx ve Engels’in yaptığı revizyonların sistematik bir karşılaştırması için hala dikkatli öğrencilerin gelecek araştırmalarına gereksinim duyuyoruz.

Marx’a birçok kez çağdışı dendi ve siyasal fikirlerine düşman olanlar yenilgisini duyurmaktan büyük bir haz duydu. Ancak bir kez daha yeni nesil okurlar, militanlar ve akademisyenler onun kapitalizm eleştirisine uzanıyorlar. Bugünkü gibi karanlık zamanlarda, bunlar gelecek için küçük ama güzel alametler.

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I tanti volti del Capitale

Passano i lustri e, sebbene sia stato descritto più volte come un testo antiquato, si ritorna a discutere del Capitale di Karl Marx (appena ripubblicato in una nuova edizione da Einaudi). Nonostante abbia compiuto 157 anni (fu pubblicato il 14 settembre del 1867), la «critica dell’economia politica» conferma di possedere tutte le virtù dei grandi classici: stimola nuovi pensieri a ogni rilettura ed è capace di illustrare aspetti fondamentali del passato quanto della contemporaneità. Simultaneamente, ha il pregio di circoscrivere la cronaca del presente – così come il peso dei suoi, spesso inadeguati, protagonisti – nella posizione relativa che le spetterebbe. Non a caso, il celebre scrittore italiano Italo Calvino affermò che un classico è tale anche perché ci aiuta a «relegare l’attualità al rango di rumore di fondo». I classici indicano le questioni essenziali e i punti ineludibili per poterle intendere a fondo e dirimerle. Per questo motivo essi conquistano perennemente l’interesse di nuove generazioni di lettori. Un classico rimane indispensabile nonostante il trascorrere del tempo e, anzi, nel caso del Capitale si può affermare che questo scritto assume tanto più efficacia quanto più il capitalismo si diffonde in ogni angolo del pianeta e si espande in tutte le sfere delle nostre esistenze.

Ritorni a Marx

In seguito allo scoppio della crisi economica del 2007-2008, la riscoperta del magnum opus di Marx fu una vera e propria necessità, quasi la risposta a un’emergenza: rimettere in circolazione il testo – da tutti dimenticato, dopo la caduta del Muro di Berlino – che forniva chiavi interpretative ancora valide per comprendere le vere cause della follia distruttiva del capitalismo. Fu così che, mentre gli indici delle borse mondiali bruciavano centinaia di miliardi di dollari e numerosi istituti finanziari dichiaravano bancarotta, in pochi mesi, Il capitale vendette più copie di tutte quelle date alle stampe nel corso del ventennio precedente. Peccato che il suo revival non incontrò ciò che rimaneva delle forze della sinistra. Esse si illusero di poter migliorare un sistema che mostrava, in modo crescente, la sua irriformabilità e, quando furono forze di governo, adottarono blandi palliativi che non scalfirono minimamente le sempre più drammatiche sperequazioni economico-sociali e la crisi ecologica in atto. I risultati di queste scelte sono sotto gli occhi di tutti.

Il presente revival del Capitale risponde, invece, a un’altra esigenza: quella di definire, anche grazie alla rilevante mole di studi comparsi di recente, quale sia la versione più attendibile dello scritto al quale Marx dedicò la gran parte delle sue fatiche intellettuali. L’intenzione originaria del rivoluzionario tedesco – che accompagnò la stesura del primo manoscritto preparatorio dell’opera (i Grundrisse del 1857-58) – fu quella di dividere il suo lavoro in sei libri. I primi tre avrebbero dovuto essere dedicati a capitale, proprietà fondiaria e lavoro salariato; quelli successivi a Stato, commercio estero e mercato mondiale. La consapevolezza, acquisita con il passare degli anni, dell’impossibilità di intraprendere un piano così vasto costrinse Marx a sviluppare un progetto più concretizzabile. Pensò di tralasciare gli ultimi tre volumi e di integrare alcune parti dedicate alla proprietà fondiaria e al lavoro salariato nel libro sul capitale. Quest’ultimo venne concepito in tre parti: il Libro I sarebbe stato dedicato a Il processo di produzione del capitale, quello II a Il processo di circolazione del capitale e il III a Il processo complessivo della produzione capitalistica. A essi si sarebbe dovuto aggiungere un Libro IV – dedicato alla storia della teoria – che, però, non venne mai cominciato e viene spesso erroneamente confuso con le Teorie sul plusvalore.

