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प्रथम इंटरनेशनल और उसकी समकालीन प्रासंगिकता

— मार्सेलो मुस्तो

[ पेरिस कम्यून की 154वीं वर्षगांठ के अवसर पर वह क्रांतिकारी मजदूर सरकार जिसने 18 मार्च से 28 मई 1871 तक पेरिस पर शासन किया था, हम मार्सेलो मुस्तो का यह लेख पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं. यह लेख इंटरनेशनल वर्किंग मेन्स एसोसिएशन के इतिहास और उससे मिलने वाली उन शिक्षाओं की समीक्षा करता है जो आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं: मेहनतकश वर्ग की एकजुटता, अंतरराष्ट्रीयतावाद, पूंजीवाद-विरोधी संघर्ष, तथा शोषण, युद्ध और असमानता के खिलाफ व्यापक जनआंदोलनों के निर्माण की जरूरत.

पूंजीवाद द्वारा पैदा किए गए हालिया संकटों ने शोषण, गरीबी और असमानताओं को पहले से भी अधिक तीखा बना दिया है. ऐसे दौर में 1864 में स्थापित इस संगठन की विरासत फिर से प्रासंगिक हो उठी है, और उसकी शिक्षाएं आज पहले से कहीं अधिक अहमियत रखती हैं.]

इंटरनेशनलिज्म की शुरुआत
28 सितंबर 1864 को अपनी पहली बैठक के बाद इंटरनेशनल वर्किंग मेन्स एसोसिएशन (जिसे आमतौर पर ‘प्रथम इंटरनेशनल’ कहा जाता है) ने बहुत तेजी से पूरे यूरोप में उत्साह और चर्चा पैदा कर दी. इसने वर्गीय एकजुटता को एक साझा आदर्श बनाया और बड़ी संख्या में महिलाओं और पुरुषों को शोषण के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित किया. इसकी गतिविधियों की बदौलत मजदूर पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के तौर-तरीकों को अधिक स्पष्टता से समझ सके, अपनी सामूहिक ताकत के प्रति अधिक जागरूक हुए और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष के नए तथा अधिक उन्नत रूप विकसित कर सके.

जब इंटरनेशनल की स्थापना हुई, तब उसकी सबसे महत्वपूर्ण प्रेरक शक्ति ब्रिटिश ट्रेड यूनियन आंदोलन था, जिसके नेता मुख्यतः आर्थिक सवालों पर केंद्रित थे. वे मजदूरों की हालत बेहतर बनाने के लिए संघर्ष करते थे, लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था को चुनौती नहीं देना चाहते थे. इसलिए वे इंटरनेशनल को मुख्यतः एक ऐसे साधन के रूप में देखते थे, जो हड़तालों के दौरान विदेशों से सस्ते श्रमिकों की भर्ती को रोक सके. इंटरनेशनल के भीतर दूसरा महत्वपूर्ण समूह फ्रांस के म्यूचुअलिस्टों का था, जिनका लंबे समय तक वहां प्रभाव रहा था. पिएर जोसेफ प्रूधों के सिद्धांतों के अनुरूप वे मजदूर वर्ग की राजनीतिक भागीदारी का विरोध करते थे और हड़ताल को भी संघर्ष के हथियार के रूप में स्वीकार नहीं करते थे. इसके अलावा कम्युनिस्ट भी थे, जो मौजूदा उत्पादन व्यवस्था का विरोध करते थे और उसे उखाड़ फेंकने के लिए राजनीतिक संघर्ष की आवश्यकता पर जोर देते थे. इंटरनेशनल की स्थापना के समय उसमें ऐसे कई मजदूर भी शामिल थे जो काल्पनिक समाजवादी (यूटोपियन) विचारों से प्रेरित थे, साथ ही निर्वासित राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे जिनके लोकतांत्रिक विचार अस्पष्ट थे और जो वर्गों के पार एकता की अवधारणा रखते थे. वे इंटरनेशनल को मुख्यतः उत्पीड़ित राष्ट्रों और जनता की मुक्ति के लिए सामान्य अपीलें जारी करने के मंच के रूप में देखते थे. इस प्रकार, अपने शुरुआती दौर में इंटरनेशनल एक ऐसा संगठन था जिसमें अनेक राजनीतिक परंपराएं साथ-साथ मौजूद थीं, और जिनमें से अधिकांश सुधारवादी थीं, क्रांतिकारी नहीं.

इन तमाम धाराओं को एक ऐसे साझा कार्यक्रम के इर्द-गिर्द साथ बनाए रखना, जो उनकी शुरुआती मान्यताओं से काफी अलग था, कार्ल मार्क्स की सबसे बड़ी राजनीतिक कामयाबी थी. उनकी राजनीतिक क्षमता ने उन प्रवृत्तियों को भी साथ लाने में सफलता हासिल की जिन्हें पहली नजर में एक-दूसरे के साथ जोड़ना असंभव लगता था. इंटरनेशनल को स्पष्ट दिशा देने वाले व्यक्ति मार्क्स ही थे. उन्होंने ऐसा राजनीतिक कार्यक्रम तैयार किया जो किसी को बाहर करने वाला नहीं था, लेकिन जिसकी बुनियाद मजदूर वर्ग की स्वतंत्र राजनीति पर दृढ़ता से टिकी हुई थी. इसी वजह से इंटरनेशनल को संकीर्ण गुटबाजी से ऊपर उठकर व्यापक जनसमर्थन मिला. मार्क्स उसके जनरल काउंसिल की राजनीतिक आत्मा थे. यही वह निकाय था जो विभिन्न धाराओं के बीच एक साझा समझ विकसित करता था और पूरे संगठन के लिए दिशा-निर्देश तय करता था. इंटरनेशनल के लगभग सभी प्रमुख प्रस्तावों का मसौदा मार्क्स ने तैयार किया और उसके लगभग सभी कांग्रेस प्रतिवेदनों को लिखने की जिम्मेदारी भी उन्होंने ही निभाई.

फिर भी, बाद के वर्षों में सोवियत संघ के प्रचारतंत्र द्वारा बनाई गई छवि के विपरीत, यह संगठन किसी एक व्यक्ति की रचना भर नहीं था, चाहे वह व्यक्ति मार्क्स जितना प्रतिभाशाली ही क्यों न हो. यह मेहनतकश वर्ग की मुक्ति के लिए खड़ा हुआ एक विशाल सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन था; जैसा कि अक्सर लिखा जाता है, यह ‘मार्क्स की रचना’ नहीं थी. इंटरनेशनल का जन्म सबसे पहले 1860 के दशक में उभरे मजदूर आंदोलनों और उनके संघर्षों की बदौलत संभव हुआ. उसके बुनियादी नियमों में से एक – और उससे पहले के मजदूर संगठनों से उसका सबसे बुनियादी फर्क – यह था कि ‘मेहनतकश वर्ग की मुक्ति का काम स्वयं मेहनतकश वर्ग को ही करना होगा.’ यह धारणा कि मार्क्स ने अपने अध्ययन-कक्ष में पहले से तैयार किसी राजनीतिक सिद्धांत को इतिहास के मंच पर यांत्रिक ढंग से लागू कर दिया था, ऐतिहासिक सच्चाई से मेल नहीं खाती. मार्क्स इंटरनेशनल के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे, लेकिन इंटरनेशनल का प्रभाव भी मार्क्स पर उतना ही सकारात्मक और गहरा पड़ा. मजदूरों के संघर्षों से सीधे जुड़ने के कारण मार्क्स को अपने विचारों को और विकसित करने, कई बार उनमें संशोधन करने, पुरानी निश्चित मान्यताओं पर पुनर्विचार करने और नए सवाल उठाने की प्रेरणा मिली. इसी प्रक्रिया में उन्होंने पूंजीवाद की अपनी आलोचना को और अधिक पैना बनाया तथा भावी साम्यवादी समाज की व्यापक रूपरेखा को भी अधिक स्पष्टता से सामने रखा.

सिद्धांत और संघर्ष
उन्नीसवीं सदी के साठ के दशक के उत्तरार्ध और सत्तर के दशक की शुरुआत में यूरोप में तीखे सामाजिक संघर्षों का दौर था. विरोध-प्रदर्शनों और आंदोलनों में भाग लेने वाले अनेक मजदूरों ने इंटरनेशनल से संपर्क स्थापित करने का फैसला किया, जिसकी प्रतिष्ठा और प्रभाव बहुत तेजी से फैल रहा था. 1866 के बाद अनेक देशों में हड़तालों की संख्या और तीव्रता दोनों बढ़ीं, और वे मजदूर आंदोलनों की एक नई तथा महत्वपूर्ण लहर का केंद्र बन गईं. फ्रांस, बेल्जियम और स्विट्जरलैंड में मजदूरों द्वारा जीते गए कई संघर्षों में इंटरनेशनल ने निर्णायक भूमिका निभाई. इन संघर्षों का स्वरूप अक्सर एक जैसा होता था. दूसरे देशों के मजदूर हड़ताली श्रमिकों के समर्थन में आर्थिक सहायता जुटाते थे और यह भी तय करते थे कि वे ऐसे काम स्वीकार नहीं करेंगे जिससे उन्हें मालिकों के लिए औद्योगिक भाड़े के मजदूर की भूमिका निभानी पड़े. नतीजतन, पूंजीपतियों और कारखाना मालिकों को हड़तालियों की अनेक मांगें मानने के लिए समझौता करना पड़ा. इन सफलताओं में उन अखबारों की भी बड़ी भूमिका थी जो या तो इंटरनेशनल के विचारों के प्रति सहानुभूति रखते थे या फिर सीधे उसके जनरल काउंसिल के मुखपत्र के रूप में काम करते थे. इन अखबारों ने वर्गीय चेतना के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया और इंटरनेशनल की गतिविधियों से जुड़ी खबरों को तेजी से एक देश से दूसरे देश तक पहुंचाने का काम किया.

पूरे यूरोप में इंटरनेशनल ने एक प्रभावशाली संगठनात्मक ढांचा खड़ा किया और अपने सदस्यों की संख्या में लगातार वृद्धि की. अपने चरम दौर में इसके लगभग डेढ़ लाख सदस्य थे. विभिन्न राष्ट्रीयताओं, भाषाओं और राजनीतिक संस्कृतियों से पैदा होने वाली तमाम कठिनाइयों के बावजूद, इंटरनेशनल अनेक संगठनों और स्वतःस्फूर्त जनसंघर्षों के बीच एकता और समन्वय कायम करने में सफल रहा. उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने वर्गीय एकजुटता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के निर्णायक महत्व को व्यवहार में साबित किया.

इंटरनेशनल मजदूर आंदोलन की कुछ सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक बहसों का मंच भी बना. साम्यवाद और अराजकतावाद जैसे प्रश्नों पर हुई चर्चाएं आज भी राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. इंटरनेशनल की कांग्रेसें वह जगह थीं जहां पहली बार एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन ने उन बुनियादी सवालों पर सामूहिक फैसले लिए, जिन पर उसकी स्थापना से पहले भी बहसें चल रही थीं. बाद में यही सवाल दुनिया भर के समाजवादी आंदोलनों के राजनीतिक कार्यक्रमों के केंद्रीय तत्व बने. इनमें ट्रेड यूनियनों की अपरिहार्य भूमिका, भूमि और उत्पादन के साधनों के सामाजिक स्वामित्व की आवश्यकता, चुनावों में भागीदारी का महत्व तथा मजदूर वर्ग की स्वतंत्र राजनीतिक पार्टियों के माध्यम से ऐसा करने की जरूरत, महिलाओं की मुक्ति का प्रश्न, और युद्ध को पूंजीवादी व्यवस्था की अनिवार्य उपज के रूप में समझने की अवधारणा शामिल थीं.

इंटरनेशनल का प्रभाव केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहा. अटलांटिक महासागर के उस पार, हाल के वर्षों में अमेरिका पहुंचे प्रवासियों ने वहां इंटरनेशनल की पहली शाखाएं स्थापित करनी शुरू कर दीं. फिर भी, संगठन अपने जन्मकाल से ही दो ऐसी कमजोरियों से ग्रस्त था जिन्हें वह कभी पूरी तरह दूर नहीं कर सका. पहली, लंदन स्थित जनरल काउंसिल की बार-बार की अपीलों के बावजूद, वह अपनी विभिन्न संबद्ध इकाइयों के भीतर मौजूद राष्ट्रीयतावादी सीमाओं को पूरी तरह नहीं तोड़ पाया. दूसरी, वह अमेरिका में जन्मे स्थानीय मजदूरों को बड़े पैमाने पर अपने साथ जोड़ने में असफल रहा. दिसंबर 1870 में जब जर्मन, फ्रांसीसी और चेक शाखाओं ने उत्तरी अमेरिका के लिए इंटरनेशनल की केंद्रीय कमेटी का गठन किया, तो यह इंटरनेशनल के इतिहास में एक अनोखी घटना थी. इस कमेटी के सभी सदस्य विदेशों में जन्मे प्रवासी थे. इस असामान्य स्थिति का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह था कि अमेरिका में इंटरनेशनल कभी भी अंग्रेजी भाषा का अपना कोई अखबार या नियमित प्रकाशन विकसित नहीं कर सका. 1870 के दशक की शुरुआत तक इंटरनेशनल की लगभग 50 शाखाएं और कुल मिलाकर करीब 4,000 सदस्य थे. लेकिन उस समय अमेरिका के औद्योगिक क्षेत्र में बीस लाख से अधिक मजदूर काम कर रहे थे. इस लिहाज से इंटरनेशनल का प्रभाव अभी भी अमेरिकी मजदूर वर्ग के केवल एक छोटे से हिस्से तक ही सीमित था.

उत्कर्ष और संकट
इंटरनेशनल के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण क्षण पेरिस कम्यून के साथ जुड़ा हुआ था. मार्च 1871 में, फ्रेंको-प्रुशियन युद्ध की समाप्ति के बाद पेरिस के मजदूरों ने एडोल्फ थियर्स की नई सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया और शहर की सत्ता अपने हाथों में ले ली. इसके बाद इंटरनेशनल राजनीतिक तूफान के केंद्र में आ गया और उसे अभूतपूर्व प्रसिद्धि मिली.

पूंजीपतियों और मध्यवर्ग के लिए वह स्थापित व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बन गया था, जबकि मजदूरों के लिए उसने शोषण और अन्याय से मुक्त दुनिया की उम्मीदों को नई ताकत दी. मजदूर आंदोलन असाधारण जीवंतता से भरा हुआ था, और इसके संकेत हर जगह दिखाई दे रहे थे. इंटरनेशनल से जुड़े अखबारों की संख्या भी बढ़ी और उनका प्रसार भी. पेरिस के विद्रोह ने मजदूर आंदोलन को और अधिक मजबूत किया. इसने उसे अधिक क्रांतिकारी राजनीतिक रुख अपनाने और अपने संघर्षों को और तेज करने के लिए प्रेरित किया. फ्रांस ने एक बार फिर इतिहास को यह दिखाया कि क्रांति संभव है. उसने यह भी स्पष्ट किया कि उसका लक्ष्य पूंजीवादी समाज से भिन्न एक नई सामाजिक व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए. लेकिन साथ ही यह भी सामने आया कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मजदूर वर्ग को टिकाऊ और सुव्यवस्थित राजनीतिक संगठनों का निर्माण करना होगा. इसके बाद अगला कदम, जैसा कि कार्ल मार्क्स ने कहा था, यह समझना था कि ‘मजदूर वर्ग का आर्थिक आंदोलन और उसकी राजनीतिक कार्रवाई एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं.’ इसी समझ के आधार पर 1871 के लंदन सम्मेलन में इंटरनेशनल ने आधुनिक मजदूर आंदोलन के एक अत्यंत महत्वपूर्ण हथियार – राजनीतिक पार्टी – के निर्माण पर जोर दिया. हालांकि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उस समय राजनीतिक पार्टी की जो अवधारणा विकसित की जा रही थी, वह बाद में अक्टूबर क्रांति के बाद उभरे कम्युनिस्ट संगठनों की अवधारणा की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और लचीली थी.

1872 में हेग कांग्रेस के बाद जब इंटरनेशनल ने स्वयं को भंग किया, तब वह अपनी स्थापना के समय वाले संगठन से काफी अलग बन चुका था. अब सुधारवादी धाराएं उसके भीतर बहुमत में नहीं थीं और पूंजीवाद-विरोध पूरे संगठन की साझा राजनीतिक दिशा बन चुका था. इसमें मिखाइल बाकुनिन के नेतृत्व वाली अराजकतावादी धारा जैसी नई प्रवृत्तियां भी शामिल थीं.

इस बीच व्यापक राजनीतिक परिदृश्य भी पूरी तरह बदल चुका था. 1871 में जर्मनी के एकीकरण ने एक नए युग की शुरुआत की पुष्टि कर दी, जिसमें राष्ट्र-राज्य राजनीतिक, कानूनी और क्षेत्रीय पहचान का केंद्रीय रूप बनकर उभरा. इस बदली हुई परिस्थिति में इंटरनेशनल का शुरुआती ढांचा पुराना पड़ने लगा, और उसकी मूल ऐतिहासिक भूमिका भी लगभग पूरी हो चुकी थी. अब काम केवल पूरे यूरोप में हड़तालों के समर्थन का समन्वय करना नहीं रह गया था. न ही मुख्य चुनौती ऐसे सम्मेलन आयोजित करना था जो ट्रेड यूनियनों की उपयोगिता या भूमि और उत्पादन के साधनों के सामाजिक स्वामित्व की आवश्यकता का प्रचार करें. ये विचार अब संगठन की सामूहिक विरासत का हिस्सा बन चुके थे.