Le cinque redazioni del Libro I

Com’è noto, rispetto a tali proponimenti, Marx riuscì a completare soltanto il Libro I. I libri II e III videro la luce soltanto dopo la sua morte, rispettivamente nel 1885 e nel 1894, grazie a un enorme lavoro editoriale svolto da Friedrich Engels. Se gli studiosi più rigorosi si sono più volte interrogati sull’attendibilità di questi due volumi, redatti sulla base di manoscritti incompiuti e frammentari, scritti a distanza di anni e che contenevano numerosi problemi teorici irrisolti, in pochi si sono dedicati a un’altra questione non meno spinosa: quella di stabilire se esisteva la versione definitiva del Libro I. La controversia è ritornata al centro dell’attenzione di traduttori e case editrici e, negli ultimi anni, sono apparse molte nuove importanti edizioni del Capitale. Nel 2024, alcune di esse sono uscite in Brasile, in Italia e anche negli Stati uniti, dove la prestigiosa Princeton University Press pubblica, proprio questa settimana, in una tiratura di ben 13.000 copie, la prima nuova traduzione in inglese dopo cinquant’anni (a cura di P. North e P. Reitter) – la quarta in questa lingua.

Pubblicato nel 1867, dopo oltre un ventennio di ricerche preparatorie, Marx non fu pienamente soddisfatto della struttura del volume. Aveva finito col dividerlo in soli sei lunghissimi capitoli e, soprattutto, era rimasto scontento per come aveva esposto la teoria del valore che era stato costretto a dividere in due parti: una nel primo capitolo, l’altra in un’appendice scritta, frettolosamente, dopo la consegna del manoscritto. Pertanto, lo scritto continuò ad assorbire una parte delle energie di Marx anche dopo la stampa. In vista della seconda edizione, venduta in fascicoli tra il 1872 e il 1873, Marx riscrisse la cruciale parte sulla teoria del valore, inserì diverse integrazioni riguardanti la differenza tra capitale costante e variabile, il plusvalore, nonché l’uso di macchine e tecnologia. Inoltre, rimodulò l’intera struttura del libro, dividendolo in sette sezioni, comprendenti 25 capitoli, a loro volta accuratamente suddivisi in paragrafi.

Marx accompagnò il più possibile il progresso della traduzione russa (1872) e dedicò ancora più energie alla preparazione della versione francese, apparsa – anch’essa in fascicoli – tra il 1872 e il 1875. Dovette, infatti, impiegare molto più tempo di quello preventivato per correggerne le bozze. Insoddisfatto del lavoro svolto dal traduttore, che aveva reso il testo troppo letteralmente, riscrisse intere pagine, al fine di rendere meno indigeste al pubblico francese le parti pregne di esposizione dialettica e per apportare modifiche ritenute imprescindibili. Esse vennero per lo più concentrate nella sezione finale, dedicata a «Il processo di accumulazione del capitale». Mutò anche la divisione dei capitoli che aumentarono dopo un’ulteriore revisione della redistribuzione della materia. Nel poscritto all’edizione francese, Marx non esitò ad attribuire alla versione francese «un valore scientifico indipendente dall’originale» e osservò che doveva «essere consultata anche dai lettori che conoscono la lingua tedesca». Non a caso, quando nel 1877 si profilò la possibilità di un’edizione in inglese, Marx precisò che il traduttore avrebbe dovuto «necessariamente confrontare la seconda edizione tedesca con quella francese», nella quale egli aveva «aggiunto qualcosa di nuovo e dove aveva descritto meglio molte cose». Non si trattava, dunque, di meri ritocchi stilistici. Le alterazioni da lui prodotte alle diverse edizioni racchiudono anche i risultati degli incessanti studi svolti e gli sviluppi di un pensiero critico in continua evoluzione. Marx ritornò sulla versione francese, evidenziandone aspetti positivi e negativi, anche l’anno successivo. Scrisse a Nikolai Danielson, il traduttore del Capitale in russo, che essa conteneva «molte varianti e aggiunte importanti», pur ammettendo di essere «stato anche costretto, soprattutto nel primo capitolo, ad ‘appiattire’ l’esposizione». Fu per questa ragione che egli avvertì l’esigenza di chiarire che i capitoli «Merce e denaro» e «La trasformazione del denaro in capitale» avrebbero dovuto essere «tradotti seguendo esclusivamente il testo tedesco». In ogni caso, si può affermare che la versione francese costituì molto di più che una traduzione.

Marx ed Engels ebbero idee diverse in proposito. Il primo, soddisfatto della nuova versione, la ritenne, in molte parti, un miglioramento rispetto a quelle precedenti. Il secondo, invece, pur complimentandosi per i miglioramenti teorici apportati in alcuni punti, fu molto scettico in merito allo stile letterario imposto dal francese e scrisse vigorosamente: «riterrei un grande errore prendere questa versione come base per la traduzione inglese». Consequenzialmente, quando gli venne chiesto, poco dopo la scomparsa dell’amico, di dare alle stampe la terza edizione tedesca (1883) del Libro I, Engels si limitò a modificare «solo le cose più necessarie». Nella prefazione informò il lettore che l’intenzione di Marx era quella di «rielaborare il testo in gran parte», ma che il cattivo stato di salute glielo aveva impedito. Engels si avvalse di un esemplare tedesco, corretto in vari punti da Marx, e di una copia della traduzione francese, nella quale questi aveva indicato i passaggi per lui irrinunciabili. Limitò il suo lavoro al minimo e poté dichiarare: «in questa terza edizione non è cambiata nessuna parola di cui io non sappia, con certezza, che l’autore stesso l’avrebbe cambiata». Tuttavia, egli non inserì tutte le variazioni segnalate da Marx.

La traduzione inglese (1887), interamente supervisionata da Engels, venne condotta sulla terza edizione tedesca. Egli affermò che quest’ultima, al pari della seconda edizione tedesca, era superiore alla traduzione francese – anche per la struttura dell’indice. Chiarì nella prefazione al testo inglese che si era fatto ricorso all’edizione francese soprattutto per verificare «quanto l’autore stesso era pronto a sacrificare, dovunque nel tradurre dovesse essere sacrificato qualcosa del significato completo dell’originale». Due anni prima, nell’articolo How not to Translate Marx, Engels aveva sagacemente criticato la pessima traduzione di alcune pagine del Capitale, a opera di John Broadhouse, affermando che «Per rendere un tedesco potente serve un inglese potente; i nuovi termini tedeschi coniati richiedono di coniare nuovi termini corrispondenti in inglese».

La quarta edizione tedesca uscì nel 1890; fu l’ultima preparata da Engels. Con più tempo a disposizione, egli poté incorporare, pur escludendone ancora diverse, altre correzioni apportate da Marx alla versione francese. Affermò nella prefazione: «ho confrontato di nuovo l’edizione francese con le note del manoscritto di Marx e ho accolto, nel testo tedesco, alcune altre aggiunte tratte da essa». Fu molto soddisfatto del suo risultato finale e solo l’edizione popolare preparata da Karl Kautsky, nel 1914, apportò miglioramenti ulteriori.

Alla ricerca della versione definitiva

L’edizione engelsiana del 1890 divenne la versione canonica del Capitale dalla quale vennero tradotte la gran parte delle traduzioni in tutto il mondo. A oggi, il Libro I è stato pubblicato in 66 lingue e in 59 di esse sono stati tradotti anche i libri II e III. A eccezione del Manifesto del partito comunista, redatto assieme a Engels e stampato, probabilmente, in oltre 500 milioni di copie, nonché del Libretto rosso di Mao Zedong – che conobbe ancora maggiore circolazione – nessun altro classico di politica, filosofia o economia ha avuto una diffusione paragonabile a quella del Libro I del Capitale.

Il dibattito in merito alla sua migliore versione non si è, però, mai esaurito. Quale tra queste cinque edizioni presenta la migliore struttura dell’opera? Quale versione include le acquisizioni teoriche dell’ultimo Marx? Anche se il Libro I non presenta le difficoltà editoriali dei libri II e III, che comprendono centinaia di modifiche apportate da Engels, è ugualmente un bel grattacapo. Alcuni traduttori hanno deciso di affidarsi alla versione del 1872-73 – l’ultima edizione tedesca rivista da Marx. Una recente nuova versione tedesca del 2017 (a cura di T. Kuczynski) ha proposto una variante che, avocando a sé maggiore fedeltà alla volontà di Marx, include ulteriori modifiche approntate per la traduzione francese e non tenute in conto da Engels. La prima scelta ha il difetto di trascurare parti della versione francese che sono certamente superiori a quella tedesca, mentre la seconda ha prodotto un testo confuso e di difficile lettura. Meglio, dunque, edizioni che accludano un’appendice con le varianti apportate da Marx ed Engels per ciascuna versione e anche alcuni importanti manoscritti preparatori di Marx, fino a questo momento pubblicati soltanto in tedesco e in poche altre lingue.