पेरिस कम्यून के बाद मजदूर आंदोलन के सामने असली चुनौती यह थी कि वह खुद को किस तरह संगठित करे ताकि पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था का अंत किया जा सके और बुर्जुआ समाज की संस्थाओं को उखाड़ फेंका जा सके.

इंटरनेशनलिज्मः तब और आज
प्रथम इंटरनेशनल की 156वीं वर्षगांठ (2020 में) ऐसे समय में आई जब दुनिया 19वीं सदी के उस दौर से बिल्कुल अलग परिस्थितियों में खड़ी थी. उस समय की उम्मीदों और आज के व्यापक अविश्वास के बीच एक गहरी खाई मौजूद है. इंटरनेशनल के दौर की व्यवस्था-विरोधी चेतना और एकजुटता की भावना का आज उस दुनिया से बहुत कम मेल है जिसे नवउदारवादी प्रतिस्पर्धा, निजीकरण और बाजारवादी सोच ने नए सिरे से गढ़ा है. उस दौर की सामूहिकता की जगह आज वैचारिक अधीनता और व्यक्तिवाद ने ले ली है.

मेहनतकश दुनिया को एक ऐतिहासिक पराजय का सामना करना पड़ा है और वामपंथ अब भी गहरे संकट से उबर नहीं पाया है. नवउदारवादी नीतियों के लंबे दौर के बाद वह व्यवस्था, जिसके खिलाफ मजदूरों ने संघर्ष किया था और कई महत्वपूर्ण जीत हासिल की थीं, फिर से शोषण की उन परिस्थितियों की ओर लौट आई है जो उन्नीसवीं सदी की याद दिलाती हैं. श्रम बाजार में लागू की गई तथाकथित ‘सुधार’ नीतियों ने, जिसका मूल प्रगतिशील अर्थ अब पूरी तरह बदल चुका है, साल-दर-साल मजदूरों के लिए अधिक ‘लचीलापन’ और नौकरी से निकाले जाने की आसान व्यवस्था लागू की है. इसके परिणामस्वरूप असमानताएं और गहरी हुई हैं. सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया ने कई बड़े राजनीतिक और आर्थिक बदलाव देखे हैं. इनमें वैश्वीकरण से पैदा हुए सामाजिक परिवर्तन, मौजूदा उत्पादन प्रणाली द्वारा पैदा की गई पर्यावरणीय तबाहियां, संपन्न और शोषक अल्पसंख्यक तथा निर्धन बहुसंख्यक आबादी के बीच लगातार चौड़ी होती खाई, पूंजीवाद के इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक संकटों में से एक – 2008 का वित्तीय संकट – युद्ध, नस्लवाद और अंधराष्ट्रवाद की तेज होती आंधियां, और हाल के वर्षों में कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी शामिल हैं.

ऐसी परिस्थितियों में वर्गीय एकजुटता पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो जाती है. स्वयं कार्ल मार्क्स ने इस बात पर जोर दिया था कि मजदूरों के बीच आपसी टकराव – चाहे वह स्थानीय और प्रवासी मजदूरों के बीच ही क्यों न हो, जिनमें से प्रवासी अक्सर भेदभाव का भी शिकार होते हैं – शासक वर्गों के प्रभुत्व को बनाए रखने का एक बुनियादी साधन है. निस्संदेह, सामाजिक संघर्षों, राजनीतिक पार्टियों और ट्रेड यूनियनों के संगठन के नए रूपों का आविष्कार करना होगा. डेढ़ सौ साल पहले अपनाए गए तौर-तरीकों को ज्यों-का-त्यों दोहराया नहीं जा सकता. लेकिन इंटरनेशनल की वह पुरानी सीख आज भी पूरी तरह सही साबित होती है कि यदि शोषित लोग एक साझा मोर्चा नहीं बनाते, तो उनकी हार निश्चित है. इसके बिना हमारे सामने केवल दो ही संभावनाएं बचती हैं – गरीबों के बीच आपसी संघर्ष और व्यक्तियों के बीच बेलगाम प्रतिस्पर्धा की दुनिया.

आज की तथाकथित ‘विश्व व्यवस्था’ की बर्बरता समकालीन मजदूर आंदोलन के सामने यह तात्कालिक आवश्यकता रखती है कि वह खुद को फिर से संगठित करे. इसके लिए उसे इंटरनेशनल की दो सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं से सीख लेनी होगी – उसके संगठनात्मक ढांचे की बहुलता और उसके लक्ष्यों की क्रांतिकारी स्पष्टता. 1864 में लंदन में स्थापित उस संगठन के उद्देश्य आज शायद पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं. लेकिन वर्तमान चुनौतियों का सामना करने के लिए किसी भी नए इंटरनेशनल को दो बुनियादी शर्तों को अपनाना होगा – बहुलतावाद और पूंजीवाद-विरोध. इन्हीं के आधार पर वह आज की दुनिया में शोषण, असमानता और युद्ध की व्यवस्था को चुनौती देने वाली एक प्रभावशाली ताकत बन सकता है.

(लिबरेशन, जून-2026 में प्रकाशित, हिंदी अनुवाद: मनमोहन)

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गोपाल प्रधान, पहली बार समकालीन सृजन का समवेत स्वर

पूंजी कार्ल मार्क्स द्वारा लिखा गया युगांतकारी ग्रंथ है। इस ग्रंथ को शुरुआत में आलोचनाओं का सामना करना पडा। प्रतिभा से ईर्ष्या कोई नयी बात नहीं। बहरहाल मार्क्स द्वारा रचित इस ग्रंथ में वह बात थी जिससे शीघ्र ही इस ग्रंथ को लोकप्रियता मिलनी शुरु हो गयी। बैक्स ने तो न केवल यह माना कि ‘पूंजी’ इस ‘सदी की सबसे महत्व की किताबों में से एक है’, बल्कि मार्क्स की शैली की भी प्रशंसा की और उसकी तुलना इसके ‘आकर्षण और उमंग’, इसके ‘हास्य’ और इसकी ‘सर्वाधिक अमूर्त सिद्धांतों की अत्यंत बोधगम्य प्रस्तुति’ के लिए शापेनहावर से की। मार्चेलो मुस्तो की किताब ‘मार्क्स के आखिरी दिन’ का प्रवाहपूर्ण अनुवाद किया है प्रख्यात मार्क्सवादी आलोचक गोपाल प्रधान ने। इस किताब का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर पढते हैं गोपाल प्रधान का आलेख ‘पूंजी का यूरोप में प्रसार’।

 

गोपाल प्रधान

 

 

बुजुर्ग की मकबूलियत

 

‘पूंजी’ का यूरोप में प्रसार

 

1881 में मार्क्स अंतर्राष्ट्रीय मजदूर आंदोलन के लिए अब भी वैसे सैद्धांतिक संदर्भ नहीं बने थे जिस तरह का संदर्भ वे बीसवीं सदी में बनने वाले थे। 1848 की क्रांतियों की पराजय के बाद बहुत कम राजनीतिक नेता या बुद्धिजीवी उनसे जुड़े रह गए थे। उसके अगले दशक में भी हालात में कोई खास सुधार नहीं आया था।

 

 

कार्ल मार्क्स

 

इंटरनेशनल के विकास और पेरिस कम्यून की यूरोपव्यापी अनुगूंज ने तस्वीर बदल दी थी और उनका नाम फैल गया तथा उनके लेखन का ठीक ठाक प्रसार होने लगा। ‘कैपिटल’ का प्रसार जर्मनी में शुरू हुआ (वहां 1873 में एक नया संस्करण छपा था), रूस (जहां 1872 में इसका अनुवाद छपा) और फ़्रांस (जहां 1872 से 1875 के बीच टुकड़ों में इसका प्रकाशन हुआ) में भी इसकी बिक्री होने लगी। बहरहाल इन जगहों पर भी मार्क्स के विचारों को समकालिक अन्य समाजवादियों के विचारों के साथ अल्पमत में रहते हुए होड़ करनी पड़ती थी।

जर्मनी में मार्क्स से जुड़ी सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर’स पार्टी (SDAP) और फ़र्दिनान्द लासाल द्वारा स्थापित जनरल एसोसिएशन आफ़ जर्मन वर्कर्स (ADAV) ने गोथा विलय कांग्रेस के जरिए 1875 में एक ऐसा कार्यक्रम अपनाया जिस पर लासाल के अधिक मजबूत निशान थे। फ़्रांस और बेल्जियम में मजदूर वर्ग के भीतर पियरे-जोसेफ प्रूधों के विचार अधिक प्रभावी थे और मार्क्स के विचारों से प्रेरित समूह संख्या-बल या राजनीतिक पहलकदमी के लिहाजन अगस्त ब्लांकी से प्रभावित समूहों के मुकाबले कुछ खास अधिक न थे। रूस में एक खास जटिलता यह थी कि पूंजीवादी उत्पादन पद्धति की मार्क्सी आलोचना को पिछड़े समाजार्थिक और राजनीतिक माहौल में पढ़ा और व्याख्यायित किया जा रहा था जो पूंजीवादी विकास के पश्चिम यूरोपीय माडल से खासा अलग था। दूसरी ओर ब्रिटेन में मार्क्स लगभग अज्ञात बने हुए थे[1] तथा इटली, स्पेन और स्विट्ज़रलैंड में उनकी रचनाओं के पाठक मुश्किल से मिलते थे क्योंकि वहां 1870 दशक में मिखाइल बाकुनिन का असर गहरा था। अटलांटिक सागर के दूसरे किनारे अमेरिका में बहुत कम लोगों ने उनके बारे में सुना भी था।

इसका एक और कारण यह था कि ‘कैपिटल’ समेत उनका अधिकांश लेखन अपूर्ण था। 1881 में जब उनसे कार्ल काउत्सकी ने पूछा कि आपकी सम्पूर्ण रचनाओं को छापने का समय आ गया है या नहीं तो उन्होंने व्यंग्य से जवाब दिया कि ‘पहले तो उन्हें लिखा जाना होगा’।

हालांकि मार्क्स अपने विचारों के विश्वव्यापी प्रसार को देखने के लिए तो जिंदा नहीं रहे लेकिन जीवन के आखिरी सालों के दौरान यूरोप के अनेक हिस्सों में उनके सिद्धांतों, खासकर उनके महान ग्रंथ में रुचि अधिकाधिक बढ़ती गई। इसके चलते परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाओं का जन्म हुआ। 1881 के उत्तरार्ध में कभी एंगेल्स ने एडुआर्ड बर्नस्टाइन (1850-1932) को लिखा कि ‘मार्क्स से ईर्ष्या’ ने भी सिर उठा लिया है। उदाहरण के लिए सोशलिस्ट वर्कर्स’ पार्टी फ़ेडरेशन आफ़ फ़्रांस (FPTSF) के भीतर ही दो धाराओं का टकराव चल रहा था। इस टकराव में एक ओर पूर्व अराजकतावादी पाल ब्रूस (1844-1912) के नेतृत्व में ‘सम्भववादी’ थे तो दूसरी ओर जूल्स गुदे (1845-1922) के नेतृत्व में मार्क्स के विचारों का एक समर्थक समूह था। विभाजन अनिवार्य था जिसके चलते दो नई पार्टियां अस्तित्व में आईं। एक, सुधारवादी सोशलिस्ट वर्कर्स’ फ़ेडरेशन आफ़ फ़्रांस (FTSF) और दूसरी, फ़्रेंच वर्कर्स पार्टी (POF) जो फ़्रांस की पहली ‘मार्क्सवादी’ पार्टी थी। लेकिन इस विभाजन से पहले अंदर ही दोनों समूहों के बीच तीखी वैचारिक लड़ाई होती रही थी। कुछ समय बाद मार्क्स को भी इसमें खींच लिया गया और जून 1880 में गुदे और पाल लाफ़ार्ग के साथ मिल कर उन्होंने फ़्रांस के वाम राजनीतिक मंच, फ़्रेंच वर्कर्स पार्टी का चुनावी कार्यक्रम भी लिखा।

ऐसे माहौल में ब्रूस और कम्यून के योद्धा तथा समाजवादी लेखक बेनोइत मालों (1841-1893) ने मार्क्स के सिद्धांतों को बदनाम करने के लिए हरेक साधन का सहारा लिया। उनका कड़ा जवाब देते हुए एंगेल्स ने खासकर मालों पर आरोप लगाया जो उनके मुताबिक ‘मार्क्स की खोजों का जनक साबित करने के लिए तमाम (लासाल, शाफ़्ले और असल में द पाएपे!) अन्य पूर्वजों को खोजने या थोपने का परिश्रम कर रहे हैं’ । इसके बाद उन्होंने द प्रोलेतारियन नामक साप्ताहिक के संपादकों की खबर ली जिन्होंने गुदे और लाफ़ार्ग पर मार्क्स का ‘भोंपू’ बजाने और ‘बिस्मार्क के हाथ फ़्रांसिसी मजदूरों को बेचने की चाहत’ का आरोप लगाया था। मालों और ब्रूस की शत्रुता को एंगेल्स ने अंध राष्ट्रवाद का लक्षण माना।

 

‘अधिकांश फ़्रांसिसी समाजवादियों के लिए यह अभिशाप है कि जिस देश ने दुनिया भर को फ़्रांसिसी विचारों का वरदान दिया उसे—-और ज्ञानोदय के केंद्र पेरिस को अब अचानक अपने समाजवादी विचार एक जर्मन व्यक्ति, मार्क्स से तैयारशुदा शक्ल में आयातित करने होंगे। लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता और इससे भी आगे मार्क्स की प्रतिभा, उनके जबर्दस्त वैज्ञानिक परिश्रम और उनके अविश्वसनीय पांडित्य ने उन्हें हम सबसे इतना आगे पहुंचा दिया है कि जो कोई भी उनकी खोजों की आलोचना करने की कोशिश करेगा उसकी उंगली ही सबसे पहले झुलस जाएगी। इस काम को थोड़ा और विकसित युग के लिए छोड़ देना होगा।’

 

एंगेल्स समझ नहीं सके कि ‘कोई प्रतिभा से कैसे ईर्ष्या’ कर सकता है इसलिए आगे कहा: ‘लेकिन छोटे दिमाग वाले छिद्रान्वेषी, जिनका अन्यथा कोई माने मतलब नहीं फिर भी खुद को बेहद महत्वपूर्ण लगाते हैं, उन्हें खासकर इस बात पर गुस्सा आता है कि अपनी सैद्धांतिक और व्यावहारिक उपलब्धियों के चलते मार्क्स को विभिन्न देशों के समस्त मजदूर आंदोलन के सर्वोत्तम लोगों का सच्चा भरोसा हासिल है। संकट की किसी भी स्थिति में वे उनसे ही सलाह मांगते हैं और आम तौर पर उनकी सलाह सर्वोत्तम साबित होती है। उनको यह भरोसा छोटे छोटे देशों की तो जाने दीजिए, जर्मनी में, फ़्रांस में और रूस तक में हासिल है। इसलिए मार्क्स उन पर अपनी राय, मर्जी का तो सवाल ही नहीं, थोपते नहीं हैं, बजाय इसके ये लोग ही उनके पास स्वेच्छा से आते हैं। और ठीक इसी अर्थ में उनका प्रभाव पड़ता है, आंदोलन के लिए इस प्रभाव का महत्व सबसे अधिक होता है।’

ब्रूस और उनके समर्थक जैसा समझते थे उसके विपरीत मार्क्स के मन में उनके प्रति कोई खास दुराव नहीं था। एंगेल्स ने स्पष्ट किया कि ‘फ़्रांसीसियों के प्रति मार्क्स का वही रुख (था) जो अन्य देशों के आंदोलनों के प्रति’ था जिनके साथ उनका ‘निरंतर सम्पर्क था—उस हद तक जिस हद तक उसका कोई मूल्य महत्व होता और जिस हद तक अवसर उपलब्ध होता’ था। निष्कर्ष के रूप में एंगेल्स ने जोर दिया कि ‘लोगों की इच्छा के विपरीत उन्हें प्रभावित करने की चेष्टा से हमें नुकसान (ही) होगा (और) इंटरनेशनल के दिनों से कायम पुराना भरोसा टूटेगा’।

 

गुदे और लाफ़ार्ग से स्वतंत्र भी अनेक फ़्रांसिसी लड़ाकू मार्क्स के सम्पर्क में थे। 1881 के शुरू में उन्होंने अपने दामाद चार्ल्स लांग्वे (1839-1903) को सूचित किया कि उनसे एक समाजवादी योद्धा और प्रकाशक एडुआर्ड फ़ोर्तिन (1854-1947) ने सम्पर्क किया है।

 