Tuttavia, non esiste una versione definitiva del Libro I e la comparazione sistematica delle revisioni fatte da Marx ed Engels è affidata alla ricerca a venire dei loro più attenti conoscitori. Nonostante Marx sia stato considerato antiquato e dato per sconfitto dagli oppositori del suo pensiero politico, ancora una volta, una nuova generazione di lettori, militanti e studiosi si avvicina alla sua critica del capitalismo. In tempi bui come quelli presenti, si tratta di un piccolo buon auspicio per il futuro.

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Les múltiples cares del Capital

Passen els lustres i, tot i que s’ha descrit en diverses ocasions com un text antiquat, es torna a discutir sobre el capital de Karl Marx. Malgrat haver complert 157 anys (va ser publicat el 14 de setembre de 1867), la “crítica de l’economia política” confirma que posseeix totes les virtuts dels grans clàssics: estimula nous pensaments a cada relectura i és capaç d’il·lustrar aspectes fonamentals del passat com de la contemporaneïtat.

Simultàniament, té el mèrit de circumscriure la crònica del present, així com el pes dels seus, sovint inadequats, protagonistes, en la posició relativa que li correspondria. No és casualitat que el cèlebre escriptor italià Italo Calvino afirmés que un clàssic és tal també perquè ens ajuda a “relegar l’actualitat al rang de soroll de fons”. Els clàssics assenyalen les qüestions essencials i els punts ineludibles per poder-les entendre a fons i explicar-les. Per això conquereixen per sempre l’interès de noves generacions de lectors. Un clàssic continua sent indispensable malgrat el pas del temps i, de fet, en el cas del capital es pot afirmar que aquest escrit adquireix més eficàcia com més es difon el capitalisme en tots els racons del planeta i s’expandeix en totes les esferes de les nostres vides.

Tornant a Marx

Després de l’esclat de la crisi econòmica de 2007-2008, el redescobriment del magnum opus de Marx va ser una necessitat real, gairebé la resposta a una emergència: tornar a posar en circulació el text –que tots havíem oblidat, després de la caiguda del Mur de Berlín– que proporcionava claus interpretatives encara vàlides per comprendre les veritables causes de la bogeria destructiva del capitalisme. Així va ser com, mentre que els índexs de les borses mundials cremaven centenars de milers de milions de dòlars i nombroses institucions financeres declaraven fallida, en pocs mesos, El capital va vendre més còpies de totes les que s’havien imprès durant els vint anys anteriors. Llàstima que el seu revival no s’hagi trobat el que quedava de les forces de l’esquerra. Es van il·lusionar de poder millorar un sistema que mostrava, cada vegada més, la seva irreformabilitat i, quan van ser forces de govern, van adoptar blandis pal·liatius que no van esclafar de cap manera les cada vegada més dramàtiques desigualtats econòmiques i socials i la crisi ecològica en curs. Els resultats d’aquestes decisions són a la vista de tots.

El present revival del Capital respon, en canvi, a una altra exigència: la de definir, també gràcies a la pertinent quantitat d’estudis apareguts recentment, quina és la versió més fiable de l’escrit al qual Marx va dedicar la major part de les seves tasques intel·lectuals. La intenció original del revolucionari alemany, que va acompanyar la redacció del primer manuscrit preparatori de l’obra (els Grundrisse de 1857-58), va ser dividir el seu treball en sis llibres. Els tres primers haurien d’haver estat dedicats a capital, propietat agrària i treball assalariat; els següents a l’Estat, el comerç exterior i el mercat mundial. La consciència, adquirida amb el pas dels anys, de la impossibilitat d’emprendre un pla tan vast va obligar Marx a desenvolupar un projecte més realitzable. Va pensar a deixar de banda els últims tres volums i integrar algunes parts dedicades a la propietat agrària i al treball assalariat en el llibre sobre el capital. Aquest últim es va concebre en tres parts: el Llibre I es dedicaria a El procés de producció del capital, el segon a El procés de circulació del capital i el tercer a El procés global de la producció capitalista. A ells se’ls hauria d’afegir un Llibre IV – dedicat a la història de la teoria – que, però, mai no va començar i sovint es confon erròniament amb les Teories sobre la plusvàlua.