‘(उन्होंने) मुझे ढेर सारे पत्र ‘मेरे प्यारे स्वामी’ संबोधन के साथ लिखे हैं। उनकी मांग बेहद ‘साधारण’ है। उनका प्रस्ताव है कि ‘पूंजी’ को पढ़ते हुए वे उसका मासिक सार तैयार करेंगे और जिसे अत्यंत उदारता के साथ उन्होंने मुझे हरेक महीने भेजने का वादा किया है। वे यह भी चाहते हैं कि मैं मासिक दर से उन्हें सुधार दूं ताकि अगर किसी विंदु को उन्होंने गलत समझा हो तो वह स्पष्ट हो जाए। इस चुप्पा तरीके से जब वे आखिरी मासिक किस्त भेज दें और मैं सुधार कर वापस भेज दूं तो उनके पास प्रकाशन योग्य ऐसी पांडुलिपि होगी जिससे, उनके मुताबिक, फ़्रांस प्रकाशवर्षा से नहा उठेगा।’

 

चूंकि वे कुछ और महत्वपूर्ण मामलों में व्यस्त थे इसलिए मार्क्स ने फ़ोर्तिन को सूचित किया कि उनके अनुरोध को स्वीकार करना फिलहाल असम्भव है। लेकिन इस सम्पर्क के चलते एक अन्य बेहतर काम हो गया जब बाद में फ़ोर्तिन ने ‘लुई बोनापार्त की अठारहवीं ब्रूमेर’ का फ़्रांसिसी अनुवाद किया और इसे 1891 में छपवाया।

 

1881 में ‘पूंजी’ का एक लोकप्रिय सारांश डच भाषा में प्रकाशित हुआ। 1873 में जोहान मोस्ट (1846-1906) और 1879 में कार्लो काफ़िरो (1846-1892) वाले सारांशों के छपने के बाद यह तीसरा इस किस्म का प्रकाशन था। इसे लिखने वाले फ़र्दिनांद न्यूवेनहुइस ने परिशिष्ट जोड़ा ‘लेखक इस कृति को अत्यंत विनीत श्रद्धा के प्रतीक के रूप में कार्ल मार्क्स को समर्पित करता है जो गहन चिंतक और मजदूरों के अधिकारों के प्रबल योद्धा हैं’। उन्होंने प्रशंसा के भाव से मार्क्स के काम को मान्यता दी जिसका प्रसार अनेक यूरोपीय देशों में शुरू हो चुका था।

 

फ़रवरी 1881 में आगामी दूसरे संस्करण को ध्यान में रखते हुए मार्क्स ने न्यूवेनहुइस से कहा कि उनकी निगाह में काम बेहतरीन हुआ है और अब वे अपने कुछ सुझाव देना चाहते हैं ‘जिन भी संशोधनों को मैं जरूरी समझ रहा हूं उनका रिश्ता विवरणों से है, प्रमुख चीज, काम की भावना इसमें आ गई है’। इसी पत्र में उन्होंने अपनी एक ऐसी जीवनी का जिक्र किया जो एक उदारपंथी डच पत्रकार आर्नोल्डस केर्दिक (1846-1905) ने ‘मानेन वान बेटीकेनिस’ (हमारे समय के महत्वपूर्ण लोग) नामक एक पुस्तक श्रृंखला के तहत 1879 में छपाई थी। इसके प्रकाशक निकोलस बालसेम (1835-1884) ने उनके जीवन के बारे में सामग्री प्राप्त करने के लिए मार्क्स से सम्पर्क किया था और कहा था कि उनके विचारों से सहमत न होने के बावजूद उनके महत्व को समझता है। मार्क्स ‘ऐसे अनुरोधों को आदतन खारिज कर देते थे’ और बाद में छपे हुए पाठ को पढ़ कर गुस्सा हुए कि उनको ‘जान बूझ कर गलत उद्धृत किया गया’ है। उन्होंने न्यूवेनहुइस को लिखा:

 

‘एक डच पत्रिका ने अपना कालम मेरे (उत्तर के) लिए खोलने का प्रस्ताव किया लेकिन सिद्धांतत: मैं इस तरह के खोद विनोद का जवाब नहीं देता। लंदन में भी कभी मैंने इस तरह की साहित्यिक बकवास पर कभी तनिक भी ध्यान नहीं दिया। कोई भी दूसरा रास्ता अपनाने का मतलब होता कैलिफ़ोर्निया से ले कर मास्को तक हर जगह सुधार संशोधन करने में अपने जीवन का बेहतरीन हिस्सा गंवा देना। जवानी के दिनों में कभी कभी कुछ डंडे चलाए लेकिन उम्र के साथ समझदारी आई कि कम से कम शक्ति का व्यर्थ अपव्यय नहीं करना चाहिए।’

 

कुछ साल पहले मार्क्स ने यह उपरोक्त नतीजा निकाला था। 5 जनवरी 1879 को शिकागो ट्रिब्यून में छपे एक साक्षात्कार में उन्होंने चुटकी ली थी ‘मेरे बारे में जो कुछ कहा और लिखा गया है उन सबका खंडन करना हो तो मुझे बीसियों सचिवों की जरूरत होगी’ । उनके इस कड़े रुख से एंगेल्स भी पूरी तरह सहमत थे। जब मार्क्स ने न्यूवेनहुइस को यह लिखा उसके कुछ ही पहले काउत्सकी को लिखे एक पत्र में एंगेल्स ने मार्क्स के लेखन के सिलसिले में जर्मन अर्थशास्त्री अल्बर्ट शाफ़्ले (1831-1903) और अन्य ‘बैठे ठाले’ समाजवादियों द्वारा प्रदर्शित अनगिनत भूलों और गलतियों का जिक्र किया:

 

‘उदाहरण के लिए अकेले शाफ़्ले ने अपनी मोटी मोटी किताबों में जो भयंकर बकवाद एकत्र कर रखा है उसका खंडन मेरी नजर में समय की बरबादी है। इन सज्जन ने उद्धरण चिन्हों के भीतर पूंजी को ही जितने गलत तरीके से उद्धृत किया है उसे ही सही करने की कोशिश में एक ठीक ठाक किताब तैयार हो जाएगी।’

 

अंत में दबंग तरीके से लिखा कि ‘अपने सवालों का जवाब मांगने से पहले उन्हें पढ़ना और नकल करना सीखना होगा।’

 

दुर्व्याख्या और गलत उद्धरण के अतिरिक्त और उनके साथ ही राजनीतिक बहिष्कार की कोशिश के तहत मार्क्स के लेखन को वास्तविक विध्वंस का भी सामना करना पड़ा। फ़रवरी में निकोलाई डेनिएल्सन का ‘हमारे सुधारोत्तर सामाजिक अर्थतंत्र का खाका’ शीर्षक ‘सच्चे अर्थों में मौलिक’ लेख पढ़कर मार्क्स ने उन्हें पत्र लिखा । इसमें उन्होंने बताया : ‘अगर आप चालू चिंतन के जंजाल को तोड़ देते हैं तो सबसे पहले तय है कि आपका “बहिष्कार” किया जाएगा। असल में ढर्रे पर चलने वालों का यही एकमात्र सुरक्षा उपकरण है जिसका इस्तेमाल किंकर्तव्यविमूढ़ होने पर वे करना जानते हैं। सालों साल जर्मनी में मेरा “बहिष्कार” हुआ और इंग्लैंड में अब भी हो रहा है। समय समय पर मेरे विरुद्ध इतना बेतुका और बेवकूफी भरा हमला बिना किसी रूपभेद के होता है कि उस पर सार्वजनिक तौर पर ध्यान देते भी लज्जा आती है।’

 

बहरहाल जर्मनी में उनके इस विराट ग्रंथ की धीरे धीरे बिक्री हो रही थी। अक्टूबर 1881 में दूसरे संस्करण की प्रतियों के खत्म होने पर प्रकाशक ओट्टो माइजनेर (1819-1902) ने मार्क्स से कहा कि तीसरे संस्करण की तैयारी के लिए जरूरी संशोधन और काट छांट कर दें। दो महीने बाद मार्क्स ने अपने मित्र फ़्रेडरिक जोर्गे (1828-1906) से स्वीकार किया कि ‘यही सबसे सही मौका है’, कुछ ही समय पहले पुत्री जेनी को लिखा था कि वे ‘जितना ही जल्दी फिर से (खुद को) सक्षम महसूस करेंगे, (अपना) सारा समय दूसरे खंड को समाप्त करने में लगाना चाहते हैं’ । डेनिएल्सन से भी यही कहा- ‘जितना जल्दी सम्भव हो—मैं खंड दो खत्म कर देना चाहता हूं’ । साथ ही जोड़ा: अपने संपादक से तय कर लूंगा कि तीसरे संस्करण में अल्पतम सम्भव बदलाव और जोड़ घटाव करूंगा लेकिन वह तीन हजार प्रतियों के प्रकाशन की अपनी इच्छा की बजाए एक हजार प्रतियां ही छापे । जब ये—बिक जाएंगी तो फिर इस समय वांछित बदलाव थोड़ा भिन्न परिस्थितियों में कर लूंगा।’

 

मार्क्स जिस देश में 1849 से रह रहे थे वहां उनके विचारों का प्रसार अन्य जगहों की अपेक्षा थोड़ी धीमी रफ़्तार से सही लेकिन शुरू हो चुका था। 1881 में हिंडमैन ने ‘इंग्लैंड फ़ार आल’ शीर्षक किताब छापी जिसमें डेमोक्रेटिक फ़ेडरेशन बनाने के पीछे के निर्देशक सिद्धांतों का प्रतिपादन हुआ था। इसके आठ अध्यायों में से दो का शीर्षक ‘श्रम’ और ‘पूंजी’ था। इनमें मार्क्स के ग्रंथ का अनुवाद या व्याख्या थी। असल में हिंडमैन 1880 के उत्तरार्ध से ही मेटलैंड पार्क रोड नियमित रूप से आने लगे थे[2] और मार्क्स के सिद्धांतों का सार तैयार कर रहे थे। अपनी किताब में उन्होंने मार्क्स के नाम या उनके ग्रंथ तक का कोई उल्लेख नहीं किया। उन्होंने केवल लिखा कि ‘दूसरे और तीसरे अध्यायों में मौजूद विचार और अधिकांश सामग्री के लिए मैं एक महान चिंतक और मौलिक लेखक की रचना का आभारी हूं जो यकीनन जल्दी ही हमारे अधिकांश देशवासियों को भी उपलब्ध हो जाएगी’।

 

मार्क्स को हिंडमैन के पैम्फलेट की जानकारी उसके छपने के बाद ही हो सकी। देखकर वे दुखी और चकित हुए क्योंकि सब कुछ के अतिरिक्त ‘पूंजी’ के हिस्सों को ‘शेष पाठ से उद्धरण चिन्हों के जरिए अलगाया नहीं गया है, इनमें से ज्यादातर सटीक नहीं हैं और इनसे भ्रम भी पैदा होता है’।[3] इसीलिए जुलाई के शुरू में उनको पत्र लिखा: ‘स्वीकार करने दीजिए कि मुझे अचम्भा हुआ जब पता चला कि लंदन में रहते हुए आपने ‘इंग्लैंड फ़ार आल’ अर्थात फ़ेडरेशन के बुनियादी कार्यक्रम पर अपने लेखन के दूसरे और तीसरे अध्याय के बतौर उन्नीसवीं सदी के खारिज लेख को संशोधित कर के छापने की अपनी परिपक्व और कार्यान्वित योजना को मुझसे छिपा कर रखा।’

 

इस मामले को मार्क्स ने फिर दिसम्बर में जोर्गे को लिखी चिट्ठी में उठाया : ‘जहां तक मेरी बात है उस बेवकूफ ने बहाने भरी तमाम बातें लिखीं मसलन कि ‘अंग्रेजों को विदेशियों की सीख पसंद नहीं आती’, कि ‘मेरे नाम से नफ़रत करते हैं आदि’। इस सबके बावजूद चूंकि उसकी पतली सी किताब में ‘पूंजी’ से चोरी की गई है इसलिए बेहतरीन प्रचार है, हालांकि वह आदमी निहायत ‘कमजोर’ पात्र है और उस धीरज से तो बहुत दूर है, जो कुछ भी सीखने या किसी मामले का गहराई से अध्ययन करने की पहली शर्त होती है’ ।

 

आपसी संबंध टूट जाने के बाद मार्क्स ने हिंडमैन को उन ‘भद्र मध्यवर्गीय लेखकों में’ शामिल माना ‘(जो) किसी भी संयोगवशात उठी अनुकूल लहर के साथ आए किसी भी नए विचार से तत्काल धन या नाम या राजनीतिक पूंजी बनाने की खुजली से ग्रस्त रहते हैं।’[4] मार्क्स के शब्दों की रुखाई का कारण निश्चय ही नाम के साथ आभार प्रदर्शन के अभाव की निराशा न थी। क्योंकि उनका मानना था ‘कि ‘पूंजी’ और इसके लेखक का नाम देना भारी भूल होती। पार्टी कार्यक्रमों को किसी भी लेखक या किताब पर प्रत्यक्ष निर्भरता से मुक्त रखा जाना चाहिए। इसके साथ लेकिन यह भी कहने की अनुमति दीजिए कि इनमें, जिस तरह आपने ‘पूंजी’ से ले लिया है उस तरह, नए वैज्ञानिक विकासों को पेश करना अनुचित होता है। वे बातें कार्यक्रम पर आपकी टिप्पणी के मेल में एकदम नहीं हैं क्योंकि उसके घोषित लक्ष्य के साथ उनका कोई संबंध नहीं है।[5] उनका प्रवेश किसी ऐसे कार्यक्रम की व्याख्या के लिए पूरी तरह उपयुक्त होता जिसे मजदूर वर्ग की स्वतंत्र और अलग पार्टी की स्थापना के लिए तैयार किया गया होता।’

 

हिंडमैन की अशिष्टता के साथ ही मार्क्स के क्रोध का मुख्य कारण उनका यह सरोकार था कि ‘पूंजी’ का उपयोग ऐसी किसी परियोजना के लिए नहीं होना चाहिए जो स्पष्ट रूप से उसमें मौजूद विचारों से कतई मेल नहीं खाती। दोनों व्यक्तियों के बीच का अंतर सचमुच गहरा था। हिंडमैन तो इस विचार को कतई नहीं मानते थे कि सत्ता पर क्रांतिकारी कार्यवाही के जरिए कब्जा करना चाहिए; वे ब्रिटिश सुधारवाद के चरित्र के मुताबिक मानते थे कि बदलाव केवल शांतिपूर्ण साधनों से और क्रमश: हासिल करना चाहिए। फ़रवरी 1880 में उन्होंने मार्क्स से कहा था ‘प्रत्येक अंग्रेज के सामने लक्ष्य होना चाहिए कि वह बिना कठिनाई या खतरनाक टकराव के सामाजिक और राजनीतिक गोलबंदी करने में लगे’।

 

इसके उलट मार्क्स पहले से सोच समझ कर बनाई यांत्रिक योजना का विरोध करते थे। उन्होंने 1880 के उत्तरार्ध में हिंडमैन को जवाब दिया कि उनकी ‘पार्टी इंग्लैंड की क्रांति को अनिवार्य नहीं मानती लेकिन ऐतिहासिक उदाहरणों के मुताबिक सम्भव समझती है।’ सर्वहारा वर्ग के विस्तार ने सामाजिक सवाल के ‘विस्फोट’ को ‘अपरिहार्य’ बना दिया है।

 

‘अगर (यह विस्फोट) क्रांति में बदल जाता है तो यह न केवल शासक वर्गों की बल्कि मजदूर वर्ग की भी गलती होगी। शासक वर्गों से प्रत्येक शांतिपूर्ण रियायत उन पर “बाहरी दबाव” के चलते हासिल की गई है। उनकी कार्यवाही इस दबाव के अनुरूप चलती रही है। अगर मजदूर वर्ग अधिकाधिक कमजोर होता गया है तो केवल इसलिए कि इंग्लैंड का मजदूर वर्ग नहीं जानता कि कानूनी रूप से उन्हें प्राप्त शक्तियों और स्वतंत्रताओं का वह किस तरह इस्तेमाल करे’।

 

इस निर्णय के उपरांत उन्होंने जर्मनी की घटनाओं से तुलना की जहां ‘मजदूर वर्ग अपने आंदोलन की शुरुआत से ही इस बात को पूरी तरह जानता था कि बिना क्रांति के आप सैनिक तानाशाही से छुटकारा नहीं पा सकते। साथ ही उन्होंने यह भी समझा कि इस तरह की क्रांति सफल होने पर भी पहले से अगर संगठन न हो, उसने जानकारी न हासिल कर ली हो, प्रचार न चलाया हो तो आखिरकार उनके विरुद्ध हो जाएगी।—इसीलिए उन्होंने कड़ाई से कानूनी सीमाओं के भीतर ही अपना आंदोलन चलाया। कानून के परे सब कुछ सरकार के पक्ष में था जिसने मजदूरों को ही कानून के बाहर घोषित कर दिया। उनके अपराध उनके काम नहीं थे बल्कि वे विचार थे जिन्हें उनके शासक पसंद नहीं करते थे’।

 

इन बातों से सिद्ध है कि मार्क्स की निगाह में क्रांति महज व्यवस्था का तीव्र उन्मूलन नहीं था बल्कि वह एक लम्बी और जटिल प्रक्रिया थी।[6]

 

हालांकि मार्क्स के विचारों के चलते तीखी बहसें उठीं और वाद विवाद भी हुए लेकिन इंग्लैंड में भी उनका असर पड़ना शुरू हो गया। इसीलिए 1881 के अंत में मार्क्स ने जोर्गे को लिखे पत्र में बताया कि ‘देर से ही सही अंग्रेजों ने भी ‘पूंजी’ पर थोड़ा ज्यादा ही ध्यान देना शुरू कर दिया है’। अक्टूबर में ‘कनटेम्पोरेरी रिव्यू’ ने ‘कार्ल मार्क्स और युवा हेगेलपंथियों का समाजवाद’ शीर्षक एक लेख छापा जिसे मार्क्स ने ‘बेहद अपर्याप्त (और) भूल से भरा’ कहा लेकिन नई रुचि का संकेतक भी माना। कटुता के साथ उन्होंने आगे लिखा कि यह ‘उचित’ था क्योंकि इसके लेखक जान रे (1845-1915) ‘नहीं मानते कि चालीस साल से अपने घातक सिद्धांतों का प्रसार करने में मैं “खराब” इरादों से प्रेरित रहा हूं। मुझे उनकी “महामनस्कता” की दाद देनी चाहिए।’ कुल के बावजूद मार्क्स ने इस तरह के प्रकाशनों के बारे में अपना अभिमत संक्षेप में दर्ज किया ‘अपनी आलोचना के विषय से कम से कम पर्याप्त परिचित होने का औचित्य कलम के ब्रिटिश हम्मालों के लिए बेहद अनजानी चीज प्रतीत होती है।’

 

एक अन्य अंग्रेजी पत्रिका ‘माडर्न थाट’ ने मार्क्स के साथ थोड़ा सम्मानजनक बरताव किया और उनके काम के वैज्ञानिक चरित्र को मानने को तैयार हुई । पत्रकार और वकील अर्नेस्ट बेलफ़ोर्ट बैक्स (1854-1925) ने ‘पूंजी’ को ऐसी किताब कहा जिसमें ‘अर्थतंत्र में एक खास सिद्धांत का नियोजन इस तरह साकार हुआ है कि इसके क्रांतिकारी चरित्र और व्यापक महत्व की तुलना खगोलशास्त्र में कोपर्निकसीय व्यवस्था या आम यांत्रिकी में गुरुत्वाकर्षण के नियम से की जा सकती है।’

 

बैक्स को उम्मीद थी कि इसका अंग्रेजी अनुवाद जल्दी ही आएगा इसलिए उन्होंने न केवल माना कि ‘पूंजी’ इस ‘सदी की सबसे महत्व की किताबों में से एक है’, बल्कि मार्क्स की शैली की भी प्रशंसा की और उसकी तुलना इसके ‘आकर्षण और उमंग’, इसके ‘हास्य’ और इसकी ‘सर्वाधिक अमूर्त सिद्धांतों की अत्यंत बोधगम्य प्रस्तुति’ के लिए शापेनहावर से की।

 

मार्क्स इस ‘पहले ऐसे अंग्रेजी प्रकाशन’ से खुश हुए ‘जिसमें नए विचारों के प्रति असली उत्साह की व्याप्ति है और यह ब्रिटिश अनपढ़पन के विरोध में मजबूती से खड़ा है’। उन्होंने ध्यान दिया कि ‘मेरे आर्थिक सिद्धांतों की व्याख्या में और (‘पूंजी’ के उद्धरणों के) सही अनुवाद में—बहुत गड़बड़ी और भ्रम हैं’ लेकिन लेखक की कोशिशों के लिए उसकी प्रशंसा की और खुश हुए कि ‘इस लेख के प्रकाशन की घोषणा लंदन के वेस्ट एन्ड की दीवारों पर बड़े अक्षरों में प्लेकार्ड लगा कर की गई थी इसलिए बड़ी उत्तेजना पैदा हुई ।’

 

 

मार्क्स के विचारों का व्यापक प्रसार 1870 दशक से ही नजर आने लगा था। नए दशक के आरम्भ में भी यह प्रसार जारी रहा। बहरहाल अब उनका प्रसार अनुयायियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के छोटे घेरे तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि उन्हें व्यापक पाठक समुदाय मिलना शुरू हुआ। मार्क्स में रुचि अब केवल उनके राजनीतिक लेखन, मसलन कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र और इंटरनेशनल के प्रस्तावों तक ही सीमित नहीं रह गई, बल्कि उसका विस्तार उनके प्रमुख सैद्धांतिक योगदान, राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना, तक भी हुआ। ‘पूंजी’ में निहित सिद्धांतों की चर्चा और प्रशंसा विभिन्न यूरोपीय देशों में शुरू हो गई और कुछ ही सालों बाद, आगामी दिनों में मशहूर होने वाले उद्धरण की शब्दावली में, एंगेल्स ने अपने मित्र के इस ग्रंथ को बिना किसी संकोच के ‘मजदूर वर्ग की बाइबल’ कहा। कौन जानता है कि पवित्र ग्रंथों के प्रचंड विरोधी मार्क्स ने इस बात का बुरा न माना होता!

जीवन का दंगल

जून 1881 के पहले दो हफ़्तों में जेनी फ़ान वेस्टफालेन की सेहत और बुरी हो गई। उनके ‘वजन और ताकत में लगातार और बढ़ती हुई गिरावट’ चिंताजनक थी तथा दवा का कोई असर भी नहीं हो रहा था। डाक्टर द्वोर्किन ने उन्हें लंदन की जलवायु से दूर जाने को प्रेरित किया। उम्मीद थी कि इससे उनकी सेहत इतनी स्थिर हो जाएगी कि पुत्री जेनी तथा प्यारे नाती-नतिनी से पेरिस में मिलने की पूर्वनिर्धारित यात्रा कर सकें। इसलिए मार्क्स और उनकी पत्नी ने कुछ समय समुद्री खाड़ी में ईस्टबोर्न में बिताने का फैसला किया।

 

उस समय मार्क्स की सेहत भी ठीक नहीं थी और उम्मीद थी कि कुछ समय के समुद्री संसर्ग के चलते वे न केवल, जैसा चाहते थे, पत्नी के साथ समय गुजारने को मिल जाता बल्कि उनकी सेहत के लिए भी लाभप्रद होता। एंगेल्स ने जेनी लांग्वे को महीने के दूसरे पखवारे में सूचित किया कि ‘यह बदलाव मूर के लिए भी समान रूप से लाभप्रद (होगा)’।[7] ‘वे भी थोड़ी स्फूर्ति चाहते हैं, एक और बात है कि अब रात को उनको उतनी बुरी तरह खांसी नहीं आती और बेहतर नींद सोते हैं।’ मार्क्स ने अपने कष्ट के बारे में जोर्गे को बताया। 20 जून को माना कि वे ‘लगातार 6 महीनों से अधिक समय से खांसी, जुकाम, गले की सूजन और गठिया की तकलीफ उठा रहे हैं। इसके चलते वे शायद ही कभी बाहर निकले हों और समाज से लगभग बाहर रहे हैं।’

 

महीने के अंत में मार्क्स और उनकी पत्नी ईस्टबोर्न के लिए निकले और वहां लगभग तीन हफ़्ते रहे। इस यात्रा और डाक्टरों की जरूरी सलाह का खर्च एंगेल्स ने उठाया। जुलाई में उन्होंने इस दोस्त को चिंतामुक्त किया ‘आपको सौ से एक सौ बीस पौंड तक मिल सकते हैं। सवाल सिर्फ़ यह है कि ये सारा धन आप एक बार में ही चाहते हैं या कितना वहां भेजूं और कितना यहां के लिए रखूं।’

 

लौरा और एलीनोर बारी बारी से माता पिता के साथ कुछ समय तक रहे और उनकी सेवा की। लेकिन जेनी फ़ान वेस्टफालेन की सेहत में सुधार नहीं आया। लौरा को उन्होंने लिखा ‘अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद मुझे बेहतर नहीं महसूस हो रहा और—कुर्सी से चिपक कर रह गई हूं। तुम तो जानती हो पैदल चलने में मेरा कोई जोड़ नहीं था इसलिए अपनी ऐसी हालत को कुछ ही महीने पहले तक अपने सम्मान के विपरीत माना होता।’

 

लौट कर लंदन आने पर जेनी की हालत डाक्टर को कुछ बेहतर महसूस हुई और उन्होंने पांच महीने या उससे भी अधिक समय बाद पहली बार पेरिस जाकर पुत्री और नाती-नतिनियों से मिलने की उनकी इच्छा मंजूर कर ली। मार्क्स ने पांच पौंड पुत्री जेनी को भेजा ताकि ‘नकद चुका कर वह बिस्तर, रजाई आदि भाड़े पर ला सके’। उन्होंने कहा कि अगर हम दोनों को तुम्हारे घर आ कर रहना है तो इतना तो जरूरी होगा। इसके साथ ही लिखा ‘शेष धन आएंगे तो चुका देंगे’।

 

26 जुलाई को मार्क्स और उनकी पत्नी, हेलेन देमुथ को साथ लेकर फ़्रांस पहुंचे । फ़्रांस पहुंच कर पेरिस के उपनगर अर्जेंत्यूल तक की यात्रा करनी पड़ी जहां जेनी लांग्वे अपने पति के साथ रह रही थी। मार्क्स तत्काल ही पारिवारिक डाक्टर गुस्ताव दाउर्लेन (?) से मिलना चाहते थे जिन्होंने जेनी फ़ान वेस्टफालेन की देखभाल का आश्वासन दिया था। उन्होंने एंगेल्स को लिखा कि मुलाकात के पहले दिन ही ‘छोटे बच्चों ने ठीक ही अपना दावा’ ‘बुजुर्ग निक’ पर ठोंक दिया है। क्रूर निहितार्थ के साथ मार्क्स के लिए यह नाम परिवार में ‘मूर’ के विकल्प के रूप में चल पड़ा था। खासकर अपने जीवन के आखिरी कुछ सालों में वे अक्सर पुत्रियों, एंगेल्स और पाल लाफ़ार्ग को लिखे पत्रों में इस नाम का उपयोग करते और अपने इस यशस्वी समनाम का आनंद और मजा लेते।[8]

 

फ़्रांस में मार्क्स की वापसी हालांकि नितांत निजी कारणों से हुई थी फिर भी उससे थोड़ी सनसनी फैलनी तय थी। लांग्वे का अनुमान था कि जैसे ही उन्हें इसके बारे में पता चलेगा ‘अराजकतावादी लोग (मार्क्स पर)’ आगामी चुनावों में ‘वोट इधर उधर करने की दुरभि मंशा का आरोप मढ़ (देंगे)’ लेकिन फिर उन्हें अपने मित्र क्लीमेंस्यू से पता चला कि मार्क्स को ‘पुलिस से डरने की कोई जरूरत नहीं है’ । वैसे एलीनोर मार्क्स ने जर्मन सोशल डेमोक्रेटिक प्रेस के पेरिस संवाददाता कार्ल हिर्श (1841-1900) को पहले ही अपने माता पिता के आगमन की सूचना दे दी थी इसलिए ही मार्क्स ने मजाक किया कि उनकी यह उपस्थिति ‘एक खुला रहस्य’ बन कर रह गई।

 

एंगेल्स एक पखवारे तक बर्लिंगटन, यार्कशायर रहे थे और उनके मित्र ने जो बताया उससे प्रसन्न तथा निश्चिंत हुए। उन्होंने सामान्य चिंता के साथ जवाब दिया- ‘मेरे पास कुछ चेक पड़े हुए हैं। इसलिए भी अगर आपको कोई जरूरत हो तो बिना किसी संकोच के बताइए कि लगभग कितना चाहिए। आपकी पत्नी को किसी चीज का अभाव न तो होना चाहिए, न होने दीजिएगा। इसलिए अगर उन्हें कोई चीज पसंद आए या आपको पता हो कि इससे उनको खुशी होगी तो उनके लिए जरूर ले लीजिएगा।’ साथ ही उन्होंने मार्क्स को अपनी जिंदगी के उत्तम आनंद की भी सूचना दी ‘यहां जर्मन बीयर के बिना भी मजा लिया जा सकता है क्योंकि घाट पर जो छोटा सा कैफ़े है उसमें मिलने वाली कड़वी एल भी जबर्दस्त है और जर्मन बीयर की तरह ही उसमें भी तरंग आती है।’

 

समुद्र के दूसरे छोर पर मार्क्स का वक्त इतना बेहतरीन नहीं बीत रहा था। उन्होंने मदद के लिए एंगेल्स को धन्यवाद दिया ‘आपके खजाने से इतनी भारी रकम निकालना मेरे लिए बड़ी लज्जा की बात है, लेकिन पिछले दो सालों से घर चलाने के मामले में अराजकता ने बहुत तकलीफ दी है और उसके चलते तमाम तरह का बकाया बढ़ता जा रहा है। यह हालत काफी समय से मेरे लिए उत्पीड़नकारी बनी हुई है’।[9] इसके बाद उन्होंने पत्नी का हालचाल बताया ‘प्रतिदिन हमें चढ़ाव उतार के उसी अनुभव से गुजरना पड़ रहा है जैसा ईस्टबोर्न में हो रहा था। अंतर केवल इतना आया है कि, जैसे कल हुआ, कभी-कभी दर्द के औचक तथा भयानक दौरे पड़ते हैं’। ऐसे मौकों पर डाक्टर दुर्लेन अफीम देने को तैयार रहते। मार्क्स ने अपना भय जाहिर किया ‘सेहत में अस्थायी “सुधारों” से बीमारी की स्वाभाविक गति में कोई रुकावट नहीं आ रही। लेकिन इनसे मेरी पत्नी को धोखा होता है और मेरी फटकार के बावजूद जेनी (लांग्वे) इस विश्वास पर अड़ी हुई है कि अर्जेंत्यूल में हमारे रुकने की अवधि जितना सम्भव हो उतनी लम्बी होनी चाहिए’।

 

उम्मीद और आशंका के बीच इस तरह लगातार दोलायमान रहना खुद उनकी सेहत के लिए एकदम ठीक नहीं था और उनका आराम हराम होता जा रहा था ‘पिछली रात असल में पहला मौका था जब मुझे ठीक से नींद आई। दिमाग इस कदर निर्जीव और सुस्त हो गया है मानो सिर में मिल की कोई चक्की चल रही हो’। इसीलिए वे अब तक ‘न तो पेरिस जा सके’ और न ही राजधानी के साथियों को बेटी के घर बुलाने के लिए ‘एक लाइन लिख सके’।[10] पहली बार पेरिस शहर के मुख्य भाग में उनका जाना 7 अगस्त को दिन में ही हो सका और जेनी फ़ान वेस्टफालेन को इससे बेहद आनंद आया। मार्क्स तो 1849 के बाद कभी आए ही नहीं थे इसलिए उनको शहर ‘लगातार जारी मेले की तस्वीर’ महसूस हुआ।

 

अर्जेंत्यूल वापस लौटने पर मार्क्स को आशंका हुई कि उनकी पत्नी की सेहत अचानक बिगड़ सकती है इसलिए एंगेल्स को पत्र में बताया कि लंदन लौटने के लिए उन्हें प्रेरित करने की चेष्टा मार्क्स ने की। बहरहाल उनकी मातृसुलभ भावना मजबूत साबित हुई और उन्होंने कहा कि वे अपनी पुत्री जेनी के साथ जब तक सम्भव है रुकना चाहती हैं। इसके लिए उन्होंने पहले ही ‘चालाकी का काम किया—और इतने कपड़े धोने के लिए भेज दिए’ कि वे अब अगले सप्ताह के आरम्भ में ही धुल कर वापस आएंगे।[11] पत्र को खत्म करने से पहले कुछेक पंक्तियों में अपना हाल लिखा ‘विचित्र बात है कि हालांकि रात में बहुत कम सोने को मिलता है और दिन भर चिंता खाए रहती है फिर भी हरेक व्यक्ति कहता रहता है कि मेरी हालत अच्छी है और सचाई भी यही है’।

 

अंत में एक और दर्दनाक घटना के चलते उन्हें आनन फानन में फ़्रांस छोड़ना पड़ा। 16 अगस्त को उन्हें सूचना मिली कि उनकी तीसरी पुत्री एलिनोर गम्भीर रूप से बीमार है। वे तुरंत लंदन के लिए चल पड़े। थोड़े दिन बाद उनकी पत्नी और हेलेन देमुथ भी आ गए। जल्दी ही साफ हो गया कि टूसी (एलिनोर का घर का नाम) घनघोर अवसाद की हालत में है।[12] चिंतित हो कर कि उसने ‘हफ़्तों से सचमुच कुछ भी नहीं खाया’ और ‘पीली तथा क्षीणकाय दीख’ रही है, मार्क्स ने अपनी दूसरी पुत्री जेनी का रुख किया और उसे सूचित किया कि तुम्हारी बहन ‘लगातार अनिद्रा, हाथों की कंपकंपी, चेहरे पर स्नायविक झटकों आदि’ से पीड़ित है और ‘अगर अधिक देरी की गई’ तो ‘उसको गम्भीर खतरा’ हो सकता है।[13] सौभाग्य की बात थी कि इस संकट में सम्बल देने के लिए कुछ ही समय पहले बीते मधुर सप्ताहों की याद थी। कुल के बावजूद अर्जेंत्यूल में ‘तुम्हारे और प्यारे बच्चों के साथ रहने की खुशी ने इतना भरपूर संतोष प्रदान किया है कि उतना अधिक संतोष मुझे शायद ही कहीं और मिला होता’।