Les cinc redaccions del Llibre I

Com és sabut, en comparació amb aquestes propostes, Marx només va aconseguir completar el Llibre I. Els llibres II i III només van veure la llum després de la seva mort, el 1885 i 1894, respectivament, gràcies a un enorme treball editorial de Friedrich Engels. Si els estudiosos més rigorosos s’han preguntat diverses vegades sobre la fiabilitat d’aquests dos volums, redactats sobre la base de manuscrits inacabats i fragmentaris, escrits al cap d’uns anys i que contenen nombrosos problemes teòrics no resolts, pocs s’han dedicat a una altra qüestió no menys espinosa: la d’establir si existia la versió definitiva del Llibre I. La controvèrsia ha tornat al centre d’atenció de traductors i editorials i, en els últims anys, han aparegut moltes noves i importants edicions del Capital. El 2024, algunes d’elles van sortir al Brasil, Itàlia i fins i tot als Estats Units, on la prestigiosa Princeton University Press publica, aquesta mateixa setmana, en una tirada de 13.000 còpies, la primera nova traducció a l’anglès després de cinquanta anys (editat per P. North i P.Reitter)- la quarta en aquesta llengua.
Publicat el 1867, després de més de vint anys d’investigació preparatòria, Marx no estava plenament satisfet amb l’estructura del volum. Havia acabat dividint-lo en tan sols sis llargs capítols i, sobretot, havia quedat descontent amb com havia exposat la teoria del valor que havia estat obligat a dividir en dues parts: una en el primer capítol, l’altra en un apèndix escrit, precipitadament, després del lliurament del manuscrit. Per tant, l’escrit va continuar absorbint una part de l’energia de Marx fins i tot després de la publicació. En vista de la segona edició, venuda en fascicles entre 1872 i 1873, Marx va reescriure la part crucial en la teoria del valor, va introduir diverses integracions sobre la diferència entre capital constant i variable, la plusvàlua, així com l’ús de màquines i tecnologia. A més, va remodelar tota l’estructura del llibre, dividint-lo en set seccions, incloent-hi 25 capítols, al seu torn acuradament dividits en paràgrafs.

Marx va acompanyar el més possible l’avanç de la traducció russa (1872) i va dedicar encara més energia a la preparació de la versió francesa, apareguda també en expedients entre 1872 i 1875. Va haver de dedicar molt més temps del que s’havia previst per corregir els esborranys. Insatisfet amb el treball fet pel traductor, que havia traduït el text massa literalment, va reescriure pàgines senceres, per tal de fer menys indigestes al públic francès les parts de l’exposició dialèctica i per fer canvis que es consideren imprescindibles. Es van concentrar principalment en la secció final, dedicada a “El procés d’acumulació de capital”. També va canviar la divisió dels capítols que van augmentar després d’una nova revisió de la redistribució de la matèria. En el pròleg de l’edició francesa, Marx no va dubtar a atribuir a la versió francesa “un valor científic independent de l’original”, i va observar que havia de “ser consultada també pels lectors que coneixen la llengua alemanya”. No per casualitat, quan el 1877 es va proposar la possibilitat d’una edició en anglès, Marx va assenyalar que el traductor havia de “comparar la segona edició alemanya amb la francesa”, en la qual havia “afegit alguna cosa nova i on havia descrit millor moltes coses”. No es tractava de mers retocs estilístics. Les alteracions que ha produït en les diverses edicions inclouen també els resultats dels estudis incessants realitzats i els desenvolupaments d’un pensament crític en constant evolució. Marx va tornar a la versió francesa, destacant aspectes positius i negatius, fins i tot l’any següent. Va escriure a Nikolai Danielson, el traductor del Capital en rus, que contenia “moltes variants i afegits importants”, tot i que va admetre que també “es va veure obligat, sobretot en el primer capítol, a “aplanar” l’exposició”. Va ser per aquesta raó que va advertir la necessitat d’aclarir que els capítols «Béns i diners» i «La transformació dels diners en capital» haurien de ser «traduïts seguint exclusivament el text alemany». En qualsevol cas, es pot afirmar que la versió francesa va ser molt més que una traducció.