 

महज दो दिन बाद अर्जेंत्यूल से खबर आई कि ‘लांग्वे और छोटा हैरी’ दोनों ‘बहुत बीमार’ हैं। मार्क्स ने एंगेल्स को बताया ‘इस समय परिवार में और कुछ नहीं दुर्भाग्य टूट पड़ा है’। दुखों और परेशानियों का कोई पार नहीं सूझ रहा था।

पत्नी का देहांत और फिर से इतिहास का अध्ययन

एलिनोर की देखभाल का काम परेशान करने वाला था और इसमें वे शेष आधी गरमी डूबे रहे । साथ ही जेनी फ़ान वेस्टफालेन की बीमारी भी बढ़ रही थी जो ‘दिन प्रतिदिन अपने अंतिम मुकाम की ओर बढ़ रही थी’। इन दोनों चीजों के चलते मार्क्स परिवार सामाजिक रिश्तों से कटा हुआ था। महीने के आरम्भ में उन्होंने पूर्व अभिनेत्री और सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध उपन्यासों की लेखिका मिन्ना काउत्सकी (1837-1912) को पत्र लिख कर माफ़ी मांगी कि वे उन्हें लंदन में घर नहीं बुला सकते क्योंकि उनकी पत्नी की ‘दुखद और (डर है) घातक बीमारी’ ने ‘बाहरी दुनिया के साथ (उनकी) अंत:क्रिया को रोक दिया है’। मिन्ना के पुत्र काउत्सकी को उन्होंने उसी दिन लिखा कि वे ‘बीमार नर्स’ हो गए हैं।

 

इस दौरान मार्क्स ने गणित का अध्ययन फिर से शुरू किया। पाल लाफ़ार्ग ने बाद में इस विषय के प्रति अपने ससुर के अति विशेष रुख को याद किया : ‘कवियों और उपन्यासकारों को पढ़ने के अलावे मार्क्स का बौद्धिक आराम का एक उल्लेखनीय तरीका, गणित था जिससे उनको खास लगाव था। बीजगणित से भी उनको नैतिक आश्वासन मिलता था और इसमें वे घटनाओं से भरे अपने जीवन के सर्वाधिक तनाव के क्षणों में राहत पाते थे। अपनी पत्नी की अंतिम बीमारी के दौरान वे अपने सामान्य वैज्ञानिक काम करने में परेशानी महसूस करने लगे और पत्नी की तकलीफ़ से पैदा उत्पीड़न को परे करने का एकमात्र रास्ता उन्हें गणित में डूब जाना सूझा। नैतिक पीड़ा के उस दौर में उन्होंने अत्यणुकलन पर एक किताब ही तैयार कर दी।—उच्च गणित में उन्हें द्वंद्वात्मक गति का सबसे तार्किक और उसके साथ ही सरलतम रूप दिखाई पड़ा । उनका विचार था कि विज्ञान तब तक सचमुच विकसित नहीं हो सकता जब तक वह गणित का उपयोग करना सीख नहीं जाता।’

 

अक्टूबर मध्य में मार्क्स की सेहत, जो पारिवारिक घटनाओं का बोझ महसूस कर रही थी, एक बार फिर से गड़बड़ाई जब ब्रोंकाइटिस के चलते फेफड़ों में गम्भीर रूप से पानी भरने लगा। इस समय एलिनोर हर समय पिता के बिस्तर से लगी रही और न्यूमोनिया के खतरे से दूर रखने में उनकी मदद करती रही। सहायता के लिए अर्जेन्त्यूल से बड़ी बहन आना चाहती थी लेकिन उसे रोक दिया।[14]

 

चिंताकुल एंगेल्स ने 25 अक्टूबर को बर्नस्टाइन को लिखा ‘पिछले 12 दिनों से वे ब्रोंकाइटिस और तमाम किस्म की दिक्कतों के चलते बिस्तर पर थे लेकिन आवश्यक सावधानियां बरतने के चलते रविवार के बाद से खतरे से बाहर हैं। आपसे बता सकता हूं कि मुझे बड़ी चिंता हो गई थी’।[15] कुछ दिनों बाद दीर्घकालीन कामरेड जोहान्न बेकर (1809-1886) को भी उन्होंने सूचित किया ‘जीवन के इस दौर में और उनकी आम सेहत को देखते हुए (ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों की सूजन) काम करना कोई हंसी खेल नहीं है। सौभाग्य से बुरे दिन बीत गए हैं और जहां तक मार्क्स का सवाल है सभी तरह के खतरे फिलहाल दूर हो गए हैं हालांकि दिन के अधिकतर समय वे लेटे रहते हैं और बेहद कमजोर हो गए हैं’।

 

नवम्बर अंत में एंगेल्स ने फिर से बर्नस्टाइन को सेहत का ताजा हाल लिखा ‘मार्क्स की हालत अब भी बेहद खराब है। उन्हें कमरे से बाहर निकलने या किसी गम्भीर काम को शुरू करने की इजाजत नहीं है। लेकिन उनका वजन बढ़ रहा है’। इसके बावजूद ‘इस बीच अगर किसी एक बाहरी घटना के चलते उनका दिमाग फिर से कमोबेश दुरुस्त होने की ओर है तो वह है चुनाव’। 27 अक्टूबर 1881 को नई जर्मन संसद के चुनाव में सामाजिक जनवादियों ने तीन लाख से अधिक वोट पाये। यूरोप के लिए यह संख्या विस्मयकारी थी।[16]

 

जेनी फ़ान वेस्टफालेन भी इस नतीजे से बेहद खुश हुईं लेकिन यह उनके जीवन की लगभग आखिरी खुशी थी। आगामी हफ़्तों में उनकी अवस्था भयप्रद होती गई। डाक्टर द्वोर्किन ने कहा कि ‘उनको थोड़ा बदलाव देने के लिए’ एलिनोर और अन्य सहायक ‘उन्हें चादर समेत बिस्तर से उठाएं और कुर्सी पर बिठाएं’ तथा वापस बिस्तर पर लिटा दें। उनको होने वाले भयानक दर्द से थोड़ी राहत देने के लिए उन्हें मार्फीन की सुई लगातर लगाई जा रही थी। एलिनोर ने बाद में याद किया : ‘हमारी मां सामने वाले बड़े कमरे में पड़ी थी, मूर पीछे वाले छोटे कमरे में थे।—वह सुबह मुझे कभी नहीं भूलेगी जब उन्हें इतनी ताकत महसूस हुई कि मां के कमरे में जा सकें। जब दोनों साथ हुए तो जैसे दोनों जवान हो गए। मां प्यारी लड़की में बदल गई, पिता युवा प्रेमी हो गए जो जीवन की दहलीज पर खड़े थे। पिता बीमारी से त्रस्त बूढ़े नहीं रह गए, मां भी मरणासन्न बुढ़िया नहीं रह गईं जिन्हें एक दूसरे से जुदा होना है।’[17]

 

2 दिसम्बर 1881 को जेनी फ़ान वेस्टफालेन लीवर के कैंसर से मर गईं। वे वह औरत थीं जो मार्क्स के साथ खड़ी रही थीं। उनकी तकलीफों और राजनीतिक आवेगों की साझीदार रही थीं। इस नुकसान की भरपाई सम्भव नहीं थी। सिर्फ़ अठारह साल की उम्र में 1836 में जब वे उनके प्यार में पड़े थे उसके बाद पहली बार उन्होंने खुद को अकेला पाया। उनकी ‘सबसे बड़ी निधि’ छिन गई थी। अब वह ‘चेहरा नहीं रह गया (जो उनके) जीवन की सबसे उदात्त और मधुरतम यादों को फिर से जगा सके’।

 

पहले से ही अपनी जर्जर अवस्था को और अधिक खराब होने से बचाने के लिए पत्नी के अंतिम संस्कार में शामिल भी न हो सके। दुखी मन से उन्होंने पुत्री जेनी को लिखा ‘डाक्टर की पाबंदी की बात बोलने का कोई फायदा नहीं’। उनकी पत्नी ने मृत्यु से कुछ ही देर पहले किसी औपचारिकता की अनदेखी पर नर्स से जो कहा था, ‘हम लोग ऐसे दिखावटी नहीं’, उन शब्दों के बारे में सोचने लगे। बहरहाल एंगेल्स ताबूत गाड़ने के क्रियाकर्म में शामिल रहे। उनके बारे में एलिनोर ने कहा था कि ‘उनकी सहृदयता और समर्पण बयान से परे है’। कब्र पर अपने वक्तव्य में उन्होंने याद किया ‘अगर कभी कोई स्त्री रही हो जिसकी सबसे बड़ी खुशी दूसरों को खुश रखने में थी तो वह यही स्त्री थी’।

 

मार्क्स के लिए शारीरिक तकलीफ के चलते इस क्षति का हृदय विदारक कष्ट और बढ़ गया। उनका जो इलाज चल रहा था वह अत्यंत पीड़ादायक था फिर भी उन्होंने थोड़ा उदासीन भाव से उसका सामना किया। अपनी पुत्री जेनी को लिखा : ‘अब भी मुझे छाती, गर्दन आदि पर आयोडीन का लेप लगाना पड़ता है और जब बार-बार ऐसा किया जाता है तो त्वचा थकाऊ और दर्दनाक तरीके से सूज जाती है। यह पूरी कार्यवाही महज इसलिए की जा रही है ताकि आरोग्य लाभ के दौरान बीमारी वापस न लौटे (अब यह सामान्य खांसी से एकदम अलग की चीज हो गई है) और फिलहाल मेरी वास्तविक सेवा कर रही है। मानसिक वेदना का केवल एक प्रभावी प्रतिरोध है और वह है शारीरिक दर्द। किसी भी आदमी की समूची दुनिया लूट लीजिए बस उसे दांत दर्द से छुटकारा दिला दीजिए।’

 

उनकी सेहत इतनी संकटग्रस्त हो गई थी कि उन्होंने एक समय डैनिएल्सन को लिखा कि वे ‘यह बुरी दुनिया छोड़ने के बहुत करीब आ गए थे’। आगे लिखा ‘डाक्टर मुझे फ़्रांस के दक्षिण या अल्जीरिया तक भेजना चाहते’ हैं। एकाधिक हफ़्तों तक उन्हें बिस्तर पर लेटे रहने को मजबूर होना पड़ा। जोर्गे को एक पत्र में लिखा कि ‘घर में कैद रहना पड़ा’ और ‘समय का कुछ हिस्सा (मेरी) सेहत को दुरुस्त रखने की योजनाओं में चला जाता है’।

 

बहरहाल इन सबके बावजूद 1881 के वसंत से लेकर 1882 की सर्दियों के बीच का मार्क्स की बौद्धिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक अध्ययन में बीता। उन्होंने पहली सदी ईसा पूर्व से साल दर साल की समय सारिणी बनानी शुरू की और उसमें प्रमुख घटनाओं को दर्ज करने के साथ उनके कारणों और मुख्य विशेषताओं को संक्षेप में लिखना शुरू किया। यह वही पद्धति थी जिसका इस्तेमाल उन्होंने 1879 के वसंत और 1880 की गर्मियों के बीच में ‘नोट्स आन इंडियन हिस्ट्री (664-1858)’ को तैयार करने में आजमाया था। यह काम उन्होंने राबर्ट सीवेल (1845-1925) की किताब ‘द एनालीटिकल हिस्ट्री आफ़ इंडिया’ के आधार पर किया था। इस बार भी उनका मकसद मनुष्यता के वास्तविक अतीत के परिप्रेक्ष्य में अपने विचारों की गुणवत्ता की परीक्षा करना था। इसमें उन्होंने केवल उत्पादन में होने वाले बदलावों पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि किसी भी आर्थिक निर्धारणवाद के परे आधुनिक राज्य के विकास के बेहद जरूरी सवाल पर गहराई से ध्यान दिया।[18]

 

इन नोटों में कुछ बेहद मामूली स्रोतों का उल्लेख नहीं किया गया है। उनके अलावे दो प्रमुख किताबों का सहारा इस नई अनुक्रमणिका में लिया गया है। इनमें पहली थी इतालवी इतिहासकार कार्लो बोत्ता (1766-1835) की ‘हिस्ट्री आफ़ द पीपुल’स आफ़ इटली’ (1825) जो मूल रूप से तीन खंडों में फ़्रांसिसी भाषा में छपी थी क्योंकि लेखक को 1814 में सेवोयार्द सरकार के उत्पीड़न से बचने के लिए तूरिन छोड़ कर भागना पड़ा था (नेपोलियन बोनापर्त की पराजय के बाद ही वे पीदमांट लौट सके थे)। दूसरी थी फ़्रेडरिक श्लोजेर (1776-1861) की बहुपठित और प्रशंसित ‘वर्ल्ड हिस्ट्री फ़ार द जर्मन पीपुल’। इन दोनों किताबों के आधार पर मार्क्स ने चार नोटबुकें भर डालीं। उन्होंने जर्मन, अंग्रेजी और फ़्रांसिसी में सार लिखे और कभी-कभी संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणियां भी दर्ज कीं।[19]

 

इनमें से पहली नोटबुक में उन्होंने कालानुक्रमिक तरीके से कुल 143 लिखित पृष्ठों में 91 ईसा पूर्व से ले कर 1370 ईसवी तक घटी कुछ प्रमुख घटनाओं की सूची बनाई । प्राचीन रोम से शुरू कर के आगे रोमन साम्राज्य के पतन पर उन्होंने विचार किया, शार्लमान (742-814) के ऐतिहासिक महत्व पर ध्यान दिया, बैजंतिया और इटली के समुद्री गणतंत्रों की भूमिका को उजागर किया, सामंतवाद के विकास, क्रूसेडों (धर्मयुद्धों) तथा बगदाद और मोसुल के खिलाफ़तों का उल्लेख किया। दूसरी नोटबुक के 145 पृष्ठों में 1308 से ले कर 1469 ईसवी तक के कालखंड पर नोट हैं। इसके मुख्य विषय इटली की आर्थिक प्रगति तथा चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों में जर्मनी की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति हैं। तीसरी नोटबुक के 141 पृष्ठों में 1470 से लेकर 1580 ईसवी तक के समय को दर्ज किया गया है। इसमें फ़्रांस और स्पेन के बीच की लड़ाई, जिरोलामो सावोनारोला (1452-1498) के समय के फ़्लोरेंस के गणतंत्र तथा मार्टिन लूथर (1483-1546) के प्रोटेस्टैन्ट सुधार पर विचार किया गया है। आखिरी चौथी नोटबुक के 117 पृष्ठों में यूरोप के 1577 से 1648 ईसवी तक के असंख्य धार्मिक टकरावों को दर्ज किया गया है।

 

बोत्ता और श्लोजेर की किताबों के उद्धरणों से भरी चार नोटबुकों के अलावा मार्क्स ने एक और नोटबुक तैयार की। उसमें अपने समय की घटनाओं को दर्ज किया गया था और उद्धरण भी समकालीनों के थे। जिनो कपोनी (1792-1876) की ‘हिस्ट्री आफ़ द रिपब्लिक आफ़ फ़्लोरेन्स’ (1875) के नोटों में 1135 से 1433 तक का प्रकरण था जबकि 449 से 1485 तक का कालखंड एक नए हिस्से के बतौर तैयार किया गया जिसका आधार जान ग्रीन (1837-1883) की किताब ‘हिस्ट्री आफ़ द इंग्लिश पीपुल’ (1877) थी। सेहत में आने वाले उतार चढ़ाव ने उन्हें इसके बाद का काम करने की इजाजत नहीं दी। उनके नोट पीस आफ़ वेस्टफालिया, जिससे 1648 में तीस साला लड़ाई का अंत हुआ था, के विवरण के साथ समाप्त हो जाते हैं।

 

जब मार्क्स की चिकित्सकीय अवस्था में सुधार आया तो जरूरत थी कि वे ‘वापसी के खतरे’ को दूर रखने की हर सम्भव कोशिश करें। अपनी पुत्री एलिनोर के साथ वे 29 दिसम्बर 1881 को वाइट द्वीप पर, जहां पहले भी एकाध बार वे गए थे और जहां फिर से जाने की सलाह दी जा रही थी वहीं वेंटनोर चले गए। उम्मीद थी कि ‘गर्म जलवायु और शुष्क हवा से उनकी अवस्था में सुधार तेजी से’ पूरा होगा। वहां जाने से पहले उन्होंने जेनी को लिखा ‘मेरी प्यारी बच्ची, इस समय मेरी सबसे बेहतर जो सेवा तुम कर सकती हो वह यह कि हौसला बनाए रखो! मुझे आशा है कि तुम्हारे साथ और भी खुशनुमा दिन गुजार सकूंगा और नाना की जिम्मेदारियों को योग्यतापूर्वक निभाऊंगा’।

 

1882 के पहले दो हफ़्ते उन्होंने वेंटनोर में गुजारे। बिना किसी खास दिक्कत के टहलने के लिए और ‘मौसम की मनमानी पर कम निर्भर रहने के लिए’ उन्हें ‘औचक की जरूरत के लिए’ एक कृत्रिम श्वास नलिका पहननी पड़ती थी जो बहुत कुछ ‘थूथन’ की तरह दिखाई देती थी। इन कठिन परिस्थितियों में भी मार्क्स कभी अपना विडम्बना वाला भाव नहीं भूले और लौरा को लिखा कि ‘जिस उत्साह के साथ जर्मनी में बुर्जुआ अखबारों ने या तो (मेरे) निधन या फिर उसकी आसन्न अनिवार्यता की घोषणा की’ उससे ‘(मुझे) काफी गुदगुदी हुई’।

 

मार्क्स ने एलिनोर के साथ जो दिन गुजारे वे बहुत आसान नहीं थे। अपनी आस्तित्विक समस्याओं में डूबी होने के कारण वह अब भी गहरे अस्थिर थी। सो नहीं पाती थी और डरी रहती थी कि उसका स्नायविक संकट अचानक बढ़ जा सकता है। उनके बीच आपसी लगाव जितना भी मजबूत महसूस होता रहा हो आपस में संवाद बहुत मुश्किल हो गया था। मार्क्स ‘गुस्से और चिंता से भरे’ थे तथा एलिनोर को ‘अप्रिय और असंतुष्ट’ समझते थे।[20]

 

मार्क्स अब भी समकालीन प्रमुख राजनीतिक घटनाओं से बाखबर बने हुए थे। जब जर्मनी के चांसलर संसद में बोलते हुए सरकारी नीति के प्रति जर्मन मजदूरों में मौजूद भारी अविश्वास की उपेक्षा नहीं कर सके तो उन्होंने एंगेल्स को लिखा ‘मैं इसे बड़ी जीत मानता हूं, न केवल जर्मनी के लिए बल्कि उसके बरक्स व्यापक बाहरी दुनिया के लिए कि बिस्मार्क ने राइखस्टाग में माना कि उनके राजकीय समाजवाद के प्रति कुछ हद तक जर्मन मजदूरों ने “नाकामयाबी का इजहार किया” है’।

 

मार्क्स का ब्रोंकाइटिस असाध्य होता जा रहा था। बहरहाल उनकी लंदन वापसी के बाद डाक्टर द्वोर्किन के साथ परिवार के सदस्यों ने विस्तार से उनकी बेहतरी के लिए सर्वाधिक मुफ़ीद मौसम को ले कर सलाह मशविरा किया। पूरी तरह से ठीक होने के लिए गरम इलाके में आराम उचित लग रहा था लेकिन वाइट द्वीप से कोई फायदा हुआ नहीं था। जिब्राल्टर का विकल्प खारिज हो गया क्योंकि उस इलाके में प्रवेश के लिए मार्क्स को पासपोर्ट की जरूरत पड़ती। राज्यविहीन मनुष्य होने के नाते उनके पास पासपोर्ट नहीं था। बिस्मार्की साम्राज्य बर्फ से ढका हुआ था और वैसे भी उनके लिए वह प्रतिबंधित था। इटली का तो सवाल ही नहीं था क्योंकि जैसा एंगेल्स ने बताया ‘शुभेच्छुओं के मन में पहली चिंता यह थी कि पुलिस की ओर से कोई उत्पीड़न नहीं होना चाहिए’।

 

डाक्टर द्वोर्किन और मार्क्स के दामाद पाल लाफ़ार्ग की मदद से एंगेल्स ने मार्क्स को अल्जीयर्स जाने के लिए राजी कर लिया। उस समय अंग्रेजों में उस जगह की प्रतिष्ठा यह थी कि अगर धन हो तो ठंड की दिक्कतों से बचने के लिए वहां जाना सही है। मार्क्स की पुत्री एलिनोर ने बाद में याद किया कि मार्क्स को यह असामान्य यात्रा करने के लिए ‘पूंजी’ को पूरा करने के उनके पुराने सपने ने मजबूर कर दिया।

 

‘उनकी सामान्य अवस्था खराब होती जा रही थी। अगर उनके भीतर थोड़ा अधिक अहं होता तो उन्होंने चीजों को उनकी स्वाभाविक गति से जाने दिया होता। लेकिन उनके लिए एक चीज सब कुछ के ऊपर थी और वह थी लक्ष्य के प्रति समर्पण। वे अपने इस विशाल ग्रंथ को समाप्त करना चाहते थे और इसीलिए सेहत में सुधार हेतु एक और यात्रा करने को राजी हो गए।’

 

9 फ़रवरी को मार्क्स भूमध्य सागर की ओर चले। रास्ते में अर्जेंत्यूल में रुके। यह पेरिस का एक उपनगर था जहां उनकी सबसे बड़ी बेटी जेनी रहती थी। जब उनकी सेहत में सुधार नहीं आया तो मुश्किल से एक हफ़्ते बाद ही अकेले मार्सेलीज जाने का फैसला किया। एलिनोर को समझा दिया कि उसका साथ आना जरूरी नहीं है। एंगेल्स को राज बताया ‘दुनिया में चाहे जो कुछ हो जाए मैं उस लड़की को यह सोचने नहीं दूंगा कि परिवार की बलिवेदी पर एक बूढ़े आदमी की “नर्स” के रूप में उसे अपना जीवन होम करना है’।

 

समूचे फ़्रांस को ट्रेन से पार करने के बाद वे 17 फ़रवरी को प्रोवेन्साल के विशाल बंदरगाह पर पहुंचे। तुरंत उन्होंने अफ़्रीका जाने वाले पहले जहाज का टिकट हासिल किया। दूसरे ही दिन ठंडी तेज हवा में शाम को जहाज पर चढ़ने के लिए बंदरगाह पर अन्य यात्रियों के साथ कतार में लग लिए। उनके पास कुछेक सूटकेस थे जिनमें ठूंस कर भारी कपड़े, किताबें और दवाइयां भरी थीं। 5 बजे शाम को ‘सइद’ नामक स्टीमर अल्जीरिया के लिए चल पड़ा। वहां मार्क्स को 72 दिन ठहरना था। जीवन में केवल एक बार ही यूरोप के बाहर उनको यह समय बिताना था।

संदर्भ

[1] हेनरी हिंडमैन ने बाद में बताया है कि ‘1880 में यह कहना शायद मुश्किल ही था कि अंग्रेज जनता के लिए क्रांति के खतरनाक और उन्मादी वकील के अतिरिक्त किसी और रूप में मार्क्स जाने जाते थे। इंटरनेशनल का उनका संगठन भयावह पेरिस कम्यून का कारण बताया जाता था। उसके नाम से सभ्य और सम्मानित लोग कांपते थे और डर कर बात करते थे’।

[2] मार्क्स के पत्रों में हिंडमैन का संबंधों के खत्म होने से पहले और उसके बाद एकाधिक बार जिक्र आया है। इनसे पता चलता है कि उनके प्रति मार्क्स का रुख हमेशा ही आलोचनात्मक रहा । 11 अप्रैल 1881 को उन्होंने जेनी लांग्वे को लिखा ‘परसों ही—हम पर हिंडमैन और उनकी पत्नी का हमला हुआ । उन दोनों में ही धैर्य बहुत है। मुझे उनकी पत्नी खासा पसंद आईं क्योंकि उनके सोचने और बोलने का तरीका अशिष्ट, विद्रोही और निश्चयी था । लेकिन सबसे मजेदार यह देखना था कि वे अपने आत्मतुष्ट बड़बोले पति के होठों से प्रशंसापूर्वक लगी जा रही थीं’ । अंतिम आपसी लड़ाई के कुछ महीने बाद 15 दिसम्बर 1881 को उन्होंने जोर्गे को लिखा ‘इस आदमी ने मुझे बाहर ले जाने और आसानी से सीखने के नाम पर ढेर सारी शामें लूट लीं’।

 

[3] हेनरी हिंडमैन को कार्ल मार्क्स का 2 जुलाई 1881 का पत्र । इस पत्र के मसौदे को मार्क्स ने अपने कागजों में संभालकर रखा था । हिंडमैन ने मनुष्य के बतौर अपने छिछलेपन और बचकाने स्वभाव का सबूत देते हुए कहा कि उसने ‘दुर्भाग्य से झगड़े के बाद मार्क्स के अधिकतर पत्रों को जला दिया’। जेनी फ़ान वेस्टफालेन को सब कुछ का अनुमान था । उन्होंने 2 जुलाई 1881 को ईस्टबोर्न से अपनी पुत्री लौरा लाफ़ार्ग को लिखा ‘शनिवार को पीली आंखों वाले उस हिंडमैन के सिर पर मुक्का पड़ा है। शायद वह चश्मे के सामने भी इस पत्र को नहीं रख सकेगा हालांकि अपनी कुल कटुता के बावजूद उसे इतना मनोरंजक शब्दों में पिरोया गया है कि क्रोध मुश्किल से प्रकट होता है। मुझे लगता है मूर अपनी रचना से प्रसन्न हैं’।

 

[4] बाद में हिंडमैन ने एंगेल्स से भी सम्पर्क किया। एंगेल्स ने लिखा ‘आपसे निजी रूप से मिलकर मुझे बड़ी खुशी होगी, बस आप मेरे मित्र मार्क्स के साथ मामला सुलटा लीजिए क्योंकि मुझे नजर आ रहा है कि अब तो आप उन्हें उद्धृत भी करने लगे हैं’। मार्क्स ने टिप्पणी की ‘बच्चे को आपने सही सीख दी है। आपके पत्र से उसे गुस्सा आया होगा। मेरे साथ तो वह यह सब इसलिए कर लेता है क्योंकि उसे “बदनामी के डर से” सार्वजनिक रूप से झगड़ा करने की मेरी अक्षमता पर भरोसा है’।

 

[5] एमिली बोतिगेली का कहना है ‘इस झगड़े का कारण व्यक्तिगत या किसी कुंठित लेखक की आकांक्षा से जुड़ा हुआ नहीं था।—यह सैद्धांतिक मामला था जिसमें मार्क्स ने डेमोक्रेटिक फ़ेडरेशन और उनके एक प्रमुख संस्थापक को घोषित किया कि उनका इस पहलकदमी से कोई लेना देना नहीं है’।

 

[6] 1879 के शुरू में मोंटस्टुअर्ट एलफिंस्टन की एक मुलाकात मार्क्स से हुई। अंग्रेज महोदय ने उनसे एक भड़काऊ सवाल पूछा ‘मैंने कहा, मान लीजिए आपकी वाली क्रांति हो जाती है और आपकी वाली गणतांत्रिक सरकार भी बन जाती है। तब भी आपके और हमारे दोस्तों के खास विचारों को साकार करने की राह में काफी लम्बा चलना होगा । उन्होंने जवाब दिया कि निश्चय ही सभी बड़े आंदोलनों की रफ़्तार धीमी होती है। बेहतर चीजों की ओर सिर्फ़ यह एक कदम होगा जैसे 1688 की आपकी क्रांति राह पर एक चरण ही तो थी’।

 

[7] मार्क्स को परिवार और नजदीकी दोस्तों में ‘मूर’ के नाम से पुकारा जाता था । एंगेल्स ने बताया कि ‘उनको कभी मार्क्स या कार्ल भी कह कर नहीं बुलाया जाता था । बस मूर ही कहा जाता वैसे ही जैसे हम सब उनको पुकारने के नाम से बुलाते। असल में जब पुकारने का नाम खत्म हो जाता है तो उसके साथ नजदीकी भी चली जाती है। विश्वविद्यालय के दिनों से ही उनका पुकारने का नाम मूर था और न्यू राइनिशे जाइटुंग में भी उन्हें हमेशा मूर कहा जाता। अगर मैं उनको किसी भी अन्य तरीके से संबोधित करता तो उन्हें लगता कि कुछ गड़बड़ हो गई है जिसे दुरुस्त करने की जरूरत है’। इसी तरह अगस्त बेबेल ने भी बाद में लिखा ‘मार्क्स को हमेशा उनकी पत्नी और पुत्रियां “मूर” कहती थीं मानो उनका कोई और नाम न हो। पुकारने का यह नाम उनको आबनूसी काले बालों और दाढ़ी के कारण मिला था जो उनकी मूछों के विपरीत सफेद हो गए थे’। बर्नस्टाइन को भी याद था ‘मैं विदा बोल कर जाना चाहता था लेकिन एंगेल्स बोले “ना, ना, मेरे साथ मूर के पास चलो”। मैंने पूछा “मूर के पास? ये मूर कौन है?” एंगेल्स ने जवाब दिया “मार्क्स, और कौन” मानो पूछने वाले को जानना चाहिए कि वे किसकी बात कर रहे हैं’।

 

[8] इस नाम से पहली बार उन्होंने ‘पूंजी’ के छपने के साल पत्र पर दस्तखत किया था । मार्क्स के बारे में जो तमाम ओछी बातें बोली गईं उनमें अधिकतर सामी विरोध या नस्लवाद का तड़का है। उनमें सबसे खराब बात में कहा गया कि ‘दुनिया के बारे में उनका नजरिया शैतानी था, उनका अंहकार भी शैतानी था । कभी कभी लगता है वे जानते थे कि वे उसका पापकर्म पूरा कर रहे हैं’ । मार्क्स ने अपना ‘बुजुर्ग’ नाम थोड़ा मजाहिया अंदाज में रखा था । उदाहरण के लिए उन्होंने लौरा लाफ़ार्ग को लिखा ‘मुझे दुख है कि मैं अपनी प्यारी पुतली का जन्मदिन घर पर नहीं मना पाऊंगा लेकिन इस बुजुर्ग का मन तुम्हारे पास लगा हुआ है। तुम तो मेरे दिल में बसे हुए हो’ । लौरा ने जब पुत्र को जन्म दिया तो उन्होंने पाल लाफ़ार्ग को लिखा ‘छोटे बुतरू को मेरी ओर से गले लगाना और कहना कि यह बुजुर्ग अपने दो वारिसों को पाकर खुश है’।

 

[9] हमेशा की तरह उदारता के साथ एंगेल्स ने तत्काल जवाब दिया ‘जहां तक इस तीस पौंड का सवाल है तो इस पर अपने बाल सफेद न कीजिए ।—-बहरहाल अगर और जरूरत हो तो बताइए, चेक की यह रकम बढ़ा दी जाएगी’।

[10] मार्क्स ने उनको जीवन के संकेत कुछ दिन बाद ही दिए ‘लगभग एक पखवारे से मैं यहां पड़ा हुआ हूं। न तो पेरिस और न ही किसी परिचित के पास गया । मेरी पत्नी की हालत ने तो मुझे न यह करने दिया न वह’।

 

[11] मार्क्स ने यही बात लौरा को लंदन में लिखी ‘बढ़ती कमजोरी के कारण मां की हालत गम्भीर है। इसलिए मेरा इरादा था (क्योंकि हम इस बार आराम से ही यात्रा कर सकेंगे) कि हफ़्ते के अंत तक किसी भी हाल में निकल चला जाए और बीमार को भी यह बता दिया था। बहरहाल कल धोने के लिए कपड़े भेजकर उन्होंने मेरी योजना पर पानी फेर दिया’।

[12] एलिनोर की जीवनी लेखिका योने काप का कहना है कि एलिनोर की ‘समस्या दोहरी और विकट थी’। वह लिसागरी के साथ अपना गोपनीय संबंध तोड़ना चाहती थी जिन्हें परिवार ने कभी स्वीकार नहीं किया और उसी समय ‘नाटकों के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाना चाहती थी’।

 

[13] एंगेल्स को उन्होंने लिखा कि डाक्टर डोंकिन को ‘अचरज है—कि इस तरह का झमेला पहले क्यों नहीं हुआ’।

[14] ‘तुम्हें बच्चों को नहीं छोड़ना चाहिए। यह सीधे पागलपन होगा और पापा को तुम्हारे मौजूद होने से जितनी खुशी या आराम होगा उससे अधिक चिंता होगी। वैसे हम सब चाहते तो हैं कि तुम यहां रहो’।

 

[15] मार्क्स ने खुद बेकर को दिसम्बर में लिखा ‘फेफड़ों की सूजन के साथ मिलकर ब्रोंकाइटिस ने मुझे ऐसा जकड़ा कि एक समय बहुत दिनों तक डाक्टरों को इससे मेरे पार पाने में संदेह रहा’।

 

[16] एंगेल्स भी खुश थे ‘सर्वहारा ने कभी अपने आपको इतने शानदार तरीके से प्रकट नहीं किया था। इंग्लैंड में 1848 की पराजय के बाद उदासीनता का आलम छा गया था और आखिरकार बुर्जुआ शोषण के समक्ष इस प्रावधान के साथ कि ट्रेड यूनियनें ऊंचे वेतन के लिए व्यक्तिगत लड़ाई लड़ेंगी, समर्पण कर दिया गया था’।