Marx i Engels tenien idees diferents sobre aquest tema. El primer, satisfet amb la nova versió, la va considerar, en molts llocs, una millora respecte a les anteriors. El segon, en canvi, malgrat felicitar-se per les millores teòriques aportades en alguns punts, va ser molt escèptic respecte a l’estil literari imposat pel francès i va escriure vigorosament: «Crec que seria un gran error prendre aquesta versió com a base per a la traducció anglesa». En conseqüència, quan se li va demanar, poc després de la desaparició de l’amic, que publiques la tercera edició alemanya (1883) del Llibre I, Engels es va limitar a modificar “només les coses més necessàries”. En el prefaci va informar el lector que la intenció de Marx era «reelaborar el text en gran mesura», però que el mal estat de salut li ho havia impedit. Engels va utilitzar un exemplar alemany, corregit en diversos punts per Marx, i una còpia de la traducció francesa, en la qual aquest havia indicat els passatges per a ell irrenunciables. Va limitar el seu treball al mínim i va poder declarar: «En aquesta tercera edició no ha canviat cap paraula de la qual jo no sàpiga, amb certesa, que l’autor mateix l’hauria canviat». No obstant això, no va introduir totes les variacions assenyalades per Marx.

La traducció anglesa (1887), totalment supervisada per Engels, es va dur a terme sobre la tercera edició alemanya. Va afirmar que aquesta última, igual que la segona edició alemanya, era superior a la traducció francesa, fins i tot per a l’estructura de l’índex. Va deixar clar en el prefaci al text anglès que s’havia recorregut a l’edició francesa sobretot per comprovar «quan l’autor mateix estava disposat a sacrificar, allà on en traduir hagués de ser la sacrificada quelcom del significat complet de l’original». Dos anys abans, en l’article “How not to Translate Marx“, Engels criticava sagaçment la mala traducció d’algunes pàgines del Capital, per John Broadhouse, afirmant que “powerful German requires powerful English to render it; new coined German terms require the coining of corresponding new terms in English“.

La quarta edició alemanya va sortir el 1890; va ser l’última preparada per Engels. Amb més temps a la seva disposició, va poder incorporar, si bé n’excloïa encara diverses, altres correccions aportades per Marx a la versió francesa. Va declarar en el prefaci: «He comparat de nou l’edició francesa amb les notes del manuscrit de Marx i he acollit, en el text alemany, algunes altres addicions extretes d’ella». Va estar molt satisfet amb el seu resultat final i només l’edició popular preparada per Karl Kautsky el 1914 va aportar millores addicionals.

A la recerca de la versió definitiva

L’edició engelsiana de 1890 es va convertir en la versió canònica del Capital de la qual es van traduir la major part de les traduccions a tot el món. Fins avui, el Llibre I ha estat publicat en 66 llengües i en 59 d’elles s’han traduït també els llibres II i III. Exceptuant el Manifest del Partit Comunista, redactat juntament amb Engels i del que s’han imprès, probablement, més de 500 milions de còpies, així com el Llibre Vermell de Mao Zedong –que vaig conèixer encara més circulació– cap altre clàssic de política, filosofia o economia ha tingut una difusió comparable a la del Llibre I del Capital.

No obstant això, el debat sobre la seva millor versió mai ha acabat. Quina d’aquestes cinc edicions presenta la millor estructura de l’obra? Quina versió inclou les adquisicions teòriques de l’últim Marx? Encara que el Llibre I no presenta les dificultats editorials dels llibres II i III, que comprenen centenars de modificacions aportades per Engels, són igualment un bon grapat. Alguns traductors han decidit confiar en la versió de 1872-73 – l’última edició alemanya revisada per Marx. Una nova versió alemanya de 2017 (a cura de T. Kuczynski) va proposar una variant que, al·legant una major fidelitat a la voluntat de Marx, inclou modificacions addicionals de la traducció francesa que Engels no va tenir en compte. La primera opció té el defecte d’ignorar parts de la versió francesa que són certament superiors a l’alemanya, mentre que la segona ha produït un text confús i de difícil lectura. Millor, doncs, edicions que incloguin un apèndix amb les variants aportades per Marx i Engels per a cada versió i també alguns manuscrits preparatoris importants de Marx, fins ara publicats només en alemany i en poques altres llengües.

No obstant això, no hi ha una versió definitiva del Llibre I i la comparació sistemàtica de les revisions fetes per Marx i Engels s’encomana a la recerca a venir dels seus més atents coneixedors. Tot i que Marx va ser considerat antiquat i derrotat pels opositors al seu pensament polític, una vegada més, una nova generació de lectors, militants i estudiosos s’apropa a la seva crítica del capitalisme. En temps foscos com els actuals, es tracta d’un petit bon auguri per al futur.