 

[17] मार्क्स ने बाद में डैनिएल्सन को लिखा कि कितनी बुरी बात थी कि ‘पत्नी के जीवन के आखिरी छह हफ़्तों में से तीन हफ़्तों के दौरान’ वे उन्हें देख भी नहीं सके थे’ हालांकि वे ‘एक दूसरे से सटे हुए कमरों में ही थे’ ।

 

[18] माइकेल क्राट्के का कहना है कि मार्क्स इस प्रक्रिया को ‘व्यापार, कृषि, खनन उद्योग, टैक्स प्रणाली और अधिसंरचना की समग्र विकास प्रक्रिया’ के बतौर समझते थे। उनके अनुसार मार्क्स ने ये नोट इस दीर्घकालीन यकीन के साथ एकत्र किये कि ‘राजनीतिक दर्शन की जगह वे समाजवादी आंदोलन के लिए ठोस सामाजिक-वैज्ञानिक बुनियाद तैयार कर रहे हैं’।

 

[19] मार्क्स की चिट्ठी पत्री में इस अध्ययन का कोई उल्लेख नहीं मिलता इसलिए इनकी तिथि निश्चित करना बेहद मुश्किल है। समग्र लेखन के संपादकों ने अस्थायी रूप से इन उद्धरणों को ‘1881 के उत्तरार्ध से 1882 के उत्तरार्ध तक’ का माना है जबकि मैक्समिलियन रूबल के मुताबिक ‘बिना शक’ वे 1881 के उत्तरार्ध के बाद के हैं। पहली परिकल्पना कुछ ज्यादा ही सामान्य है जबकि दूसरी वाली सही नहीं लगती क्योंकि मार्क्स ने अधिकतर काम 1881 में किया लेकिन ज्यादा सम्भावना है कि इस काम को वे 1882 तक भी खींच ले गये थे। इसे हम पांडुलिपियों को भिन्न किस्म से रेखांकित किये जाने के सहारे समझ सकते हैं और 23 दिसम्बर 1882 को अपनी पुत्री एलिनोर को लिखे उनके पत्र से भी। इसलिए कहा जा सकता है कि ये नोटबुकें उनके जीवन के आखिरी अठारह महीनों में उनकी बौद्धिक गतिविधि के दो दौरों से जुड़ी हुई हैं जब वे लंदन और वाइट द्वीप के बीच आते जाते रहे थे अर्थात 1881 के पतझड़ से 9 फ़रवरी 1882 तक और अक्टूबर 1882 के आरम्भ से 12 जनवरी 1883 तक । एक बात तय है कि इस ऐतिहासिक कालानुक्रम पर वे 1882 के आठ महीनों में काम नहीं कर सके थे जब वे फ़्रांस, अल्जीरिया और स्विट्ज़रलैंड में थे।

 

[20] 4 जनवरी 1882 को मार्क्स ने लौरा को लिखा ‘मेरी संगिनी कुछ भी नहीं खा रही हैं, स्नायविक तनाव से बुरी तरह परेशान हैं तथा दिन भर पढ़ती-लिखती रहती हैं।—लगता है वे मेरे साथ केवल आत्मोत्सर्ग करने वाले शहीद की तरह कर्तव्य भावना से जीवित बची हुई हैं’।

 

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Janchowk

बच्चे पालने के सवाल पर स्त्री और पुरुष के बीच पैदा हुआ पहला श्रम विभाजन

मानव विज्ञान में खुद को लगा देने का उनका संकल्प महज किसी बौद्धिक उत्सुकता का परिणाम नहीं था । इसका गहरा राजनीतिक-सैद्धांतिक मकसद था । गहन ऐतिहासिक ज्ञान के आधार पर वे वास्तविकता के सबसे करीब के उस क्रम को रचना चाहते थे जिस क्रम में उत्पादन की विभिन्न पद्धतियां इतिहास में एक के बाद एक आती रही हैं। उन्हें विश्वास था कि उनके इस शोध से सम्भावित कम्युनिस्ट सामाजिक रूपांतरण संबंधी सिद्धांत को मजबूत ऐतिहासिक आधार मिल जाएगा।

इसलिए ‘एथनोलाजिकल नोटबुक्स’ में मार्क्स ने प्रागैतिहास के बारे में, पारिवारिक बंधनों के विकास के बारे में, स्त्रियों की स्थिति के बारे में, संपत्ति संबंधों की उत्पत्ति के बारे में, प्राक-पूंजीवादी समाजों के सामुदायिक आचरण के बारे में, राजसत्ता के गठन और उसकी प्रकृति के बारे में, व्यक्ति की भूमिका के बारे में तथा कुछ मानवशास्त्रीय सिद्धांतों के नस्ली निहितार्थों और उपनिवेशवाद के असर जैसे आधुनिक मसलों के बारे में मजेदार टिप्पणियों और उद्धरणों को एकत्र किया।

प्रागैतिहास और पारिवारिक बंधनों के विकास के खास सवाल पर मार्क्स ने मोर्गन की किताब से अनेक बहुमूल्य निष्कर्ष निकाले। हिंडमैन ने याद किया ‘मार्क्स को जब लेविस एच मोर्गन ने अपनी किताब “एनशिएन्ट सोसाइटी” के जरिए संतोषजनक तौर पर साबित कर दिया कि पुरानी कबीलाई व्यवस्था और प्राचीन समाज में सामाजिक इकाई परिवार नहीं, वंश था तो मार्क्स ने तत्काल अपनी पुरानी मान्यताओं को तिलांजलि दे दी ।’

आदिम लोगों की सामाजिक संरचना संबंधी मोर्गन के शोध के चलते ही मार्क्स गोत्र संबंधी जर्मन इतिहासकार बार्थोल्ड नीबूहर (1786-1831) की ‘रोमन इतिहास’ (1811-12) में प्रस्तुत व्याख्या समेत तमाम पारम्परिक व्याख्याओं पर विजय पाने में कामयाब हुए । पहले की सारी परिकल्पनाओं के विपरीत मोर्गन ने दिखाया कि वंश को ‘एकनिष्ठ विवाह आधारित परिवार के बाद उत्पन्न’ और ‘परिवारों के एक समूह’ का नतीजा मानना भारी गलती रही है ।

प्रागैतिहास और प्राचीन समाज के अपने अध्ययन से उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि पितृसत्तात्मक परिवार को समाज की मूलभूत बुनियादी इकाई के रूप में नहीं देखना चाहिए बल्कि उसे सामाजिक संगठन का ऐसा रूप मानना चाहिए जो आम विश्वास के मुकाबले अधिक अर्वाचीन है । यह संगठन ‘जीवन की कठिनाइयों का अकेले मुकाबला करने के लिहाज से बहुत कमजोर’ है । इसके मुकाबले अमेरिका के मूलवासियों में प्रचलित सिंदियास्मिक किस्म के परिवार की मौजूदगी मानना अधिक विश्वसनीय होगा ।

दूसरी ओर मार्क्स ने लगातार मेन से विवाद किया जिन्होंने ‘लेक्चर्स आन अर्ली हिस्ट्री आफ़ इंस्टीच्यूशंस’ में कहा कि ‘निजी परिवार’ ही ‘वह आधार है जिस पर कुल और गोत्र का विकास होता है’ । विक्टोरियाई युग को प्रागैतिहास में ले जाकर इतिहास के तीर को उलट देने की इस कोशिश से मार्क्स की चिढ़ इतनी गहरी थी कि वे कहने को मजबूर हुए कि यह ‘बंददिमाग अंग्रेज वंश से नहीं बल्कि पितृसत्ता से शुरू करता है जो बाद में मुखिया बना- क्या बेवकूफी है !’ उनका उपहास भाव धीरे धीरे चरम पर पहुंच जाता है ‘कुल के बावजूद मेन के दिमाग से अंग्रेज निजी परिवार बाहर नहीं निकल सकता ।’ वे ‘रोमन “पितृसत्तात्मक” परिवार को चीजों की शुरुआत में ढोकर ले जाते हैं ।’ मार्क्स ने फीयर को भी नहीं बख्शा और उनके बारे में कहा ‘यह गधा सब कुछ का आधार निजी परिवार को बना देता है ।’

परिवार संबंधी धारणा पर मोर्गन की टिप्पणियों के चलते मार्क्स को कुछ और भी सोचने का मौका मिला क्योंकि ‘फ़ेमिली’ (परिवार) शब्द के ‘मूल अर्थ’ का, जो फ़ेमुलस या नौकर शब्द से जुड़ा हुआ है, ‘कोई संबंध विवाहित जोड़े या उनके बच्चों से नहीं है, बल्कि उन गुलामों और सेवकों के समूह से है जो उनके हित में श्रम करते थे और वे परिवार के बुजुर्ग पुरुष मुखिया की मातहती में होते थे ।’ इस पर मार्क्स ने टीप लिखी:

‘आधुनिक परिवार में न केवल गुलामी के बल्कि भूदासता के बीज भी मौजूद होते हैं क्योंकि इसमें शुरू से ही कृषि सेवाओं से जुड़ाव रहा है । इसमें लघुरूप में उन सभी शत्रुताओं के बीज मौजूद रहते हैं जो बाद में समाज और उसके राज्य में व्यापक तौर पर विकसित होते हैं ।—परिवार के अन्य रूपों से अपना अलग अस्तित्व बनाए रखने के लिए एकनिष्ठ परिवार को ऐसे घरेलू वर्ग की जरूरत थी जो सर्वत्र सीधे गुलाम हुआ करते थे ।’

पूरक के बतौर अपने विचारों को विकसित करते हुए मार्क्स ने अलग से लिखा कि ‘घर, जमीन और रेवड़ में संपत्ति’ निश्चित रूप से ‘एकनिष्ठ परिवार’ के साथ जुड़ी हुई है । असल में जैसा ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ में लिखा है यही इतिहास का आरम्भ था अगर वह ‘वर्ग संघर्ष का इतिहास’ है ।

‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ (1884) में एंगेल्स ने ‘एथनोलाजिकल नोटबुक्स’ के मार्क्स के विश्लेषण को पूरा किया । इस किताब को लेखक ने ‘अभिलाषा की पूर्ति’ कहा है और ‘जो काम पूरा करना’ उनके ‘दिवंगत मित्र’ को न बदा था उसका ‘एक तुच्छ विकल्प’ मात्र माना है । उनका कहना है कि

‘किसी एक सेक्स द्वारा दूसरे सेक्स को पराधीन बनाना सेक्सों के बीच ऐसे टकराव की घोषणा है जो अब तक के समूचे इतिहास में देखा नहीं गया । 1846 में मैंने और मार्क्स ने मिलकर जो काम किया था उसकी अप्रकाशित पुरानी पांडुलिपि में यह लिखा मिला- “पहला श्रम विभाजन बच्चे पालने के सवाल पर स्त्री और पुरुष के बीच पैदा हुआ” । और इसमें आज जोड़ सकता हूं कि इतिहास में जो पहला वर्ग विरोध प्रकट होता है वह एकनिष्ठ विवाह में पुरुष और स्त्री के बीच के विरोध के विकास का अनुवर्ती होता है और पहला वर्ग उत्पीड़न भी पुरुष द्वारा स्त्री का होता है । एकनिष्ठ विवाह सभ्य समाज का वह कोशिकीय रूप (है) जिसमें हम उन विरोधों और अंतर्विरोधों का अध्ययन कर सकते हैं जो बाद में पूरी तरह विकसित हुए ।’

मार्क्स ने भी पुरुष और स्त्री की समता संबंधी मोर्गन की बातों पर गहराई से ध्यान दिया । मोर्गन का कहना था कि यूनानी सभ्यता से पहले के प्राचीन समाजों में स्त्रियों के साथ बरताव और आचरण के मामले में अधिक प्रगतिशीलता थी । मार्क्स ने मोर्गन की किताब के कुछ ऐसे अंशों की नकल तैयार की जिनसे पता चलता था कि कैसे ग्रीक लोगों में ‘वंश परम्परा को स्त्री के सिरे से देखने की जगह पुरुष के सिरे से देखने का नया चलन शुरू होने के कारण पत्नी और स्त्री की हैसियत और अधिकारों को नुकसान पहुंचा’ । मोर्गन ने ग्रीस की सामाजिक व्यवस्था के बारे में बड़ी नकारात्मक राय जाहिर की ।

‘ग्रीक लोग अपनी सभ्यता के उत्कर्ष के समय भी औरतों के साथ बरताव के मामले में बर्बर बने रहे; उनकी शिक्षा अत्यंत सतही थी,—उनकी हीनावस्था को उनके दिल में सिद्धांत की तरह बिठाया गया और आखिरकार औरतों ने खुद इस बात को तथ्य की तरह स्वीकार कर लिया’ । इसके अतिरिक्त भी ‘पुरुषों के भीतर सोचा समझा स्वार्थी सिद्धांत पाया जाता है जिसके चलते वे स्त्रियों के गुणों को कम करके आंकते हैं । यह बात बर्बर लोगों में मुश्किल से मिलती है’ । सभ्य समाज के विपरीत पुराने समय के मिथकों के बारे में सोचते हुए मार्क्स ने बहुत तीक्ष्ण सर्वेक्षण दर्ज किया है ‘ओलिम्पस में देवियों की स्थिति से औरतों की हैसियत का पता चलता है । वे अधिक आजाद और अधिक प्रभावी थीं । जुनो नामक देवी को सत्ता की लालच थी, ज्ञान की देवी ज़ीयस के कपाल से उत्पन्न हुईं आदि’ ।

(यह अंश मार्चेलो मुस्तो लिखित ‘लास्ट मार्क्स’ के हिंदी अनुवाद ‘मार्क्स के आखिरी दिन’ से लिया गया है । गोपाल प्रधान का यह अनुवाद आकार बुक्स से छपा है। इसके लिए aakarbooks@gmail.com या 9899216313 पर भी सम्पर्क कर सकते हैं । डाक का पता है ; आकार बुक्स, 28 ई, पाकेट IV, मयूर विहार फ़ेस 1,दिल्ली-110091.)

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समकालीन जनमत, Samkaleen Janmat

( अपने जीवन के आखिरी सालों में मार्क्स ने अपना शोध नये क्षेत्रों में विस्तारित किया- ताजातरीन मानव शास्त्रीय खोजों का अध्ययन किया, पूंजीवाद से पहले के समाजों में स्वामित्व के सामुदायिक रूपों का विश्लेषण किया, रूस के क्रांतिकारी आंदोलन का समर्थन किया तथा भारत, आयरलैंड, अल्जीरिया और मिस्र के औपनिवेशिक शोषण की आलोचना की । 1881 से 1883 के बीच वे यूरोप से बाहर पहली और आखिरी यात्रा पर भी गये। उनके जीवन के इन अंतिम दिनों पर केंद्रित मार्चेलो मुस्तो की किताब ‘द लॉस्ट एयर ऑफ कार्ल मार्क्स : एन इंटेलेक्चुएल बायोग्राफी ‘ में दो गलत धारणाओं का खंडन हुआ है- कि मार्क्स ने अंतिम दिनों में लिखना बंद कर दिया था और कि वे यूरोप केंद्रित ऐसे आर्थिक चिंतक थे जो वर्ग संघर्ष के अतिरिक्त किसी अन्य चीज पर ध्यान नहीं देते थे। इस किताब के जरिए मार्चेलो मुस्तो ने मार्क्स के इस दौर के काम की नयी प्रासंगिकता खोजी है और अंग्रेजी में अनुपलब्ध उनकी अप्रकाशित या उपेक्षित रचनाओं को उजागर किया है ताकि पाठक यूरोपीय उपनिवेशवाद की मार्क्सी आलोचना को, पश्चिमेतर समाज के बारे में उनके विचारों को और गैर पूंजीवादी देशों में क्रांति की सम्भावना संबंधी सिद्धांतों को समझें । अंतिम दिनों की उनकी पांडुलिपियों, नोटबुकों और पत्रों के जरिए मार्क्स की ऐसी तस्वीर उभरती है जो उनके समकालीन आलोचकों और अनुयायियों द्वारा प्रस्तुत छवि से अलग है । इस समय मार्क्स की लोकप्रियता बढ़ी है इसलिए उनके जीवन और उनकी धारणाओं के मामले में कुछ नयी बातें इसमें हैं। अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में हिंदी के प्राध्यापक और आलोचक गोपाल प्रधान ने मार्चेलो मुस्तो की इस किताब का हिंदी अनुवाद कर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। यह पुस्तक आकार बुक्स से छपकर आयी है। समकालीन जनमत के पाठकों के लिए प्रस्तुत है पुस्तक का एक अंश)

रोटी और गुलाब
अक्टूबर 1879 में फ़ेडरेशन आफ़ द सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी आफ़ फ़्रांस की पहली राष्ट्रीय कांग्रेस मार्सेलीज में संपन्न हुई । इसका जन्म एक साल पहले ही फ़्रांसिसी समाजवाद की विभिन्न धाराओं के एक साथ मिलने से हुआ था । पार्टी में बहुमत हासिल करने के बाद जूल्स गुदे ने ऐसा राजनीतिक कार्यक्रम बनाना शुरू किया जिसका इस्तेमाल चुनाव में भी किया जा सके । पाल लाफ़ार्ग के जरिए उन्होंने मार्क्स से इस जरूरी काम को पूरा करने में मदद करने का अनुरोध किया और तीनों की मुलाकात मई 1880 में लंदन में हुई । लिखे जाने के तुरंत बाद यह कार्यक्रम कई फ़्रांसिसी अखबारों में छपा । इसका सबसे प्रामाणिक रूप 30 जून 1880 को जूल्स गुदे द्वारा स्थापित ल’इगालिते नामक अखबार में छपा । उसी साल नवंबर में संपन्न ल हाव्रे कांग्रेस में यह पारित भी हो गया ।

अगले साल एंगेल्स ने एडुआर्ड बर्नस्टाइन को लिखे एक पत्र में इसके लेखन की पृष्ठभूमि को उजागर किया । कार्यक्रम की ‘प्रस्तावना’

“मार्क्स द्वारा मेरे कमरे में लाफ़ार्ग और मेरी मौजूदगी में (गुदे को) लिखवाई गई: मजदूर मुक्त तभी हो सकता है जब वह काम के औजारों का मालिक हो- चाहे वह व्यक्तिगत हो या सामूहिक- आर्थिक बदलावों के चलते मालिकाने का व्यक्तिगत रूप लगातार कम होता जा रहा है इसलिए सामुदायिक आदि ही मालिकाना शेष रहता है । ठोस तर्क के साकार रूप में जनता को सारी बातें संक्षेप में समझा दी गई थीं । ऐसी कोई चीज मैंने शायद ही कभी देखी थी और इस संक्षिप्त रूप में भी वह अद्भुत दस्तावेज था ।”

एंगेल्स ने आगे बताया है कि कुछ ही समय बाद ‘कार्यक्रम के बाकी हिस्से’ पर बात हुई, गुदे के मसौदे में कुछेक बदलाव किए गए, ‘कुछ जोड़ा और कुछ हटाया’ । मार्क्स मजबूती के साथ आर्थिक मामलों के तीसरे विंदु (न्यूनतम मजदूरी के बारे में बेवकूफी) को हटाने की वकालत करते रहे लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला । नवम्बर 1880 में मार्क्स की सबसे बड़ी बेटी जेनी लांग्वे ने अपने पति को लिखे पत्र में अपने पिता और गुदे के बीच की इस बहस का जिक्र किया:

“जहां तक न्यूनतम वेतन के निर्धारण का सवाल है तो तुम्हें यह जानकर मजा आएगा कि पापा ने गुदे से उसे कार्यक्रम से हटवाने के लिए सब कुछ किया, समझाया कि अगर इस बात को अपना लिया जाए तो आर्थिक नियमों के मुताबिक इस तयशुदा न्यूनतम का नतीजा उसके अधिकतम होने में निकलेगा । लेकिन गुदे माने नहीं और कहा कि अगर और कुछ नहीं तो इस मांग से मजदूर वर्ग उनकी पकड़ में रहेगा” ।

आखिरकार मार्क्स ने खुद इस मामले को फ़्रेडरिक जोर्गे को लिखी एक चिट्ठी में उठाया:

‘कानून द्वारा न्यूनतम मजदूरी तय करने जैसी कुछेक बेवकूफियों के अपवाद के अतिरिक्त, जिसे गुदे हमारे विरोध के बावजूद फ़्रांसिसी मजदूरों को प्रदान करना सही समझ रहे थे (मैंने उनसे कहा कि अगर फ़्रांसिसी मजदूर वर्ग इतना बचकाना है कि उसे इस तरह के प्रलोभनों की जरूरत है तो बेहतर है कि कोई कार्यक्रम ही न दिया जाए), इस दस्तावेज के आर्थिक अनुभाग में (कम्युनिस्ट लक्ष्य को कुछेक पंक्तियों में आरम्भ में परिभाषित करने के अलावे) केवल उन्हीं मांगों को शामिल किया गया है जो मजदूर आंदोलन से स्वत:स्फूर्त तौर पर पैदा हुई हैं । फ़्रांसिसी मजदूरों को उनके शाब्दिक घटाटोप से उतारकर जमीन पर ले आना सचमुच बड़ी भारी प्रगति है और इसीलिए इसका विरोध उन सभी बौद्धिक जालसाजों से अपेक्षित है जो ‘बादल एकत्र’ करने के व्यवसाय से जीविका चलाते हैं ।’[1]

700 से कुछ अधिक शब्दों में यह कार्यक्रम मजदूर वर्ग की प्राथमिक मांगों को पेश करता है । इसकी शुरुआत इस मान्यता से होती है कि मजूरी श्रम पर आधारित उत्पादन व्यवस्था में सर्वहारा कभी मुक्त नहीं हो सकता, और कि उनकी मुक्ति उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व हासिल करने से ही होगी । इसके बाद इसमें घोषणा है कि मजदूर वर्ग को किसी भी तरह के भेदभाव- खासकर लिंग या नस्ल से जुड़े भेदभाव- के विरोध में सक्रिय संघर्ष करना होगा और पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की अधीनता को समाप्त करने की मांग उठानी होगी ।

मजदूरों को विकेंद्रित शक्तियों वाली भागीदारी आधारित सरकार का समर्थन करना चाहिए । उन्हें सरकारी कर्जों की मंसूखी और धार्मिक आयाम से विरहित राज्य के लिए लड़ना चाहिए । उन्हें सार्वजनिक खर्च पर सबके लिए शिक्षा के अधिकार को अपनाना चाहिए, सार्वजनिक संपत्ति के निजीकरण का विरोध करना चाहिए और साझा स्वामित्व के सिद्धांत को बुलंद करना चाहिए । इसके साथ ही उन्हें कारखानों का स्व प्रबंधन हासिल करने के लिए गोलबंद होना चाहिए और किसी भी रूप में राजकीय समाजवाद का विरोध करना चाहिए ।

इन लक्ष्यों को साकार करने के लिए जरूरी है कि मजदूर ऐसी स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी के जरिए राजनीतिक रूप से संगठित हों जो अन्य लोकतांत्रिक पार्टियों के साथ होड़ करे और बुर्जुआ पार्टियों के विरुद्ध संघर्ष करे ।

समाजवादी मजदूरों का चुनावी कार्यक्रम

जूल्स गुदे, पाल लाफ़ार्ग, कार्ल मार्क्स

प्रस्तावना

मानकर

कि उत्पादक वर्ग की मुक्ति लिंग या नस्ल आधारित भेदभाव के बिना सभी मनुष्यों की मुक्ति है;

कि उत्पादक केवल तभी मुक्त हो सकते हैं जब उत्पादन के साधन उनके कब्जे में हों;

कि केवल दो रूप हैं जिनके तहत उत्पादन के साधन उनके हो सकते हैं

1 व्यक्तिगत रूप जो आम तौर पर कभी नहीं रहा और औद्योगिक प्रगति के साथ अधिकाधिक समाप्त हो चला है;

2 सामूहिक रूप जिसके भौतिक और बौद्धिक तत्व पूंजीवादी विकास से ही उत्पन्न हो चुके हैं;

मानकर

कि यह सामूहिक अधिग्रहण स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी में संगठित सर्वहारा या मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी कार्यवाही से ही सम्भव है;

कि ऐसे संगठन का निर्माण सर्वहारा के पास उपलब्ध सभी संसाधनों के सहारे करना ही होगा । इन संसाधनों में सार्वभौमिक मताधिकार भी शामिल है जिसे इस प्रकार अब तक धोखे के साधन की भूमिका निभाने वाले उपकरण से बदलकर मुक्ति का उपकरण बना दिया जाएगा;

फ़्रांसिसी समाजवादी मजदूरों ने अपनी कोशिशों का लक्ष्य पूंजीपति वर्ग का आर्थिक और राजनीतिक अपहरण तथा उत्पादन के सभी साधनों को समुदाय को लौटा देना मानते हुए तय किया है कि संगठन और संघर्ष के उपाय के बतौर चुनाव में निम्नांकित तात्कालिक मांगों के साथ उतरा जाए:

(क) राजनीतिक मांग

प्रेस, सभा और संगठन संबंधी सभी कानूनों और सबसे आगे बढ़कर इंटरनेशनल वर्किंग मेन’स एसोसिएशन के विरोध में बने कानून का उन्मूलन । मजदूर वर्ग पर लीव्रे[2] नामक प्रशासनिक नियंत्रण और मालिक के मुकाबले मजदूर की तथा पुरुष के मुकाबले स्त्री की अधीनता स्थापित करने वाली सभी संहिताओं का खात्मा;

1 धार्मिक संस्थाओं के बजट का खात्मा और ‘असंक्राम्य कही जाने वाली चल और अचल वस्तुओं’ (2 अप्रैल 1871 के कम्यून द्वारा अधिसूचित) समेत कारपोरेशनों की समस्त औद्योगिक तथा वाणिज्यिक संपत्ति को जब्त कर राष्ट्र को लौटाना;

2 सार्वजनिक कर्ज की मंसूखी;

3 स्थायी सेना और जनता के आम सैन्यीकरण का खात्मा;

4 प्रशासन और पुलिस पर कम्यून का नियंत्रण

(ख) आर्थिक मांग

1 हफ़्ते में एक दिन आराम या सात दिनों में छह दिन से अधिक काम कराने पर कानूनी प्रतिबंध । बालिगों के लिए काम की अवधि घटाकर कानूनी रूप से आठ घंटे करना । चौदह बरस से कम उम्र के बच्चों से निजी कारखानों में काम कराने की मनाही, चौदह से सोलह बरस के बच्चों के लिए काम की अवधि आठ से घटाकर छह घंटे करना;[3]

2 मजदूर संगठनों द्वारा प्रशिक्षु कामगारों की सुरक्षा का निरीक्षण;

3 मजदूरों के एक सांख्यिकी आयोग द्वारा भोजन की स्थानीय कीमत के अनुरूप प्रत्येक वर्ष निर्धारित न्यूनतम वेतन का भुगतान;

4 फ़्रांसिसी मजदूरों को देय वेतन से कम वेतन पर विदेशी मजदूरों को नियुक्त करने पर कानूनी प्रतिबंध;

5 स्त्री और पुरुष कामगारों को समान काम का समान वेतन;

6 सभी बच्चों को वैज्ञानिक और व्यावहारिक शिक्षा, समाज की ओर से राज्य और कम्यून पर इनके भरण पोषण की जिम्मेदारी;

7 समाज पर वृद्ध और अशक्त लोगों की जिम्मेदारी;

8 मजदूरों की सहकारिता सोसाइटियों और भविष्य निधि सोसाइटियों के प्रशासन में मालिकों के समस्त हस्तक्षेप पर रोक और इन्हें एकमात्र मजदूरों के नियंत्रण में वापस लाया जाए;[4]

9 दुर्घटनाओं के मामलों में नियोक्ता की जिम्मेदारी, जिसके लिए मजदूरों की सुरक्षा के कोश में नियोक्ता की ओर से जमा सिक्योरिटी की गारंटी हो; यह कोश कामगारों की संख्या और संबंधित उद्योग में खतरे की सम्भावना के अनुपात में होगा;

10 विभिन्न कारखानों की विशेष नियमावली बनाने में मजदूरों का हस्तक्षेप होगा; अर्थदंड या मजदूरी के भुगतान पर रोक की शक्ल में मजदूरों को सजा देने का मालिकों का अधिकार खत्म किया जाए (27 अप्रैल 1871 की कम्यून की अधिसूचना);

11 (बैंक, रेल, खान आदि) सार्वजनिक संपत्ति के निजी अधिग्रहण संबंधी समस्त समझौतों का खात्मा, सभी सरकारी कारखानों का संचालन वहां काम करने वाले मजदूरों को सौंपा जाए;

12 सभी परोक्ष करों का उन्मूलन और सभी प्रत्यक्ष करों को तीन हजार फ़्रांक से अधिक आमदनी पर प्रगतिशील आयकर में बदल दिया जाए । सीधे वारिसान के अतिरिक्त किसी और को विरासत सौंपने तथा बीस हजार फ़्रांक से अधिक की समस्त सीधी विरासत पर पाबंदी ।

[1] फ़्रेडरिक जोर्गे को मार्क्स ने 5 नवम्बर 1880 को बताया कि बेवकूफियों में वे सबसे अधिक विरासत के उन्मूलन के बारे में शंकाकुल थे । यह हेनरी द सेंट साइमन (1760-1825) का पुराना प्रस्ताव था जिस पर प्रथम इंटरनेशनल के समय ही मिखाइल बाकुनिन के साथ उनका वाद विवाद हुआ था । मार्क्स के मुताबिक ‘अगर मजदूर वर्ग विरासत का उन्मूलन करने में सक्षम होने की ताकत जुटा लेता है तो वह इतना तकतवर भी होगा कि संपत्तिहरण कर ले । यह अधिक आसान और प्रभावी प्रक्रिया होगी’ ।

[2] लीव्रे एक प्रमाणपत्र होता था जिसमें लिखा होता था कि इस मजदूर पर पुराने नियोक्ता का कोई कर्ज या देनदारी नहीं है । इसके प्रस्तुत किए बिना किसी को काम पर नहीं रखा जाता था । 1890 में जाकर इस प्रथा का खात्मा हुआ ।

[3] इन मांगों को 19वीं सदी के संदर्भ में देखना होगा ।

[4] इन मांगों को उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के संदर्भ में देखना होगा ।

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Communisto Ne Paida Kiye Hain Critics

शाडशा सिंठेर्टट क्या ।।८’।।

ह्नदृनिस्ट च्चीणादृहंम्ल ने रूही दुनिया मं खुब क्रिटित्रभ पेदा क्रिय. माव्रसं आइडिया आँफ क्रन्धुनिज्य ने कंइं नया क्याडिथानदीस्वायाबद्गन्जाहधवे युश्ली व्रप्लाफ्ला ण डी क्या ।कमी जादो क तत्वावधान में कार्न मायां पा आयोडिन अत्तश्यार्दग्य सम्मेलन के चौथे प्रान मांझ बूनिव्रसिंही के एसोसिएट प्रोफेसा मातेंलो यादो वे मार्क्स आइडिया आँफ झाचूनिज्य को चं प्टेन्नशाश्याक्रप्ता क्तंहृएवृज्वदृलो नाइ आलोचनात्यक्र व्याख्यान दिया.

उन्हेंनि राजा लत्रज्जश्यगं मेमोरियल लेक्यामें आनाव्याख्यान क्तमृए क्या क्तक्याव्रश्लोब्लणीपूजीन्नादृब्लेबिक्या भी 1856 यदृ के विज्या ये दृम्ल आबु ब्लिधाकुंब्लूत्रिब्लान्हुट्य मुदा है. ब्जा क्या दृम्लम्न दृदृ च्चादृदृ व्रच्चे शि च्चे प्राय च्चाब्जे क्या आत् ब्लॉ णीणदृव्रव्रढदृक्षस्थि. दृख्याच्चान्ने सृव्रश्लो ब्लॉ म्नच्चे ।स च्चे ख्याव्र 13 ये क्या हली का एँ ब्लहं शाफ्ला का स्थाश्चि किया जिओ जाह मैं त्यंस्तान्न च्चाश्चाच्चाष्य हुए

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जा स्पष्ट में _ षश्चिघो मार्क्सयांश्या न षारिस्थिक्रो क्रो मार्क्सवादी आलोचना ऊनी भी थिक्रक्षित्त नहीं क्रो उर्द्धनि कहा कि पूजी न्यास राज पा ध्यम देती है वह यही है क्तिकिंप्ती भी ताह स्रचयाँक्रया जाय इसीलिए वस्ती का अथिक्राश हिस्सा क्या आस्था पुरिपशुप्राके जाया रान के लिहाज स क्षमुव्रदृक्त भोव्रयो नहीडो जाय, यह नुप्तक्रैप्तिए क्रोईमायनेनहींरखत्ताड़े क्षिदृच्चा पृच्चीन्नाद के खाले क्रे हस्ता स्ने के ब्लागृ प्रकृत्ति क्या बदला लन के क्राश्या यह अपरिहार्य रा गयात्रैष , कषारिस्थित्तिक्रोक्रै स्रक्रटसेत्तड़रदृ लोग अपनेपर्थाग्राण  के साथ येटाबक्लिज्म पा सवेन और सक्रिय नियत्रण हासिल कं चौथ प्रान क्रे अग्य मुख्य क्लओ म्न प्याज प्लेखानोंत्र स्मारक व्याख्यान रत्न चाली मैक्सिकं ‘ र्प्रफिप्ता प्ताल्जिरा क्रांर्चारो थी जिनके व्याख्यान का , हफ्लोयो न मार्क्स क्रो केसे श्या दृ’ पृदुक्तिणाड्डफ्लादृ दृलुग्रातृव्र बूक्ले गय आत्तखा के प्रस्तात्ता षाआस्ना रौदृग्ला, द्देडेस्सातृरो, मांस्यमफ्लोनो, कुमारी सृर्नस्ता चं। आर आनेत्साद्रा येज्जाद्रो थ

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